संस्कार बनाओ, सफल बनो Shiv Khera | Safalta Ki Raah Par | Episode 7

‘सफलता की राह पर’ सीरिज़ के इस वीडियो में विश्वविख्यात मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक शिव खेड़ा जी हमारे जीवन में अच्छे संस्कारों का महत्व बता रहे हैं. जहां अच्छे संस्कार हमें एक बेहतर इंसान बनाते हैं, वहीँ गलत संस्कार हमारे भीतर हीन भावना भर देते हैं जिस कारण हम अपने परिवार, समाज और देश तक से गद्दारी करने लगते हैं. जब हम अपने छोटे से बच्चे को झूठ बोलने के लिए शाबाशी देते हैं तो हम वास्तव में उसे एक झूठा और संस्कार-हीन इंसान बनने के लिए ही प्रोत्साहित करते हैं. आगे चलकर ऐसे ही व्यक्ति अपने परिवार, समाज और देश को अपने स्वार्थ की खातिर बेच देते हैं. लेकिन अगर हम अपने छोटे बच्चों के सामने सच्चाई और ईमानदारीपूर्वक व्यवहार करें तो फिर आगे चलकर हमारे बच्चे भी एक संस्कारशील और बेहतरीन इंसान बनते हैं जो अपने परिवार और समाज के लिए उपयोगी सदस्य साबित होने के साथ-साथ देश के विकास में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं.

इस वीडियो के शुरू में सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमें कह रहे हैं कि, यह भी एक संस्कार की बात है कि आजकल लोगों को ज्ञान तो बहुत मिल रहा है, लेकिन संस्कार नहीं मिल रहे हैं. अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए शिव खेड़ा जी हमारे घर-परिवार के कई सटीक उदाहरण पेश कर रहे हैं.

शिव खेड़ा जी सबसे पहले तो अपने बारे में एक बात क़ुबूल करते हैं कि अपने जीवन में उन्होंने बहुत गलतियां की हैं. लेकिन अगर हम किसी ऐसे इंसान को जानते हैं जिसने कोई गलती ही नहीं की, तो हम एक ऐसे इंसान को जानते हैं जिसने कभी कुछ किया ही नहीं. दरअसल हमें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि, गलती करना पाप नहीं है, लेकिन अपनी गलती का अहसास होने के बावजूद भी उस गलती को दोहराना पाप है.

इस वीडियो में शिव खेड़ा जी आगे अपने दफ्तर का एक बेहतरीन उदाहरण हमारे सामने पेश कर रहे हैं. वे कहते हैं कि उन्होंने कई फैसले लिए जैसेकि उनके दफ्तर में अगर कोई फोन आता है तो उनके दफ्तर में कोई झूठ नहीं बोलता है. अगर उनके दफ्तर में चेक के बारे में फोन पर पूछताछ की जाती है तो अगर नकदी की कमी, भूलवश या गलती से चेक नहीं भेजा जा सका तो दफ्तर के कर्मचारी झूठ नहीं बोलते कि हमने तो चेक भेज दिया था, क्या आपको मिला नहीं अभी तक? ........वह चेक मिलेगा कैसे जब भेजा ही नहीं गया अभी तक. ऐसी स्थिति में झूठ नहीं बोलना चाहिए बल्कि, माफ़ी मांगकर कह देना चाहिए कि अगले सप्ताह हम आपका चेक भेज देंगे या फिर, फलां तारीख को हम आपका चेक भेज देंगे पर हमें कभी भी इस मामले में झूठ नहीं बोलना चाहिए. जिस दिन आप चेक भेजेंगे, उस दिन के बारे में ही बताइए कि आप उस दिन ही चेक भेजेंगे.....बस इतना ही तो कहना है हमें. आगे शिव खेड़ा जी हमें अपने उदाहरण के माध्यम से यह समझा रहे हैं कि, अगर वे अपने दफ्तर में अपने ही स्टाफ को अपने लिए झूठ बोलना सिखायेंगे तो वह दिन दूर नहीं जब उनका स्टाफ उनसे ही झूठ बोलने लगेगा. इसी तरह, जितनी बार भी खेड़ा जी के स्टाफ के लोग उनके कहने पर उनके लिए झूठ बोलते हैं, उतनी बार ही वे लोग अपनी नजर में थोड़ा-थोड़ा गिरते रहते हैं. शिव खेड़ा जी हमें आगे कह रहे हैं कि सिर्फ पहला झूठ बोलना ही मुश्किल होता है उसके बाद तो झूठ बोलना एक आदत-सी बन जाती है.

