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बड़े धोखे हैं इस राह में...

अपने बच्चों का करियर संवारने का सपना देखने वाले अभिभावक खुद तमाम कष्ट सहकर भी उन्हें इंजीनियरिंग, मेडिकल, आइएएस आदि की कोचिंग कराने के लिए जैसे-तैसे हजारों-लाखों रुपये का जतन करते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर पैरेंट्स को तो ऐसे समर्पित संस्थान संचालक किसी फरिश्ते से कम नहीं लगते, जो उनके होनहार के लिए मुफ्त कोचिंग के साथ-साथ रहने-खाने की व्यवस्था भी करते हैं। लेकिन ऐसी कोचिंग के नाम पर अगर धोखा किया जाने लगे, तो स्टूडेंट्स के साथ-साथ उनके गार्जियन के लिए भी यह किसी सदमे से कम नहीं होता। कितना जरूरी है इस तरह के धोखे से बचना, बता रहे हैं अरुण श्रीवास्तव.......

श्रीपत राय एक गरीब किसान हैं, जिनके दो बेटियां और एक बेटे हैं। वह खुद तो ज्यादा पढ़-लिख नहीं सके थे, पर बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं। सौभाग्य से उनकी बेटियां और बेटा कुशाग्रबुद्धि होने के कारण बचपन से ही पढ़ाई में तेज थे। अभी उनकी बेटियां क्रमश: ग्यारहवीं-बारहवीं में और बेटा नौवीं में है। उनका भी सपना अपनी बेटियों को डॉक्टर और बेटे को इंजीनियर बनाने का है, पर महंगी कोचिंग के बारे में सोचकर उन्हें अपना सपना न पूरा होने वाला सपना ही लगता था। हालांकि कुछ साल पहले टीवी पर और अखबारों में पटना के उस संस्थान के बारे में देख-सुनकर उन्हें अपने सपने के सच होने की उम्मीद होने लगी थी, जो हर साल चुनिंदा 30 स्टूडेंट्स को आइआइटी-जेईई की कोचिंग के लिए के लिए चुनता था और परिणाम निकलने पर लगभग सभी के सलेक्ट होने का जोरशोर से दावा करता था। इस संस्थान के संचालक स्टूडेंट्स और पैरेंट्स की नजर में एक तरह से मसीहा बन गए थे, लेकिन पिछले दिनों हमारे अखबार के पटना संस्करण और सहयोगी अखबार आइनेक्स्ट ने तमाम पुख्ता प्रमाणों के आधार पर अपनी ‘एक्सपोज’ सीरीज के तहत जिस तरह इस संस्थान की धोखाधड़ी के खिलाफ कई रिपोर्ट प्रकाशित की, उससे तमाम पैरेंट्स और स्टूडेंट्स को गहरा आघात लगना लाजिमी है। किसी और कोचिंग संस्थान के स्टूडेंट को अपना बताकर प्रचारित करने और शुरुआत में मुफ्त कोचिंग देने के नाम पर एडमिशन लेकर बाद में सब्जबाग दिखाकर माता-पिता से हजारों की फीस वसूलने की असलियत सामने आने पर इस कथित संस्थान का भांडा फूट गया। सरोकारी पत्रकारिता के इस अभियान ने एक तरह से उन हजारों-लाखों माता-पिता और उनके बच्चों की आंखें खोल दीं, जो इस संस्थान से प्रभावित होकर इसमें प्रवेश पाने के लिए लालायित रहते थे।

गुमराह करते संस्थान

बेशक कोचिंग का असंगठित कारोबार पिछले डेढ़-दो दशकों में कोटा-दिल्ली-इलाहाबाद से लेकर कानपुर और पटना तक खूब फला-फूला है। कुछ संस्थान जहां क्वालिटी फैकल्टी के दम पर बेहतर रिजल्ट देकर मुंहमांगी फीस वसूल रहे हैं, वहीं कुछ ऐसे संस्थान भी हैं जो कामयाबी के लिए लालायित स्टूडेंट-पैरेट्स को फ्री कोचिंग के नाम पर अपने जाल में फंसाते और बाद में बच्चे का करियर बनाने के नाम पर भावनात्मक दबाव डालकर उनसे एक तरह से उगाही करते हैं। ऐसे लोग सार्वजनिक रूप से सामाजिक सरोकारिता का ढोंग रचते हुए हर किसी को गुमराह करते नजर आते हैं। विडंबना यह है कि उम्मीद से भरे लोगों द्वारा आसानी से भरोसा कर लेने के कारण वक्त रहते उनकी छिपी कारगुजारियों का भंडाफोड़ नहीं हो पाता। यह भी हो सकता है कि ऐसे लोग मीडिया को भी ‘मैनेज’ कर लेते हैं, जिससे इनके बारे में सच्ची खबरें दब जाती हैं और हमेशा अच्छी-अच्छी खबरें ही आती हैं। लेकिन आज भी सरोकारी पत्रकारिता करने वाले कुछ पत्रकार और संस्थान हैं, जिन्हें किसी भी प्रलोभन या दबाव से झुकाया नहीं जा सकता।

