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अटल बिहारी वाजपेयी के विद्यार्थियों के लिए 5 अनमोल जीवन मंत्र

भारत रत्न अटल बिहारी वाजयेपी आज भले ही सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उन्हें नि:संदेह बापू और नेहरू जैसे उन महापुरुषों की श्रेणी में रखा जा सकता है जिनका पूरा जीवन एक मिसाल है। उनके व्यक्तित्व और विचारों से सीख लेकर उन्हें अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि हो सकती है। खासकर किशोरों-युवाओं के लिए क्या हो सकती है यह ‘अटल’ सीख, बता रहे हैं अरुण श्रीवास्तव...

गुरुवार की सुबह नई दिल्ली के एम्स में बढ़ी हलचलों से लेकर 6 ए, कृष्ण मेनन मार्ग, भाजपा मुख्यालय और फिर यमुना किनारे विजयघाट स्थित राष्ट्रीय स्मृति स्थल तक की घटनाएं और दृश्यावलियां जिस तरह सभी मीडिया माध्यमों पर पूरे समय छाई रहीं, उन्हें देख-सुन कर नब्बे के दशक के बाद पैदा हुई, पली-बढ़ी और किशोरावस्था पार कर युवावस्था में पहुंच रही या पहुंच चुकी पीढ़ी काफी हद तक भौचक्की थी। खासकर वे किशोर-युवा तो और हैरान थे, जिन्हें कभी करिश्माई अटल जी को देखने-सुनने का मौका नहीं मिला। देश के इस सच्चे महानायक को श्रद्धांजलि और अंतिम विदाई देने के लिए जिस तरह सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा, खुद प्रधानमंत्री और उनके तमाम सहयोगी भी उमस भरी गर्मी के बीच उनकी अंतिम यात्रा में पूरे पांच किलोमीटर तक पैदल चले, वह वाकई हर किसी के लिए अविस्मरणीय था। बापू, नेहरू के बाद शायद ही किसी को याद हो कि राजधानी दिल्ली से लेकर देश के तमाम शहरों के बाजारों में स्वत:स्फूर्त बंद कब था? जाहिर है ऐसा सबको मन से साथ लेकर चलने वाले जननायक के साथ ही हो सकता है। हर किसी के लिए उन जैसा बन पाना तो आसान नहीं, पर अटल जी के व्यक्तित्व और विचारों से जुड़ी ऐसी तमाम अनुकरणीय बातें हैं जो हमें खुद के साथ-साथ समाज, देश और दुनिया (जैसा कि खुद अटल जी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के बारे में सोचते थे) को आगे बढ़ाने में मददगार साबित हो सकती हैं।

खुद पर भरोसा

अटल जी के चेहरे पर एक अलग किस्म के विश्वास का भाव होता था। व्यक्तिगत बातचीत हो, संसद या संसद से बाहर भाषण या फिर कविता पाठ, उनके मुख से निकली बात हृदय की गहराइयों से निकली प्रतीत होती थी। यही कारण है कि उसमें जितनी सरलता-सहजता होती थी, उतनी ही दूसरों के मर्म को छू लेने की क्षमता भी। दरअसल, किसी लीक पर चलने या किसी का दबाव महसूस करने की बजाय उन्हें अपने आप पर भरोसा था और यही उनकी ताकत भी थी। खुद पर भरोसा तभी हो सकता है, जब हम दूसरों के साथ-साथ अपने प्रति भी सच्चे हों।

सहृदयता

बड़े दिल का होना बहुत बड़ी बात होती है। हममें से तमाम लोग छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाते हैं। एक-दूसरे से मुंह फुला लेते हैं। इसका असर आपसी व्यवहार और कामकाज पर साफ झलक जाता है, पर अटल जी बार-बार कहते थे कि ‘मतभेद’ स्वाभाविक है, लेकिन इसकी वजह से ‘मनभेद’ नहीं होना चाहिए। उन्होंने न सिर्फ ऐसा कहा, बल्कि अपने जीवन में हर बार करके भी दिखाया। जाहिर है कि उनके इस स्वभाव की वजह से ही सब उनके दोस्त ही रहे, चाहे वे किसी भी विचार या दल में क्यों न हों। उनकी दुश्मनी किसी से नहीं रही। वैचारिक रूप से उनका कट्टर से कट्टर विरोधी भी व्यक्तिगत स्तर पर उनका मुरीद था। दरअसल, यह उनका जादू ही था कि वे किसी को नाराज होने का मौका नहीं देते थे। यह सहृदयता भी उनकी एक बड़ी सीख है।

सुनने का धैर्य

अटल जी एक ऐसे जननेता थे, जिनके पास कवि-हृदय था। हर कोई मानता है कि संभवत: यही करण है कि एक इंसान के रूप में वे बेहद संवेदनशील थे। अपनी ज्यादा कहने की बजाय उनमें दूसरों को सुनने का असीम धैर्य था। वे कम बोलते थे, पर जब बोलते थे तो अपनी धारदार बातों से हर किसी को निरुत्तर कर देते थे। चाहे सामने कोई भी हो। उनकी बातों में हंसी-ठिठोली भी होती थी और गूढ़ गहरी बातें भी। उनमें पद या शक्ति का कभी कोई अभिमान नहीं रहा। यह भी उनसे सीखने की बात है कि कैसे हम पहले इंसान हैं, जिसे पद या शक्ति की ताकत में चूर रहने की बजाय दूसरों के प्रति सदा इंसानियत का भाव रखना चाहिए।

निराशा से दूर

अटल जी का पूरा जीवन इस बात का गवाह है कि पराजय या मन का न होने के बावजूद निराशा कभी उन पर हावी नहीं हो सकी। चाहे एक वोट से सरकार गिरने की बात हो या चुनाव में हार की बात हो, उन्होंने सभी को बड़े सहज भाव से लिया। हार को भूलकर वह हमेशा आगे की ओर देखते थे और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि अगर वे पूरे मन और ईमानदारी से काम करते हैं, तो एक न एक दिन उन्हें जीत मिलेगी ही। अटल ऐसे ही अटल नहीं हो गए थे। उनके ‘अटल’ होने के पीछे लंबा संघर्ष भी था। यह युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश है कि कैसे हार या निराशा को खुद पर हावी न होने देते हुए सकारात्मक नजरिए के साथ अपना कर्म करते रहें।

सर्वस्वीकार्यता

यह अटल जी के गुणों में सबसे ऊपर माना जा सकता है। यह भी उनका स्वभावगत गुण था। वे सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे। यह गुण तभी आ सकता है, जब आप दूसरों से अपनी बात मनवाने से पहले उनकी बात सुनते और मानते रहे हों। इसके पीछे पारस्परिक विश्वास का भाव भी है। यही कारण है कि चाहे कोई राजनीतिक विरोधी हो या फिर किसी भी धर्म और संप्रदाय से जुड़ा व्यक्ति, हर कोई उनका प्रशंसक रहा। सभी उनका दिल से सम्मान करते थे।  सबके लिए हमेशा खड़े रहने के कारण उन्हें पता था कि किससे किस तरह अपनी बात पर हामी भरवानी है।

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