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ई–लर्निंग: एक सस्ता, सुगम और बेहतर ऑप्शन

आजकल दुनिया में डिजिटल युग का विस्तार इतना व्यापक स्तर पर हुआ है कि अब कोई भी इंडस्ट्री इससे अछूती नहीं रह गयी है. इंजीनियर्स के पास बेहतर कंप्यूटिंग पावर वाले प्रोग्राम्स और मशीनें होती हैं. डॉक्टर सर्जरी को अधिक सटीक और सुरक्षित बनाने के लिए टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन का उपयोग करते हैं. वकील अब सिर्फ एक बटन के क्लिक पर अपने मामलों को संशोधित कर सकते हैं. किराने के समान से लेकर फ्लाइट टिकट और टैक्सी बुकिंग तथा बैंकों से तत्काल मनी ट्रांसफर आदि कार्य सब कुछ अब डिजिटल हो चुका है.कंप्यूटर और इंटरनेट ने तो दुनिया ही बदल दिया है.

इन सभी परिवर्तनों में से  मुझे लगता है कि सबसे प्रभावशाली परिवर्तन यह है कि तकनीक ने पहले से कहीं बेहतर और शीघ्र जानकारी प्रदान करने का कार्य किया है.इसने ज्ञान की दुनिया को पूरी तरह से लोकतांत्रिक बना दिया है. इसी की वजह से विश्व के दूर दराज कोने में बैठे लोगों ने कई आविष्कार कर डालें हैं.इसने दुनिया को बहुत छोटा तथा जानकारी प्रदान करने वाला बेहतर स्थान बना दिया है. इसी वजह से पूरी दुनिया में शिक्षा जगत में क्रांति आ गयी है.समाचार चैनलों और शोध पत्रों के डिजिटलीकरण ने युवा दिमाग को और तीव्र बनाया है.

अब तो उद्यमों ने अपने कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने के लिए ई-लर्निंग का उपयोग शुरू कर दिया है.स्कूलों ने पारंपरिक कक्षा में होने वाली शिक्षा की लागत के एक अंश के लिए ऑनलाइन या समान पाठ्यक्रमों की पेशकश शुरू कर दी है. यह सब भारत में ई लर्निंग के विकास के कारण ही संभव हुआ है.

विकासशील देश में डिजिटलीकरण की ओर अग्रसर होने के कारण, ई-लर्निंग अब हजारों बच्चों को दैनिक चुनौतियों से निपटने में मदद कर रही है. ये चुनौतियों क्या हैं और ई-लर्निंग संभवतः कैसे मदद कर सकती है ? आइये इस विषय में जानने की कोशिश करते हैं.

ई लर्निंग बहुत सस्ता है

ई-लर्निंग सीखने के पारंपरिक तरीकों से निश्चित रूप से सस्ता है.इसके अलावा यह छात्रों तथा इंस्टीट्यूट दोनों के लिए फायदेमंद है. इसकी वजह से छात्रों को काम फी देनी पड़ती है तथा इंस्टीट्यूट अपनी जरुरत के मुताबिक आमदनी कर ही लेते हैं और उनके लिए भी यह सस्ता पड़ता है..भारत जैसे देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सिर्फ मेट्रो शहरों तक ही सीमित है.प्रतिस्पर्धी परीक्षा तैयारी के लिए छात्रों को अक्सर किसी बड़े शहर की तरफ रुख करना पड़ता है.अर्थात  टियर 2 तथा 3 श्रेणी के ग्रामीण इलाके वाले छात्रों को बेहतर शिक्षा के लिए अपना शहर छोड़कर अन्य शहर में जाना पड़ता है. यहाँ ये परीक्षा की तैयारी के लिए कोचिंग क्लासेज करते हैं तथा कोर्स, किराया, भोजन और अन्य आवश्यकताओं पर बड़ी मात्रा में धन का भुगतान करते हैं.

