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जानिये ये हैं इंडियन स्टूडेंट्स के लिए प्रमुख करैक्टर बिल्डिंग टिप्स

चाहे कार्पोरेट जगत हो, बिजनेस वर्ल्ड हो, प्राइवेट सेक्टर हो या फिर, गवर्नमेंट सेक्टर ही हो, इन दिनों अक्सर सब जगह पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट की बात सुनने में आती है.  दरअसल, हमें अपने जीवने में कामयाबी हासिल करने के लिए अपने पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट या करैक्टर बिल्डिंग पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए. निस्संदेह! हमारी समूची पर्सनैलिटी का विकास हमेशा हमारे करैक्टर अर्थात चरित्र निर्माण से ही होता है. केवल चरित्र से ही हरेक व्यक्ति की सटीक पहचान होती है. इसलिए हमारे जीवन में, विशेष रूप से इंडियन स्टूडेंट्स के जीवन में तो करैक्टर बिल्डिंग बहुत जरुरी है. लेकिन यह भी सच है कि, हमारे चरित्र का निर्माण केवल कोई खास स्तक पढ़ने से ही एक दिन/ एक महीने या फिर, एक साल के भीतर नहीं हो सकता. यह जीवन का एक व्यावहारिक पहलू है.

अब जरा इस बात पर गौर कीजिये कि, प्रकृति के अटल नियम के मुताबिक, हरेक व्यक्ति की आकृति स्वाभाव, संस्कार और प्रवृतियां या चरित्र और पर्सनैलिटी अन्य सभी व्यक्तियों से बिलकुल अलग होते हैं.  लेकिन, व्यक्तियों की इन असमानताओं में ही इस जगत का सौन्दर्य है. मनुष्य के चरित्र को परखना एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण कार्य है और सभी व्यक्तियों, विशेषकर इंडियन स्टूडेंट्स के लिए करैक्टर बिल्डिंग बहुत कठिन कार्य है. यह एक कठिन कार्य इसलिए है क्योंकि हमारे चारित्र में कई गुणों और अवगुणों का भी मिश्रण होता है तथा यह नित्य ही बदलता भी रहता है. लेबोरेट्री में रखकर इसका  विश्लेषण नहीं किया जा सकता. आज के मनोवैज्ञानिक भी इसी प्रयास में लगे हुए हैं. फिर भी निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता है. इसलिए, इंडियन स्टूडेंट्स को करैक्टर बिल्डिंग के लिए कुछ जरुरी बातों पर गौर करना चाहिए जिनका ब्यौरा हम आपके लिए इस आर्टिकल में पेश कर रहे हैं:

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स्टूडेंट्स रखें अपनी प्रवृत्तियों पर समुचित नियंत्रण

करैक्टर बिल्डिंग की पहली शर्त है अपनी प्रवृतियों पर संयम. कुछ प्रवृतियों का उत्पन्न होना स्वाभाविक होता है लेकिन यह समझकर कि ऐसा स्वाभाविक है उसके अनुरूप प्रतिक्रिया नहीं देना ही प्रवृतियों पर संयम कहलाता है. गुस्सा, क्रोध तथा लालच आदि सहजात प्रवृति है और इनपर नियंत्रण ही व्यक्ति की काबिलियत को सही मायने में दर्शाता है.

