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स्पेशल एजुकेशन: निखारें बच्चों का टैलेंट

 लर्निंग डिस्ऑर्डर से पीड़ित बच्चों को समझने और उन्हें आम बच्चों की तरह आगे बढ़ाने के लिए अलग तरह की स्किल की जरूरत है। अच्छी बात है कि अब इस तरह के प्रयासों में तेजी आ रही है। पिछले कुछ सालों से देश में विशेष शिक्षा पर काफी जोर दिए जाने से सरकारी और निजी स्कूलों में बड़ी तादाद में विशेष शिक्षक रखे जा रहे हैं। हालांकि एक अनुमान के अनुसार, अभी भी करीब 10 लाख ऐसे शिक्षकों की जरूरत है। स्पेशल एजुकेशन में समुचित स्किल हासिल करके इस दिशा में करियर बनाने के साथ-साथ बच्चों के विकास में भी अतुलनीय योगदान किया जा सकता है.......

वर्ष 2007 में आई आमिर खान की फिल्म ‘तारे जमीन पर’ ज्यादातर लोगों ने जरूर देखी होगी। उसमें आठ साल के एक बच्चे ईशान अवस्थी (दर्शील सफारी) की कहानी है जो लर्निंग डिस्ऑर्डर की बीमारी ‘डिस्लेक्सिया’ से पीड़ित है। मगर उसे कोई समझ नहीं पाता। न तो मां-बाप और न ही स्कूल के टीचर। बोर्डिंग स्कूल में आए नए आर्ट टीचर रामशंकर निकुंभ (आमिर खान) आते हैं, जो अन्य टीचर से बिल्कुल अलग हैं और बच्चों से उनकी रुचियां जानकर उसी के अनुसार उन्हें पढ़ाते हैं। उनके प्रयासों से दूसरों की नजर में एक निकम्मा बच्चा आर्ट में जोरदार प्रदर्शन करके सबकी आंखों का तारा बन जाता है। दरअसल, यह सिर्फ एक काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज की एक महत्वपूर्ण समस्या है, जिसे आमिर ने उठाना जरूरी समझा। अधिकतर मां-बाप भी अपने बच्चे की इस समस्या को न समझ पाने के कारण पढ़ाई, स्कूल या अन्य गतिवधियों में उसके पिछड़ेपन से दुखी रहते हैं। और टीचर्स का तो कहना ही क्या। उन्हें तो जैसे इस बात से कोई मतलब ही नहीं होता कि कौन बच्चा कैसा है और किस तरह अलग तरीके से उसे आगे बढ़ाने की जरूरत है। यह अच्छी बात है कि अब कुछ सरोकारी व जागरूक लोगों और स्कूलों के प्रयास से इस दिशा में अच्छी पहल हो रही है। इससे उक्त समस्याओं से पीड़ित बच्चों के सामने कामयाबी का नया आकाश खुल रहा है और इससे गार्जियन भी खूब खुश हैं।

विशेष शिक्षकों की बढ़ रही भूमिका

शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के बाद से विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को भी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिल रहा है। ऐसे बच्चों/किशारों में समस्यात्मक व्यवहार या मनोरोग के लक्षण देखे जाते हैं, जैसे-लर्निंग डिस्ऑर्डर, ध्यान में कमी होना, कम समझना, आत्मविश्वास में कमी होना इत्यादि। इससे उनके अकादमिक प्रदर्शन में बाधा आती है। विशेष शिक्षक ऐसे बच्चों में विशेष जरूरतों की पहचान कर क्लासरूम में ही उनकी मदद करते हैं, ताकि वे अपना कार्य-प्रदर्शन सुधार सकें। यही कारण है कि सरकारी और निजी स्कूलों में इन विशेष शिक्षकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। स्पेशल एजुकेशन में डीएड/बीएड करके स्कूलों के अलावा चाइल्ड गाइडेंस क्लीनिक, पुनर्वास केंद्र जैसी जगहों पर भी कार्य किया जा सकता है।

