मोटिवेटेड रहें, सफल बनें | Shiv Khera | Safalta Ki Raah Par | Episode 16

इस वीडियो में विश्वविख्यात मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक शिव खेड़ा जी हमें अपने जीवन में लगातार मोटिवेटेड रहने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और यह कह रहे हैं कि जैसे हम रोज़-रोज़ भोजन करते हैं, नहाते हैं, उसी तरह हमें रोज़ाना अपना मोटिवेशन कायम रखने का प्रयास करना चाहिए. दरअसल मोटिवेशन एक ऐसी आग है जिसे लगातार जलाकर रखने के लिए बार-बार ईंधन डालना पड़ता है. अगर आप एक बार ईंधन डालने के बाद दुबारा ईंधन नहीं डालेंगे तो कुछ समय के बाद आपकी आग बुझ जायेगी. इसलिए, अगर आप अपने जीवन में सफलता हासिल करना चाहते हैं तो आपको रोज़ाना स्व-प्रेरणा लेनी होगी या फिर, किसी भी अन्य सुलभ तरीके से खुद को मोटिवेट करना होगा. इस वीडियो में शिव खेड़ा जी हमें कई सटीक उदाहरण देकर अपनी बात समझ रहे हैं. आइये आगे जानते हैं “सफलता की राह पर” सीरीज़ के इस सोलहवें वीडियो में सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमें क्या खास संदेश दे रहे हैं.....

इस वीडियो के शुरू में सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमसे कह रहे हैं कि अक्सर लोग उनसे यह पूछते हैं - ‘क्या आप भी कभी डिमोटिवेटेड (हतोत्साहित) हो जाते हैं?’ शिव खेड़ा जी कहते हैं कि हां! कभी-कभार वे खुद भी हतोत्साहित हो जाते हैं. तब वे लोग खेड़ा जी से अगला सवाल करते हैं कि ‘आप मोटिवेटेड रहने के लिए क्या करते हैं?’ फिर शिव खेड़ा जी उन्हें बड़ा ही सटीक जवाब देते हैं कि वे अपनी किताब ‘You Can Win’ (जीत आपकी) खोलकर दुबारा पढ़ते हैं.

सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी इस वीडियो में आगे कह रहे हैं कि हमें यह याद रखना चाहिए कि ‘मोटिवेशन’ (प्रेरणा) एक आग के समान है. अगर आप आग में कोयला नहीं डालेंगे तो एक समय के बाद आपकी आग बुझ जायेगी. आपका मोटिवेशन भी ठीक उसी तरह से कायम रह सकता है. शिव खेड़ा जी हमें आगे बता रहे हैं कि कई लोग उनके प्रोग्राम के बाद जब वापिस जाते हैं तो 2-4 दिन तो वे काफी मोटिवेटेड रहते हैं लेकिन कुछ दिन के बाद उनका मोटिवेशन खत्म हो जाता है.

तब शिव खेड़ा जी ऐसे लोगों से पूछते हैं कि, ‘आपने जो कल खाना खाया था, उससे आज भी आपका पेट भरा हुआ है क्या? जो खाना हमने कल खाया था, वह कब तक चला? अरे! वह तो कल ही खत्म हो गया था. इसी तरह, हम जो कल नहाये थे, उसका फायदा और असर कल तक ही था. अगर हम रोज़-रोज़ नहीं नहायें तो हमारे शरीर से बदबू आने लगती है. ठीक यही बात प्रेरणा पर भी लागू होती है.

हमारे दैनिक जीवन से भोजन करने और नहाने के उदाहरण देने के बाद सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर अब हमें समझा रहे हैं कि हमारे लिए रोज़ाना मोटिवेशन या प्रेरणा लेते रहना बेहद जरुरी है. वे कहते हैं कि जिस तरह से हमारे शरीर को स्वस्थ रहने के लिए सिर्फ खाना नहीं, बल्कि अच्छा खाना रोज़ाना चाहिए, अगर हम गंदा खाना खायेंगे तो बीमार पड़ जायेंगे. इसी तरह, हमारे दिमाग को भी रोज़ाना प्रेरित रहने के लिए अच्छे विचार चाहिए, अन्यथा हम मानसिक तौर पर बीमार पड़ जाते हैं. हमें रोज़ाना सकारात्मक विचारों की जरुरत होती है. इसलिए, यह सच है कि जो लोग नियमित रूप से अपना अभ्यास करते हैं, वे ही अपने जीवन में सफलता हासिल करते हैं.  