ई-लर्निंग उनके लिए एक बहुत सस्ता और व्यावहारिक विकल्प है क्योंकि यह छात्रों को अपने घर में बैठे बैठे आराम से सब कुछ सीखने में मदद प्रदान करता है. अगर एजुकेशन प्रोवाइडर (शिक्षा प्रदाता) की बात करें तो उन्हें ई लर्निंग के तहत शिक्षा प्रदान करने में बहुत सहूलियत होती है तथा उनकी लागत भी पारंपरिक स्टडी की तुलना में बहुत कम होती हैं. उन्हें बड़े बड़े क्लास रूम तथा अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने की जरुरत नहीं पड़ती है. उन्हें सिर्फ एक बार अपना कंटेंट तैयार करना होता है. एक बार कंटेंट तैयार हो जाने के बाद वे बड़ी आसानी से एक ही कोर्स मटीरियल को भिन्न भिन्न बैच में पढ़ाते हैं. हेल्पिंग स्टाफ की भी बहुत अधिक आवश्यकता महसूस नहीं होती. यह हो सकता है कि प्रारंभिक आवस्था में इन्हें बहुत अधिक इन्वेस्टमेंट करने की जरुरत पड़ती है लेकिन लंबी अवधि में ऑपरेशनल कॉस्ट पर भारी बचत होती है.नतीजतन सभी आर्थिक तथा सामजिक वर्गों के छात्रों के लिए शिक्षा की लागत बहुत कम हो जाती है और यह उनके लिए सुगम तथा सुलभ हो पाती है.

ई लर्निंग आसान है

कुछ अध्ययनों से यह पता चला है कि ई लर्निंग के जरिये स्टडी करने वाले छात्र क्लास रूम स्टडी करने वाले छात्रों की तुलना में ज्यादा जानकारी रखते हैं. इसकी मुख्य वजह ये है कि ई लर्निंग के तहत छात्रों को बहुत अधिक समय तक तथ्यों को याद रखने के लिए एनीमेशन, कहानी गेम-आधारित,रोल प्ले,सोशल लर्निंग स्टडी पैटर्न का उपयोग किया जाता है.  चूँकि दृश्यगत तथ्य बहुत देर तक याद रहते हैं तथा इससे चीजों को विज़ुअलाइज़ करने में बहुत मदद मिलती है एवं इसके लिए एनीमेशन के द्वारा स्टडी सबसे बेहतर तरीका है. छात्रों को सीखाने के लिए फिर बहुत ज्यादा परीश्रम की आवश्यकता नहीं पड़ती है. इसके अतिरिक्त उन्हें कहीं इधर उधर जाने में अपनी एनर्जी वेस्ट नहीं करनी पड़ती है इसलिए वे बहुत लम्बे समय तक स्टडी कर सकते हैं या उसपर अपना अतिरिक्त समय व्यतीत कर सकते हैं. इससे उनके अध्ययन तथा अन्य गतिविधियों में संतुलन बना रहता है.

ई लर्निंग बेहतर साधन है

जब पारंपरिक शिक्षा बनाम ई-लर्निंग की बात आती है, तो ई-लर्निंग में निश्चित रूप से इसके बहुत सारे फायदे हैं. सीखने की इस नई प्रक्रिया के कई फायदे हैं -

ई-लर्निंग द्वारा व्यक्तिगत विकास पर ज्यादा फोकस दिया जाता है : क्लासरूम स्टडी के दौरान लगभग 100 छात्रों  को टीचर एक ही स्पीड तथा स्टाइल से पढ़ाते हैं. आम तौर पर एक जनरल स्टडी पैटन को फॉलो किया जाता है. हर छात्र की अपनी अलग प्रतिभा, तथ्यों को समझने की क्षमता तथा उनकी स्पीड अलग अलग होती है. किसी किसी के लिए यह फ़ास्ट हो सकती है तो किसी किसी के लिए स्लो . जिसके लिए फ़ास्ट है वे आसानी से उसे समझ नहीं सकते और जिनके लिए स्लो हैं उनके लिए वह विषय बोरिंग हो जाता है और उसमें छात्रों का इन्ट्रेस्ट कम हो जाता है. लेकिन ई लर्निंग में ऐसी कोई समस्या नहीं आती है. इसके जरिये हर छात्र की जरूरतों को पूरा करना संभव होता है. हर छात्र अपने सीखने की गति तय कर सकते हैं. अगर वे एक कॉन्सेप्ट को नहीं समझते हैं, तो बेहतर समझने के लिए उस वीडियो या मॉड्यूल को फिर से चलाया जा सकता है.