डॉ. अमृता सहाय, सहायक प्रोफेसर,
पुनर्वास मनोविज्ञान,
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द एम्पॉवरमेंट ऑफ पर्सन्स विद इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटीज (दिव्यांगजन), नोएडा

बढ़ रही है समस्या

बच्चों में आजकल लर्निंग डिस्ऑर्डर या सरल भाषा में कहें तो सीखने की अक्षमता दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है। इंडियन एकेडमी ऑफ पेडियाट्रिक्स के अनुसार, लगभग 5 से 15 प्रतिशत स्कूली बच्चों में यह समस्या देखी जा रही है, जिनमें डिस्लेक्सिया (पढ़ाई में कठिनाई), डिस्ग्राफिया (लिखने में कठिनाई ) और डिस्कलकुलिया (गणितीय कौशल में कठिनाई) जैसी समस्याएं प्रमुख हैं। समाज में ऐसे बच्चों को मानसिक रूप से कमजोर माना जाता है। 2011 की जनगणना के अनुसार, 0-6 वर्ष की उम्र के ऐसे जरूरत वाले बच्चों की तादाद देश में करीब 20 मिलियन (2 करोड़) है, जिन्हें विशेष देखभाल और मार्गदर्शन की जरूरत है या पढ़ने-लिखने में दिक्कत है। ड्रॉपआउट बच्चों पर 2014 की नेशनल सर्वे रिपोर्ट की मानें, तो देश में करीब 6 लाख विशेष जरूरत वाले बच्चे (6 से 13 साल की उम्र के) शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से ऐसे बच्चों को भी समावेशी शिक्षा के जरिए मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया जा रहा है, ताकि सामान्य और अक्षम छात्र एक ही स्कूल में शिक्षा पा सकें। यही कारण है कि आजकल सरकारी और निजी दोनों तरह के ही स्कूलों में विशेष शिक्षकों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। एक अनुमान के अनुसार, इस समय देश में करीब 10 लाख स्पेशल एजुकेटर्स की आवश्यकता है। 2015 में सीबीएसई द्वारा अपने सभी स्कूलों में विशेष शिक्षकों को रखे जाने की अनिवार्यता के बाद आने वाले दिनों में भी इस क्षेत्र में जॉब्स के मौके सामने आएंगे।

खेल-खेल में पढ़ाई

स्पेशल एजुकेशन यानी विशेष शिक्षा मुख्य रूप से उन कमजोर बच्चों को दी जाती है, जो मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से अक्षम हैं और सामान्य बच्चों की तरह ठीक से पढ़-लिख नहीं सकते। इंडिविजुअल विद डिसएबिलिटीज एजुकेशन एक्ट (आइडीईए) 1990 के अंतर्गत सरकार की ओर से ऐसे विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए इस शिक्षा का प्रावधान किया गया है। स्कूलों में ऐसे बच्चों को विशेष शिक्षकों द्वारा शिक्षा दी जाती है, जो ऐसे बच्चों को पढ़ाने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित होते हैं। स्कूलों में ये शिक्षक खेल-खेल में आधुनिक तकनीक की मदद से उन्हें बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराते हैं।

