छात्र किशोरावस्था के डिप्रेशन और सोशल एन्जाईटी को कैसे करें कंट्रोल ?

अक्सर किशोरावस्था में छात्रों को कुछ ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिसे वे आम तौर पर किसी से ना तो शेयर कर पाते हैं और ना ही उनका कोई नजदीकी उनकी इस समस्या को समझ पाता है. इस अवस्था में छात्र अमूमन सामाजिक चिंता, अवसाद या शर्म जैसी भावनाओं से ग्रस्त हो जाते हैं.समस्या उस समय और अधिक बढ़ जाती है जब छात्र अपनी इस व्यथा को अपने माता-पिता, शिक्षक तथा सहपाठियों तक को समझाने में बिलकुल असमर्थ हो जाते हैं. इस समय छात्रों को भावनात्मक सहयोग की जरुरत होती है.इसके लिए उनकी सही तरह से काउंसिलिंग भी बहुत जरुरी होती है अन्यथा वे कई मामलों में अपने रस्ते से भटक जाते हैं.ऐसी स्थिति में किशोरावस्था से जुडी समस्याओं से निजात दिलाने में टीन लाइफ कोचिंग इंस्टीट्यूट्स की भूमिका बहुत बढ़ जाती है.टीन लाइफ छात्रों को बहुत ही रचनात्मक तरीके से इन समस्याओं को समझने तथा उन्हें आसानी से दूर करने के सरल उपाय बताते हैं.

इसके लिए सबसे जरूरी है पॉजिटिव ऐटीट्यूड के साथ सेल्फ कॉन्फिडेंस डेवेलप करना. इस इन्टरव्यू में टीन लाइफ कोच रजत सोनी ने किशोरावस्था की कुछ समस्याओं तथा टीन लाइफ कोचिंग द्वारा उसका समुचित समाधान किस तरह किया जाता है? यह उनके समग्र जीवन को बेहतर बनाने में किस तरह मदद करता है?आदि पर प्रकाश डालने का प्रयास किया है.

इन्टरव्यू का सारांश

रजत सोनी के अनुसार, टीन एज लाइफ कोचिंग एक युवा छात्र के जीवन के सभी पहलुओं को अर्थात उनके पारिवारिक रिश्तों,स्कूल,उनके व्यक्तिगत विकास एवं अन्य समस्याओं को कवर करते हुए उसका सही निदान बताने की कोशिश करता है.

सामान्यतः  टीन लाइफ कोचिंग बच्चों की सामाजिक चिंता, शर्म, सीखने में कठिनाई जैसी समस्याओं से जूझ रहे ऑटिज्म, एस्परर्स तथा एडीएचडी के शिकार किशोरों की मदद के लिए काम करता है तथा अपने प्रयासों से उनमें सेल्फ कॉन्फिडेंस विकसित कर उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.

एकेडमिक बनाम पर्सनल ग्रोथ – टीन लाइफ कोचिंग छात्रों की किस तरह से मदद करता है ?

एग्जामिनेशन और मार्किंग सिस्टम से छात्रों को अपनी क्षमता को समझने में मदद मिलती है. प्रतीक चिन्हों का मुख्य उद्देश्य बच्चों में हो रहे विकास या सुधार को इंगित करना अथवा उसकी तुलना करना होता है. लेकिन धीरे धीरे इनका प्रयोग नकारात्नक संदर्भ में होने की वजह से यह एक दूसरे के विपरीत प्रतिस्पर्धा के रूप में विकसित होने लगे हैं.

हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एकेडमिकली अच्छा नहीं होना या परीक्षा में अच्छे अंक न लाना एक बीमारी नहीं बल्कि एक लक्षण मात्र है. कई ऐसे बाह्य कारण हो सकते हैं जिसकी वजह से बच्चा सही ढ़ंग से पढ़ाई नहीं कर पाता है.इसकी वजह कुछ भी हो सकती, शर्म,दोस्तों के साथ सही सम्बन्ध का नहीं होना आदि . टीन लाइफ कोचिंग छात्रों तथा अभिभावकों को मार्क्स के आधार पर बच्चों  के टैलेंट का आकलन करने की बजाय उसके अन्दर निहित अन्य योग्यताओं को निखारने तथा उसपर काम करने की प्रेरणा देते हैं तथा छात्रों की समस्याओं को बहुत अधिक गहराई से समझने और उसका सही निदान करने की सलाह देता है.

कॉम्पिटिशन में सफलता के लिए टीन लाइफ कोचिंग  

एक बहुत ही आम बात है कि लोग बाहरी दुनिया से कॉम्पिटिशन करते हैं.रजत सोनी का कहना है की भारतीय अभिभावक तथा छात्र अक्सर बाहरी दुनिया की लोगों की नकल तथा उससे प्रतिस्पर्धा करते है लेकिन इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह भूल जाते हैं कि वास्तव में प्रतिस्पर्धा तो स्वयं से होनी चाहिए. दुनिया में क्या हो रहा है लोग यह देखकर दुखी होते हैं हमें अपने आप को किस तरह एक बेहतर इंसान बनाना है ? इस बात पर गौर नहीं करते हैं. छात्रों को नित्य प्रति एक बेहतर इंसान बनने की कोशिश करनी चाहिए. टीन लाइफ कोचिंग इन सभी चीजों को गहराई से समझने की क्षमता छात्रों में उत्पन्न करता है तथा उन्हें अपने सपनों को साकार करने की दिशा में सही कदम उठाने की प्रेरणा देता है. टीन लाइफ कोचिंग छात्रों को उनको अपने मजबूत पक्षों को समझकर उसके अनुरूप रचनात्मक कार्यों में उसका प्रयोग कर अपनी प्रतिभा को निखारने का मौका देता है.

सामाजिक चिंता, अवसाद और अन्य मुद्दों पर समाज की बदलती प्रवृति  

सामाजिक चिंता, अवसाद और इस तरह की अन्य समस्याएं व्यक्ति को कभी भी अपने गिरफ्त में ले सकती हैं.इसलिए छात्रों में नैतिकता और आत्मविश्वास की एक मजबूत आधारशिला की स्थापना करके उनके अन्दर कुछ ऐसी क्षमताओं का विकास किया जा सकता है कि आने वाले भविष्य में अपने व्यक्तिगत परेशानियों का सामना वे आसानी से करते हुए उन पर विजय प्राप्त कर सकें.

 

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