बायोइंजीनियरिंग : इंजीनियरिंग और बायोलॉजिकल साइंस का मिश्रण

बायोइंजीनियरिंग साइंस ने मेडिकल के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति लायी है. बायोइंजीनियरिंग साइंस की वजह से डॉक्टरों को कैंसर और टीबी जैसे जटिल रोगों का सफल इलाज खोजने में सफलता मिली है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार, जैव-चिकित्सा तकनीक असाध्य बीमारियों के इलाज की सार्वभौमिक सुविधा प्रदान करेगी. बायोइंजीनियरिंग के जरिये मानव स्वास्थ्य से जुड़े जटिल और असाध्य रोगों का भी इलाज ढूंढ पाना संभव है. पर्यावरण की सुरक्षा में भी बायोइंजीनियरिंग अभूतपूर्व योगदान दे रहा है. लेकिन इंजीनियरिंग की अन्य स्ट्रीम्स के विपरीत, यह स्ट्रीम बायो साइंस पर आधारित है.

इंडियन बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री

ग्रांट थॉर्नटन के एक सर्वेक्षण के अनुसार, इंडियन बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री ने 2010 में 3 बिलियन अमेरिकी डॉलर का आंकड़ा पार किया, जो वर्ष 2009 की तुलना में 23 प्रतिशत अधिक था. इस तरह के आंकड़े यह दर्शाते हैं कि इस क्षेत्र में ग्रोथ कितनी तेजी से हो रहा है तथा इसमें करियर की बेहतर संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं. यहाँ रोजगार के भरपूर अवसर उपलब्ध हैं.

बायोइंजीनियरिंग में रोग के निदान और इलाज के लिए उत्पादों और उपकरणों के विकास में जीवविज्ञान, भौतिकी के साथ-साथ रसायन विज्ञान के सिद्धांतों का प्रयोग किया जाता है. इस शाखा में जीवविज्ञान, चिकित्सा, व्यवहार और स्वास्थ्य के अध्ययन में भौतिकी, रासायनिक, गणितीय और अभिकलन विज्ञानों तथा इंजीनियरी के सिद्धान्त का सम्पूर्ण समन्वय होता है. इसके कई ब्रांच हैं. उनमें से कुछ प्रमुख निम्नांकित हैं –

क्लीनिकल इंजीनियरिंग : क्लीनिकल इंजीनियरी में कम्प्यूटर डॉटाबेस का विकास तथा अनुरक्षण, चिकित्सा औजारों और उपकरणों की सूचीकरण के साथ-साथ अस्पतालों में प्रयुक्त होने वाले चिकित्सा उपकरणों को खरीदने का कार्य मुख्य रूप से किया जाता है.क्लीनिकल इंजीनियर अस्पताल या चिकित्सा प्रक्रिया की संभावित जरूरतों के लिए उपकरणों की उपलब्ध्ता और इस्तेमाल में सहयोग करने के उद्देश्य से फिजिशियनों के साथ मिलकर कार्य कर सकते हैं.

बायोमेडिकल इंजीनियरिंग  : यह ट्यूमर, टीबी तथा कैंसर और इसी प्रकार की अन्य स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की पहचान और उसका निदान करने के उद्देश्य से इलेक्ट्रॉनिक डॉटा प्रोसेसिंग, विश्लेषण और प्रदर्शन कार्य को मिश्रित कर किसी भी समस्या का समाधान तलाशता है. इसके अंतर्गत मैगनेटिक रेसोनेंस इमेजिंग एमआरआई, अल्ट्रासाउंड और अन्य तकनीकों का सामान्यतः इस्तेमाल किया जाता है.

पुनर्वास इंजीनियरिंग : यह शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति को सक्षम बनाने की दिशा में कार्य करता है. इस फील्ड में किसी व्यक्ति विशेष की अत्यधिक विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु विकासात्मक गतिविधियों को शामिल किया जाता है.

बायोइंस्ट्रमेंटेशन : बायोइंस्ट्रमेंटेशन में रोग के निदान तथा इलाज हेतु उपकरण तैयार करने में कम्प्यूटर सहित इंजीनियरिंग सिद्धान्तों और पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है.

बायोमैकेनिक्स : इसका इस्तेमाल परिवहन तथा गति की रेंज जैसी चिकित्सा समस्याओं तथा प्रणालियों को समझने के लिए मैकेनिक्स के सिद्धान्त के रूप में किया जाता है.कृत्रिम अंग जैसे कि कृत्रिम हृदय, गुर्दे और जोड़ आदि ऐसे उपकरणों के उदाहरण हैं जिन्हें बायोकैमिकल इंजीनियरों द्वारा विकसित किया जाता है.

बायोमैटीरियल्स : इसके अंतर्गत मानव शरीर में इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक जीवित टिश्यू और कृत्रिम पदार्थों के विकास का अध्ययन किया जाता है.उपयुक्त गुणों वाले मैटीरियल के साथ कार्यात्मक अंग, हड्डियां और अन्य ट्रांसप्लांट करने योग्य मैटीरियल्स तैयार करना अत्यंत कठिन कार्य होता है. इन सभी वस्तुओं में मिश्रधातु, मिटटी, पोलीमर तथा अन्य वस्तुओं का मिश्रण किया जाता है.