जॉब संभावनाएं

जॉब्स के बारे में बताते हुए नोएडा स्थित जागरण पब्लिक स्कूल के प्रिंसिपल डॉ. डीके सिन्हा बताते हैं कि, ‘सरकारी ही नहीं, पब्लिक स्कूलों में भी स्पेशल शिक्षकों के लिए बड़े पैमाने पर मौके हैं। ऐसा इसलिए कि औसतन सभी पब्लिक स्कूलों में 5 से 8 विशेष आवश्यकता वाले बच्चे होते हैं, जो लर्निंग डिस्ऑर्डर, हाइपरएक्टिव तथा अटेंशन डेफिसिट डिस्ऑर्डर जैसी बीमारियों से ग्रस्त होते हैं। ऐसे में विशेष शिक्षकों के बगैर न तो इन बच्चों को समुचित शिक्षा दी जा सकती है और न ही इनके एकेडमिक परफॉर्मेंस में सुधार लाया जा सकता है। यही कारण है कि विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को पढ़ाने के लिए हर स्कूल में ऐसे शिक्षक रखे जा रहे हैं। जेपीएल ने भी विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए ‘माइलस्टोन इंटीग्रेटेड लैब’ नाम से इंक्लुसिव एजुकेशन लैब स्थापित कर रखा है, जहां एक मल्टीडिसिप्लिनरी टीम इन बच्चों के विकास के लिए काम करती है।’ लर्निंग डिसएबिलिटी में स्पेशलाइजेशन करने वालों की सेवाएं स्पीच थेरेपिस्ट, ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट और साइकोलॉजिस्ट भी खूब ले रहे हैं, जो ऐसे बच्चों की काउंसलिंग करके उनके शैक्षिक कार्यप्रदर्शन में सुधार लाने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा, एनजीओ में भी स्पेशल एजुकेशन के बैकग्राउंड वालों के लिए नौकरी के मौके हैं। चाहें, तो अपना चाइल्ड गाइडेंस क्लीनिक या इंटरवेंशन सेंटर्स भी शुरू कर सकते हैं।

कोर्स एवं योग्यता

सरकारी या प्राइवेट स्कूलों में स्पेशल एजुकेशन टीचर बनने के लिए देश के विभिन्न संस्थानों में कई तरह के कोर्सेज संचालित हो रहे हैं, जैसे कि डीएड इन स्पेशल एजुकेशन, बीएड इन स्पेशल एजुकेशन। डीएड डिप्लोमा प्रोग्राम है, जिसे 12वीं के बाद किया जा सकता है, जबकि बीएड के लिए बैचलर डिग्री होनी चाहिए। बीएड के बाद इसी में आगे चलकर एमएड और पीएचडी भी किया जा सकता है। विभिन्न क्षेत्रों (इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटीज, हियरिंग इंपेयरमेंट, विजुअल इंपेयरमेंट एवं लर्निंग डिसएबिलिटी) में स्पेशलाइजेशन भी किया जा सकता है। कोर्स करने के बाद किसी सरकारी-निजी स्कूल में पढ़ाने के लिए रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया से लाइसेंस लेने की भी आवश्यकता होती है। इसके अलावा, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन डिपार्टमेंट ऑफ हायर एजुकेशन की ओर स्कॉलरशिप प्राप्त करके भी स्पेशल एजुकेशन का प्रशिक्षण ले सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए http://mhrd.gov.in/external-scholarship-norway देखें।

प्रमुख संस्थान

  • नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द एम्पॉवरमेंट ऑफ पर्सन्स विद इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटीज, सिकंदराबाद www.niepid.nic.in
  • नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द एम्पॉवरमेंट ऑफ पर्सन्स विद मल्टीपल डिसएबिलिटीज, चेन्नई http://niepmd.tn.nic.in
  • अली यावर जंग नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पीच ऐंड हियरिंग डिसएबिलिटीज, मुंबई http://ayjnihh.nic.in
  • नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर द एम्पॉवरमेंट ऑफ पर्सन्स विद विजुअल डिसएबिलिटीज, देहरादून http://nivh.gov.in
  • टीचर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, दिल्ली सोसाइटी फॉर द वेलफेयर ऑफ स्पेशल चिल्ड्रेन, दिल्ली http://dswspecialchildren.org

सैलरी

विशेष शिक्षकों को प्रशिक्षित स्नातक शिक्षकों के बराबर ही सैलरी मिल रही है। सरकारी स्कूलों में ऐसे शिक्षकों को 35 हजार से लेकर 55 हजार रुपये तक सैलरी मिल रही है, जबकि निजी पब्लिक स्कूलों में भी इन विशेष शिक्षकों को 40-50 हजार रुपये तक सैलरी मिल जाती है।


डॉ. प्रकाश कुमार (लेखक नई दिल्ली के एम्स में साइंटिस्ट ‘सीहैं)

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