अपनी बात की पुष्टि के लिए इस वीडियो में आगे सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमारे सामने फ्रिट्ज क्रिसलर के साथ भारत के जाने-माने सितार वादक रवि शंकर जी का उदाहरण दे रहे हैं. वे कह रहे हैं कि रवि शंकर जी 40 – 50 साल से रोज़ाना सुबह 4 बजे उठकर अपना अभ्यास करते थे. आखिर अपनी कला के शिखर पर पहुंच जाने के बावजूद भी उन्हें रोज़ाना इतना कठिन अभ्यास करने की क्या जरूरत थी?

इस वीडियो में अपनी बात को आगे जारी रखते हुए शिव खेड़ा जी अपना सटीक उदाहरण देते हुए हमसे यह पूछ रहे हैं कि, ‘आप बताइए कि क्या मैं आपके सामने बिना किसी तैयारी के यह कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहा हूं?.......मैंने इससे पहले यह प्रोग्राम कोई 50 बार किया होगा.’ वे फिर हमसे आगे पूछ रहे हैं कि अगर वे बिना किसी तैयारी के अपना प्रोग्राम पेश करते तो क्या वे लगातार 2 घंटे तक अपना प्रोग्राम इतने बेहतरीन तरीके से पेश कर सकते थे? वे फिर कहते हैं कि, ‘आपको ऐसा लगता है कि जो मैं बोल रहा हूं, वह सब मैं स्वाभाविक रूप से अपने-आप ही कह रहा हूं.’ फिर वे आगे कहते हैं कि यह जो कार्यक्रम वे आज हमारे सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, दरअसल यह उनकी 40 साल की तैयारी का नतीजा है. ऐसा रातों-रात नहीं हुआ है. इसलिए, जैसे-जैसे आप अपना जीवन जीते हैं, तो आपको यह बात समझ में आ जाती है कि, ‘जीवन में कुछ भी पाने के लिए हमें तपस्या करनी पड़ती हैं. तपस्या के बिना हम जिंदगी में किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकते.’ इसलिए एक एथलीट, एक संगीतकार या कोई भी अन्य व्यक्ति अगर रोज़ाना अभ्यास नहीं करेगा तो क्या उसे सफलता मिल जायेगी?....अब शिव खेड़ा जी हमें एक छोटी-सी, लेकिन बहुत खास बात समझा रहे हैं.

सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमसे कह रहे हैं कि अपनी जिंदगी में लोग सफलता तो हासिल करना चाहते हैं लेकिन उस सफलता को पाने के लिए तैयारी करने की कीमत अदा नहीं करना चाहते. विश्व चैंपियन तैराक मार्क स्पिट्ज ने कहा था कि ओलंपिक की प्रतियोगिता जीतने के लिए उन्होंने गत 4 वर्षों में 10 हजार घंटों का अभ्यास किया है. अगर हमारा गणित अच्छा है तो हम समझ सकते हैं कि प्रत्येक वर्ष उन्होंने ढाई हजार घंटे अभ्यास किया जिसका अर्थ है रविवार की छुट्टी लिए बिना रोज़ाना 8 घंटे का अभ्यास. अब शिव खेड़ा जी हमसे पूछ रहे हैं कि क्या हम और वे रोज़ाना 8 घंटे तैराकी का अभ्यास कर सकते हैं?.......और अगर हम इतना कठोर अभ्यास करें तो क्या आप और हम ओलंपिक में जीत हासिल नहीं कर सकते? लेकिन अब एक बड़ा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या हम ऐसा करना चाहते हैं? क्या हम अपनी सफलता के लिए तैयारी की कीमत अदा करना चाहते हैं? अगर हम वह कीमत चुकायें तो हमें सफल होने से फिर कौन रोक सकता है?  