इस वीडियो में सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमें आगे बता रहे हैं कि कैसे हम लोग अपने घर-परिवार में अपने छोटे बच्चों और परिवार के लोगों को झूठ बोलना या फिर, गलत उसूल सिखाते हैं. वे एक छोटे बच्चे का उदाहरण हमारे सामने रखने से पहले हमसे कहते हैं कि, हम सभी इस बात से जरुर सहमत होंगे कि, बच्चे पैदाइशी या जन्म से झूठे नहीं होते हैं. वे झूठ बोलना सीखते हैं. जैसेकि, किसी घर में एक छोटा-सा 3 साल का बच्चा है. जैसे ही घर पर फ़ोन की घंटी बजती है, बच्चा दोड़कर बड़े जोश से फोन उठा लेता है. फ़ोन पर जब उससे पूछा जाता है कि घर में पापा हैं या नहीं?... तो बच्चा जवाब देता है कि पापा घर में हैं और वह बच्चा फ़ोन रखकर अपने पापा को बुलाने के लिए चला जाता है. जब वह अपने पापा को फ़ोन सुनने के लिए कहता है तो उसके पापा बोलते हैं कि वे अभी उस आदमी से बात नहीं करना चाहते. बच्चा फ़ोन पर कह दे कि पापा घर पर नहीं हैं. ऐसे में बच्चा हैरान हो जाता है और फिर अपने पापा से पूछता है कि आप तो घर पर हो.....उसके पापा फिर सख्त आवाज में उसे फोन पर झूठ बोलने के लिए प्रेरित करते हैं. 2-3 बार अपनी बात रखने के बाद बच्चा मायूस हो जाता है क्योंकि वह तो अभी काफी छोटा है और उसके पापा उससे ऊम्र और साइज़ में काफी बड़े हैं. वह काफी दुखी और परेशान होकर फिर फोन उठाता है और यह कह कर फोन पटक देता है कि, पापा घर पर नहीं हैं, पापा कह रहे हैं कि पापा घर पर नहीं हैं. यह बात उस बच्चे के पापा सुन लेते हैं और उसे अपने पास बुलाकर बच्चे से यह पूछते हैं कि बच्चे ने क्या कहा है फोन पर? जब बच्चा अपना जवाब दोहराता है तो उसके पापा बच्चे को एक चांटा मारते हैं और कहते हैं कि वह बच्चा अपने पिता को मुश्किल में डालेगा. मार पड़ते ही बच्चे का रवैया बदल जाता है.

अगली बार फ़ोन आने पर बच्चा फिर फोन उठाता है और अब की बार जवाब देता है कि, मैं देखकर बताता हूं कि पापा घर पर हैं या नहीं. फिर पापा के पूछने पर वह बच्चा कहता है कि आपके लिए फ़ोन है पर मैं कह देता हूं कि आप घर पर नहीं हो. यह जवाब सुनकर बच्चे के पिता उसकी सराहना करते हैं और उसे शाबाशी देते हैं. बच्चा बहुत खुश हो जाता है और इस तरह वह बच्चा अपने जीवन में झूठ बोलना सीख जाता है.

शिव खेड़ा जी हमें आगे कह रहे हैं कि किसी सुप्रसिद्ध प्रबंधन सलाहकार ने एक बार कहा था कि, जिस व्यवहार को आप प्रोत्साहन देंगे, वह व्यवहार बढ़ता चला जायेगा. इस तरीके से हम जानवरों को प्रशिक्षण देते हैं. कोई भी ऐसा व्यवहार, जिस पर आशातीत प्रतिफल या तारीफ मिलती है, वह व्यवहार बार-बार दोहराया जाता है.

इसी तरह, अगर हम गलत व्यवहार को प्रोत्साहन दें तो वही बढ़ता चला जायेगा जैसेकि ऊपर दिए गए बच्चे के उदाहरण में, बच्चा पिता के बिना कहे ही उनके लिए झूठ बोलने को तैयार हो जाता है और अपने जीवन में कई छोटे-छोटे झूठ बोलते हुए जब वह बच्चा बड़ा होता है तो बिना किसी हीन भावना के वह झूठ बोलने में निपुण हो जाता है. वे आगे कहते हैं कि हमें यह अच्छी तरह याद रखना चाहिए कि अभ्यास से निपुणता नहीं आती है, बल्कि अभ्यास से वही स्थाई हो जाता है जिस चीज़ का हमने अभ्यास किया है.