ई-लर्निंग एडैप्टिव लर्निंग का उपयोग करती है : जैसा कि मैंने पहले कहा था, हर छात्र के सीखने की प्रक्रिया अलग-होती है. यही कारण है कि प्रत्येक छात्र की ताकत और कमजोरियां भी अलग-अलग होती है. ई लर्निंग के अंतर्गत छात्रों के कमजोरियों तथा उनके गुणों को जानकर उसके अनुरूप शिक्षा प्रदान की जा सकती है. इसे ही एडैप्टिव लर्निंग प्रोसेस कहते हैं.

टॉपप्रो जैसी ई-लर्निंग कंपनियां छात्रों को तेजी से और बेहतर तरीके से सीखने में मदद करने के लिए एडैप्टिव लर्निंग का उपयोग करती हैं. वे ऐप पर एक छात्र के व्यवहार का विश्लेषण करके देखे गए वीडियो के प्रकारों का निरीक्षण करके, ऐसे क्षेत्र जहां छात्र और बेहतर कर सकते थे, उनके विषय में विस्तृत जानकारी तथा उपाय का सुझाव देते हैं ताकि छात्र भविष्य में और बेहतर कर सके.

ई-लर्निंग का प्रयोग तत्काल संदेह को हल करने के लिए किया जाता है : ई-लर्निंग ऐप्स में 24x 7  छात्रों को अपने एक्सपर्ट के साथ जुड़ने की व्यवस्था होती है.ई-लर्निंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करके कुछ प्रश्न और संदेह हल किए जा सकते हैं जिन्हें चैटबॉट भी कहा जाता है. किसी प्रश्न का उत्तर जानने के लिए फैकल्टी के पूरे लेक्चर को पढ़ने की बजाय छात्र सिर्फ अपने डाउट वाले सवाल पर क्लिक करके अपना उत्तर जान सकते हैं तथा उसे चैट ऐप पर अपलोड कर सकते हैं. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग और बिग डेटा का उपयोग करके, बॉट के जरिये छात्रों को अपने विशाल डेटाबेस से सभी प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है और अगर ऐसा नहीं हो पाता तब छात्रों को किसी मानव विशेषज्ञ के साथ कनेक्ट किया जाता है ताकि उसे अपने प्रश्न का सही उत्तर मिल सके. ये मानव विशेषज्ञ समस्याओं के सही समाधान में लगभग 2-3 मिनट का समय लेते हैं और इस बात का भी पता लगाते हैं कि छात्र उस कॉन्सेप्ट को पूरी तरह से समझ पाया की नहीं.

यह तो सर्वविदित है कि पूरे विश्व में टेक्नोलाजी के साथ शिक्षा के एकीकृत होने से शिक्षा जगत में एक बड़ा बदलाव आएगा. भारत में टेक्नोलॉजी की वजह से शिक्षा सर्वसुलभ हो पाएगी और प्रत्येक छात्र सेलफोन तथा इंटरनेट के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे.

हर कोई जो तेजी से बेहतर  और बहुत कम लागत पर सीखना चाहता है, उसे एक शॉट ई-लर्निंग की जरुरत पड़ेगी ही.

विशेषज्ञ के बारे में:

मनीष कुमार ने वर्ष 2006 में आईआईटी, बॉम्बे से मेटलर्जिकल एंड मेटीरियल साइंस में ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त की. उसके बाद इन्होंने जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, यूएसए से मटीरियल्स साइंस इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की और फिर इंडियन स्कूल फाइनेंस कंपनी ज्वाइन कर ली, यहाँ वे बिजनेस स्ट्रेटेजीज एंड ग्रोथ की देख रेख करने वाली कोर टीम के सदस्य रहें. वर्ष 2013 में, इन्होंने एसईईडी स्कूल्स की सह-स्थापना की. ये  स्कूल्स भारत में कम लागत वाली के-12 एजुकेशन की क्वालिटी में सुधार लाने पर अपना फोकस रखते हैं ताकि क्वालिटी एजुकेशन सभी को मुहैया करवाई जा सके. वर्तमान में ये टॉपर.कॉम के प्रोडक्ट – लर्निंग एंड पेडागॉजी  विभाग में वाईस प्रेसिडेंट हैं.

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