जिंदगी में जिसने कुछ करना है, वह प्रत्येक स्थिति में अपना काम पूरा कर लेता है लेकिन अगर किसी ने कुछ नहीं करना तो फिर ऐसे व्यक्ति के पास 50 बहाने होते हैं अपना काम न करने के जैसे, ब्रूसली की एक टांग छोटी थी लेकिन फिर भी उसने मार्शल आर्ट्स में महारत हासिल की. जिसे अपने जीवन में कुछ नहीं करना, भले ही आप उसे सब कुछ दे दें लेकिन वह तो भी अपना काम नहीं करेगा. शिव खेड़ा जी अब आगे समझा रहे हैं कि, किसी ने बहुत ही अच्छी बात कही है - अगर हम किसी व्यस्त इंसान को कोई काम देदें तो वह व्यक्ति हमारा काम कर देगा लेकिन जो निकम्मा व्यक्ति है, वह कभी हमारा काम ही नहीं करेगा. उसके पास समय ही समय है लेकिन हमारा काम करने का समय नहीं है.

सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमें आगे समझा रहे हैं कि कुछ लोग अलसी होते हैं लेकिन हमें यह कहते हैं कि वे बहुत धैर्यवान हैं. लेकिन वास्तव में धैर्य और आलस में बहुत फर्क है. अपनी इस बात को समझाने के लिए शिव खेड़ा जी हमें विश्व के महान दार्शनिक सुकरात का उदाहरण दे रहे हैं.

दो हजार साल पहले किसी युवक ने महान दार्शनिक सुकरात से पुछा कि, ‘सफलता का रहस्य क्या है?’ सुकरात ने उस युवक को अपना जवाब देने के लिए अगली सुबह नदी के पास बुला लिया. सुकरात ने उस युवक को अपने साथ नदी के भीतर आने के लिए कहा और जैसे ही वे दोनों गले-गले तक पानी के भीतर प्रवेश कर गये, सुकरात ने उस युवक का सिर पकड़ कर पानी के भीतर डुबकी देदी. वह युवक पानी से बाहर आना चाहता था लेकिन सुकरात काफी बलशाली थे और उन्होंने कुछ देर तक मजबूती से उस युवक को पानी के भीतर ही रखा. जब वह युवक नीला पड़ने लगा तो सुकरात ने उसे पानी से बाहर खींचा. उस युवक ने पानी से बाहर आते ही एकदम जोर से सांस लिया. तब सुकरात ने उस युवक से पूछा कि, ‘बेटा जब तुम पानी के भीतर थे तो तुम्हें ऐसी कौन-सी चीज़ चाहिए थी जिससे बढ़कर दुनिया में कुछ महत्वपूर्ण नहीं था?’ उस युवक ने जवाब दिया कि, ‘मुझे सांस चाहिए थी.’ यह सुनकर सुकरात ने उस युवक को समझाया कि, ‘सफलता पाने का और कोई रहस्य नहीं है. जैसे तुझे पानी के भीतर सांस चाहिए थी, ठीक वैसे ही अगर तुझे सफलता चाहिए तो यह याद रखना कि उस दिन जिंदगी में तुझे कोई नहीं रोक पायेगा.’ यही फर्क इच्छा और इरादे में है. इसी को अंग्रेज़ी में ‘बर्निंग डिज़ायर’ कहते हैं. जब हमारे अंदर कुछ पाने के लिए आग लगी होती है.....किसी के अंदर यह आग एक घंटे के लिए लगती है, किसी के भीतर यह आग एक दिन के लिए लगती है और किसी व्यक्ति के भीतर यह आग उम्र-भर जलती रहती है. ऐसा इंसान हमेशा ही प्रेरित रहता है. कारोबारी समुदाय में इसे ‘फायर इन दी बेली अर्थात पेट में आग’  कहा जाता है और खेल जगत में इसे ‘किलर इंस्टिंक्ट अर्थात कुछ कर दिखाने की वृत्ति’ कहा जाता है. इस वीडियो के आखिर में शिव खेड़ा जी समझा रहे हैं कि हमें यह याद रखना चाहिए कि अधिकतर लोग सफल होना चाहते हैं लेकिन सफल होने के लिए तैयारी की कीमत नहीं चुकाना चाहते.    

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