हरेक परिस्थति के मुताबिक खुद निर्णय लेने में बनें सक्षम

बचपन से ही निर्णय लेने की क्षमता का विकास शुरू हो जाता है. बच्चों के विकास क्रम में उसके तीसरे साल से ही उसके चरित्र का विकास होना शुरू हो जाता है. हर बच्चों के परवरिश की परिस्थितियां अलग अलग होती हैं. अपनी इन अलग परिस्थितियों में बच्चें अपने माता पिता से बहुत कुछ सीखते हैं. अपने टीचर्स तथा दोस्तों से भी बहुत कुछ सीखते हैं. लेकिन ध्यान रखिये अपने रोजमर्रा की जिंदगी में जितना कुछ वे देखते हैं या सुनते हैं उनमें से वे सभी ग्रहण नहीं कर सकते हैं. किसी भी चीज को ग्रहण करने से पहले वे उसका चुनाव करते हैं. बहुत छोटे होने की स्थिति में माता पिता गाइड करते हैं कि यह करो, यह नहीं करों. लेकिन बड़े होने पर खुद ही यह चयन करना पड़ता है  कौन सा गुण मेरे लिए सही है और कौन सा सही नहीं है ? यह चुनाव का अधिकार व्यक्ति के आत्म निर्णय को अभिव्यक्त करता है तथा इसके लिए हमेशा एलर्ट रहने की आवश्यकता होती है. तभी तो ऐसा कहा जाता है कि

हम परिस्थितियों के दास नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों के प्रति हमारी मानसिक प्रतिक्रिया ही हमारे चरित्र का निर्माण करती है. हमारी निर्णयात्मक चेतनता जब पूरी तरह जागृत हो जाती है और हमारे नैतिक आदर्शों को पहचानने लगती है तो हम परिस्थितियों की ज़रा भी परवाह नहीं करते. आत्म-निर्णय का यह अधिकार ईश्वर ने हर मनुष्य को दिया है और  अन्तिम निश्चय हमें खुद ही  करना होता है.

पॉजिटिव एटीट्यूड

पॉजिटिव थिंकिंग अर्थात सकारात्मक विचार व्यक्ति की सफलता तथा उसके चरित्र मूल्यांकन की महत्वपूर्ण कड़ी होती है. अगर आपके अन्दर से पॉजिटिव वाइव्स आते हैं तो आप कठिन से कठिन परिस्थितियों में बिना घबराये हुए आगे बढ़ने की क्षमता रखते हैं. इसलिए हमेशा अच्छा सोचना तथा सकारात्मक बने रहना भी करैक्टर बिल्डिंग  के लिए बहुत जरुरी है.

विवेक का सटीक इस्तेमाल

अधिकतर मामलों में हम देखते हैं कि बिना किसी चीज पर सोच विचार किये हुए लोग और खासकर, स्टूडेंट्स अपनी प्रतिक्रिया दे देते हैं जो अक्सर गलत साबित होता है. इसलिए भावावेश में आकर कोई भी निर्णय नहीं लिया जाना चाहिए. कभी कभी भावुकता में लिए गए निर्णय तथा उठाये गए कदम भी बहुत दुःखदायी परिणाम  देते हैं. इसलिए हमेशा अपने दिमाग से काम लें. भावनाओं का महत्व है लेकिन उससे जुड़ा हुआ कोई भी निर्णय विवेकाधीन होने के बाद ही ज्यादा सुखदायी होता है. इस जीवन में हमेशा अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हुए सोच समझकर ही कोई कार्य करना चाहिए. सोच समझकर कार्य करने वाले व्यक्ति का आचरण हमेशा सराहनीय होता है.

अपने डर पर रखें नियंत्रण

कहते हैं न कि जो डर गया वो मर गया. आर्थात एक भयभीत व्यक्ति का दिल और दिमाग दोनों सुस्त और स्थिर पड़ जाता  है. ऐसा संभव ही नहीं है कि जीवन में संघर्ष ही न आये. परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं रहती और इस दौरान बिना भयभीत हुए उनका सहर्ष सामना करना होता है. जो उन परिस्थितियों का बिना डरे सहजता से सामना कर लेता है वह जीवन में कामयाब हो जाता है. वह कामयाबी का मोहताज नहीं होता, कामयाबी उसके पीछे चलती है. इसलिए अपने जीवन को कभी भी कठपुतली की तरह बाह्य घटनाओं का गुलाम नहीं बनाये. आप अपने मास्टर स्वयं है और इसे बस समझने की जरुरत है. जिस दिन व्यक्ति इस तथ्य को समझ जायेगा, उसका चरित्र स्वतः सशक्त और अनुकरणीय हो जायेगा.

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