यह बच्चा जितनी बार झूठ बोलता है, उतनी बार अपनी नजर में थोड़ा-थोड़ा गिरता जाता है. उसकी हीम भावना बढ़ती चली जाती है. जब यह बच्चा बड़ा होता है तो इसके अंदर हीन भावना इतनी अधिक बढ़ जाती है कि यह 2-2 रुपये में अपनी मां को बेचने अर्थात कुछ भी करने के लिए तैयार हो जाता है. केवल ऐसा ही इंसान अपने देश के साथ गद्दारी करेगा जिसके अंदर हीन भावना भरी होगी. 

सुप्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर शिव खेड़ा जी हमें इस वीडियो में भारत में फैले आतंकवाद और भ्रष्टाचार के उदाहरण दे रहे हैं. वे कहते हैं कि, नेपाल से जब इंडियन एयरलाइन्स का प्लेन हाइजेक हुआ था तो उन लोगों को जाली पासपोर्ट जारी किये गए थे. ऐसे में क्या वे लोग आतंकवादी नहीं हैं जिन्होंने जाली पासपोर्ट जारी किये थे? इसी तरह, साल 1993 के मुंबई बम धमाकों में 1600 लोग मारे गये थे या फिर बुरी तरह घायल हो गये थे. इस मामले के अदालती फैसले में भी यह उल्लेख है कि जो आरडीएक्स मिला था, वह कस्टम और इमीग्रेशन से गुजर कर गया था और उस गोला बारूद को घटना-स्थल पर वर्दी वालों ने ही पहुंचाया था. इस काम के उन्होंने 20 लाख रुपये लिए थे. यह रिपोर्ट सीवीसी की आधिकारिक साइट पर अभी भी देखी जा सकती है. वे हमसे आगे पूछते हैं कि, जिस देश के अंदर ऐसे लोग बसते हों, क्या बाहर के दुश्मन की जरूरत है?. वे आगे कहते हैं कि ये जो उदाहरण उन्होंने हमसे साझा किये हैं, वे मनगढ़ंत नहीं हैं बल्कि हमारे घर-परिवारों में ऐसा व्यवहार अक्सर होता है. जिस परिवार, दफ्तर या समाज में ऐसा व्यवहार चलता है, वह पूरा समाज ही हीन भावना से भर जाता है. वे हमसे आगे पूछते हैं कि अगर यही कुछ हम अपने बच्चों को, आने वाली पीढ़ियों को दे रहे हैं तो क्या चरित्र बनेगा इन लोगों का?

वे हमें आगे समझाते हैं कि किसी भी परिवार में बच्चों को अच्छे या बुरे संस्कार देने में माता-पिता की भूमिका काफी अहम होती है. अपनी बात को साबित करने के लिए वे दो एक जैसे परिवारों का बढ़िया उदाहरण हमारे सामने रख रहे हैं. वे कहते हैं कि:

एक पिता अपने 10 साल और 6 साल के दो बच्चों को पार्क में ले जाता है. एंट्री गेट पर वह एक बोर्ड में पढ़ता है कि 5 साल से छोटे बच्चों की एंट्री टिकट नहीं लगती. वह पिता अपने 6 साल के बच्चे को कहता है कि बेटा अगर कोई तेरी उम्र पूछे तो तू पौने पांच साल अपनी उम्र बताना. इस तरह हम 2-2 रुपयों के लिए अपने बच्चों को झूठ बोलना सिखाते हैं. वही बच्चा बड़ा होकर 200 करोड़ रुपये के लिए अपने देश को, अपनी मां को बेच देगा. यह एक ऐसा पिता है जो अपने बच्चों को गलत संस्कार दे रहा है.

इसी तरह, एक अन्य पिता अपने 10 साल और 6 साल के दो बच्चों को स्टेट पार्क ले जाता है और वही बोर्ड पढ़ता है. वह टिकट बेचने वाले से अपनी एक एडल्ट टिकट और अपने दोनों बच्चों के लिए 2 अन्य टिकटें मांगता है. तब टिकट बेचने वाला व्यक्ति छोटे बच्चे की उम्र पूछता है. पिता अपने बच्चे की सही उम्र 6 साल ही बताता है. यह सुनकर टिकट बेचने वाला कहता है कि अगर आप मुझे इसकी उम्र नहीं बताते तो यह बच्चा 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की तरह बिना टिकट लिए पार्क में एंट्री कर लेता. मुझे कभी मालूम ही नहीं पड़ता. तब आपको इस बच्चे की टिकट नहीं खरीदनी पड़ती. यह सुनकर उस बच्चे के पिता ने बड़ा ही अच्छा जवाब दिया कि, बेशक तूमको कभी मालूम नहीं पड़ता लेकिन मेरे बच्चे को मालूम पड़ जाता. इस तरह, हमारे बीच अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने वाले भी लोग हैं.

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