बचना है जरूरी

अगर आप भी अपने बच्चे को इंजीनियर, डॉक्टर, आइएएस आदि बनाने का सपना देख रहे हैं और यह सोचते हैं कि मुफ्त मार्गदर्शन कराने वाले ऐसे संस्थानों की मदद से इसे आसानी से पूरा किया जा सकता है, तो संभल जाएं। आंख मूंदकर संस्थान पर भरोसा करने की बजाय वहां पढ़ रहे स्टूडेंट्स से असलियत पता करने का प्रयास करें। सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास करने की बजाय यह जानें कि क्या वाकई वहां का पिछला परिणाम शानदार रहा है? अगर वहां पढ़़कर कामयाबी पाने वाले किसी स्टूडेंट से मुलाकात हो जाए, तो उसका अनुभव भी उपयोगी हो सकता है। यह भी देखें कि संस्थान के संचालक शुरुआत में जो कहते हैं, क्या बाद में उस पर पूरी तरह कायम रहते हैं? उनकी बातों, व्यवहार और गतिविधियों में कोई अंतर्विरोध तो नहीं नजर आ रहा? उनकी बातें और किए गए वादे कितने पारदर्शी हैं?

पकड़ें पसंद की राह

अगर आपको लगता है कि आपके बच्चे में किसी खास क्षेत्र में गहरी रुचि है और इसलिए उसे उसी क्षेत्र में आगे बढ़ाना चाहिए, तो इसके लिए कोचिंग के पीछे भागने की बजाय संबंधित एग्जाम को लेकर बच्चे की बुनियाद को मजबूत कराने का प्रयास करें। अगर उससे संबंधित विषयों में उसकी रुचि है, तो ऐसा करना कतई कठिन नहीं होगा। एक बार बुनियादी तैयारी हो जाने के बाद दूसरे चरण में संबंधित विषयों के एप्लीकेशन की प्रक्रिया आरंभ कराएं। बच्चा इसमें असहज महसूस कर रहा है, तो उसे इंटरनेट उपलब्ध कराने का प्रयास करें जहां वह यूट्यूब, फेसबुक आदि के जरिए फ्री में मदद हासिल कर सकता है। दरअसल, इन सोशल प्लेटफॉर्म पर ऐसे तमाम प्रोफेशनल्स सक्रिय हैं, जो टीचिंग का पैशन रखने के कारण इन पर सक्रिय हैं। खास बात यह है कि यह सुविधा आपके बच्चे को घर बैठे हासिल हो सकती है। बेवजह कोचिंग के पीछे भागने की बजाय अपने होनहार के टैलेंट को पहचानें और उसे ऑनलाइन हेल्प के जरिए आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें।

कोचिंग के बिना

कोचिंग संचालित करने वाले अक्सर यह तर्क देते दिखाई देते हैं कि उनके यहां व्यावहारिक नजरिये के साथ ‘टु द प्वाइंट’ गाइडेंस उपलब्ध कराया जाता है। संबंधित एंट्रेंस या एग्जाम में जिस तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं, उसकी प्रकृति को समझते हुए पढ़ाया जाता है। इसके अलावा, उसी पैटर्न पर नियमित रूप से मॉक टेस्ट लिया जाता है। यही कारण है कि उनके यहां पढ़ने वाले बच्चों की कामयाबी का ग्राफ बेहतर होता है। सवाल यह है कि क्या ऐसा शत-प्रतिशत बच्चों के बारे में कहा जा सकता है? क्या कोचिंग न करने वाले बच्चों का सलेक्शन नहीं होता? नहीं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। आज भी ऐसे तमाम स्टूडेंट मिल जाएंगे, जिन्होंने किसी भी संस्थान से कोई कोचिंग नहीं की। विश्वास न हो, तो विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं और प्रतियोगिता परीक्षाओं के पिछले दो-तीन साल के परिणामों के आंकड़े देख लें। इन परीक्षाओं को सिर्फ क्रैक ही नहीं, बल्कि इनमें टॉप करने वाले तमाम स्टूडेंट्स ऐसे मिल जाएंगे, जो सिर्फ ‘सेल्फ स्टडी’ से कामयाबी की मंजिल तक पहुंचे।

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