टिशू इंजीनियरिंग : आजकल खराब टिशूज और नष्ट मानवीय  टिशूज को स्वस्थ टिशूज के रूप में परिवर्तित करने के लिए प्रतिस्थापन टिशूज का विकास किया जा रहा है. उदाहरण के तौर पर किसी के स्वस्थ गुर्दे से टिशूज लेकर उन्हें खराब गुर्दे में डाल दिया जाता है ताकि स्वस्थ टिशू उत्पन्न हो सकें.

प्रणाली शरीरविज्ञान : इसके अंतर्गत माइक्रोस्कोपिक और सबमाइक्रोस्कोपी स्तर पर जीवित अंग में किसी तरह क्रियाशीलता रहती है, फार्मास्यूटिकल ड्रग रिस्पॉन्स से मेटाबॉलिक सिस्टम्स और रोग का रिस्पॉन्स, स्वैच्छिक अंग मूवमेंट से स्किन हीलिंग और ऑडिटरी फिजियोलोजी आदि का अध्ययन किया जाता है.

बायोइंजीनियरिंग के अंतर्गत किये जाने वाले मुख्य कार्य

बायोमेडिकल इंजीनियर को मेडिकल डिवाइस पर रिसर्च करने, टेस्टिंग और मूल्यांकन संबंधी कार्य करना होता है. अस्पतालों और मेडिकल सेंटर्स के लिए नए बायोमेडिकल सामानों की खरीदारी कार्य भी इन्हें करना पड़ता है बायोमेडिकल इंजीनियर्स मेडिकल डिवाइसेज, स्पोर्ट्स मेडिसिन, स्टेम सेल रिसर्च, बायोमार्कर्स, जीनोमिक्स, नैनोटेक्नोलॉजी आदि क्षेत्रों में विशेषज्ञता प्राप्त कर किसी विशेष फील्ड में अपनी रूचि के अनुसार कार्य करते हैं. बायोमेडिकल इंजीनियरिंग संबंधी प्रोजेक्ट्स में कृत्रिम अंग और प्रोस्थेटिक लिंब्स, कंप्यूटर की सहायता से होने वाली मेडिकल संबंधी क्रियाएं और इलाज, सूचना विज्ञान और मेडिकल इमेजिंग आदि के कार्य किये जाते हैं.

आवश्यक शैक्षणिक योग्यता

बायो इंजीनियरिंग से जुड़े कोर्स करने के लिए छात्र का साइंस स्ट्रीम में 10+2  पास होना आवश्यक है.बायोमेडिकल इंजीनियर्स के पास इंजीयरिंग, भौतिकी, रसायन या जीव विज्ञान में स्नातक की डिग्री होनी चाहिए. अधिकांश बायोमेडिकल इंजीनियरिंग संबंधी नौकरियों के लिए बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री की आवश्यकता होती है. आजकल कुछ संस्थानों ने बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में स्नातक स्तर का बीटेक प्रोग्राम भी शुरू किया है. इसमें क्लिनिकल से जुड़े कोर्सेज भी कराये जाते हैं. यदि कोई उम्मीदवार मेडिकल क्षेत्र में रिसर्च करना चाहता है तो बायोमडिकल में एमफिल या पीएचडी कर सकता है.

बायो इंजीनियरिंग में डिग्री प्रदान करने वाले मुख्य संस्थान

•  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रुड़की

•  एमिटी यूनिवर्सिटी, नोएडा

•  ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, नई दिल्ली

•  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बॉम्बे

•  इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली

•  बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंस,पिलानी

•  वेल्लौर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी,चेन्नई

बायो इंजीनियरिंग के क्षेत्र में संभावित रोजगार

अगर सच पूछा जाय तो इस क्षेत्र में जॉब या नौकरी की कोई कमी नहीं है. बायोमेडिकल इंजीनियर अस्पतालों, नर्सिग होम्स, रिसर्च लैब्स, दवा बनाने वाली कंपनियों एवं हेल्थकेयर कंपनियों में नौकरी तलाश सकते हैं. इस कोर्स के जरिये उम्मीदवार विदेशों में भी रोजगार पा सकते हैं क्योंकि विदेशों में भी बायोमेडिकल इंजीनियर्स की डिमांड बढ़ी है.इसके अलावा बायोमेडिकल इंजीनियर प्रोडक्ट टेस्टिंग, डिजाइनिंग, चिकित्सकीय उपकरणों के उपयोग, उनकी देखरेख एवं रिसर्च संबंधी कार्य आदि का काम भी कर सकते हैं.

संभावित सैलरी

बायोइंजीनियरिंग प्रोफेशनल्स शुरुआत में 3 से 3.5 लाख रुपये कमा सकते हैं. किसी प्राइवेट हॉस्पिटल और क्लिनिक में लगभग 25 से 35 हजार रुपये प्रतिमाह सैलरी मिल सकती है. कुछ वर्षों के अनुभव के बाद खुद का लैब या इंस्ट्रूमेंट की दुकान खोली जा सकती है.

Related Categories

Also Read +
x