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जानें कुछ ऐसे टीचर्स के बारे में जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों को भूलकर शिक्षण को सर्वोपरी समझा

इस दुनिया में शिक्षक के पेशे को सबसे अच्छे और आदर्श पेशे के रुप में माना जाता है क्योंकि किसी भी छात्र की ज़िन्दगी को संवारने में शिक्षक एक अहम् भूमिका निभाता है. यह सही है कि सभी शिक्षकों के पढ़ाने का तरीका अलग-अलग होता है, किन्तु शिक्षक कभी भी बुरे नहीं होते. शिक्षक हमेशा अपने विद्यार्थियों को खुश और सफल देखना चाहते हैं. एक अच्छा शिक्षक कभी अपना धैर्य नहीं खोता और हर विद्यार्थी को उसकी समझने की शक्ति के अनुसार ही पढ़ाता है.

आज हम बात करेंगे कुछ ऐसे टीचर्स की जो हम सबके लिए एक मिशाल है. उनका मकसद बस बच्चों को शिक्षित करना है.

  • रजनीकांत मेंडे:

पूने (महाराष्ट्र) से करीब 100 किलोमीटर दूर भोर तहसील में एक चन्द्र नामक गाँव है जिसमें 15 झोपड़ियों में 60 के करीब लोग रहते हैं. यहाँ एक ऐसा स्कूल भी है जिसमें केवल 1 ही बच्चा पढ़ता है. युवराज सांगले नाम के 8 वर्ष के इस छात्र को पढ़ाने के लिए 29 वर्षीय शिक्षक रजनीकांत मेंडे को 12 किलोमीटर के मिट्टी के ट्रैक को पार करना पड़ता है. मेंडे के लिए अपने स्थान और स्कूल के बीच के इस गंदे रास्ते (जो बारिश में और भी बेकार हो जाता है) के सफ़र को पूरा करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण होता है, किन्तु अपने सारी परेशानियों को भूल कर वे पिछले आठ सालों से इस मिट्टी के ट्रैक को पार कर अपने स्कूल के एकमात्र छात्र को पढ़ाने आते हैं. स्कूल पहुंचने के बाद, सबसे पहले रजनीकांत मेंडे को युवराज को ढूँढना पड़ता है जो अक्सर पेड़ों में छिप जाता है क्योंकि वह ऐसे स्कूल में पढ़ना नहीं चाहता जहां उसका कोई सहपाठी या मित्र नहीं हैं.

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  • बाबर अली:

कहते है पढ़ने और पढ़ाने की कोई उम्र नहीं होती. व्यक्ति किसी भी उम्र में पढ़ा सकता है. ऐसी ही एक उदाहरण है पश्चिम बंगाल में रहने वाले बाबर की जिन्होंने 9 साल की उम्र से अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर एक अमरुद के पेड़ के नीचे स्कूल शुरू किया. कक्षा 5 में पढ़ने वाले बाबर और उनके मित्र कक्षा में जो भी पढ़ते थे वह अपने द्वारा शुरू किये गये स्कूल के बच्चों को पढ़ाते थे. बाबर ने चाक के टुकड़े और ब्लैकबोर्ड के लिए घर की पुरानी टाइल्स का उपयोग किया. बाबर को अपना स्कूल चलाने के लिए किसी भी संसाधन की आवश्यकता नहीं थी, उन्हें जरुरत थी तो सिर्फ पढ़ाई के प्रति समर्पित छात्रों की. बाबर अली को लोग दुनिया में सबसे कम उम्र का हेडमास्टर के नाम से भी जानते हैं.

  • आदित्य कुमार:

आदित्य कुमार को लोग साइकिल गुरुजी के नाम से भी जानते हैं. जिनके अनुसार अगर छात्र स्कूल तक नहीं पहुँच सकते तो टीचर्स को छात्रों तक पहुँचना चाहिए. वर्ष 1995 से आदित्य कुमार हर दिन 60 से 65 किमी तक साइकिल चला कर लखनऊ (उत्तर प्रदेश) की झोपड़ियों में रहने वाले बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करने जाते हैं.

  • राजेश कुमार शर्मा:

श्री राजेश कुमार शर्मा के अनुसार शिक्षा किसी बिल्डिंग की मोहताज़ नहीं है. वर्ष 2005 में राजेश कुमार ने दिल्ली में एक मेट्रो के पुल के नीचे एक स्कूल शुरू किया जिसमें आसपास के गरीब बच्चों को पढ़ाया जाता है. इस स्कूल का नाम उन्होंने “Under the Bridge School” रखा है.

  • अब्दुल मलिक:

केरल के मलप्पुरम डिस्ट्रिक्ट में अब्दुल मलिक प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने जाते हैं. वे स्कूल समय पर पहुँचने के लिए नदी में तैर कर जाते हैं. उनके अनुसार स्कूल पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता यही है. अगर वे घर से स्कूल तक की दूरी बस से पूरी करते हैं, तो उन्हें 12 किलोमीटर सफ़र करने के लिए 3 घंटे से भी अधिक का समय लगेगा.

  • विमला कौल:

80 वर्ष की विमला कौल दिल्ली के मदनपुर खादर नामक गाँव के बच्चों को शिक्षा प्रदान कर रही हैं. टीचर्स की संख्या कम होने के कारण विमला कौल गाँव के बच्चों को पढ़ाने के लिए सरिता विहार के कुछ छात्रों को अपने साथ लाती हैं. पहले उनके पास इसके लिए कोई जगह नहीं थी जिसके चलते उन्हें बच्चों को एक पार्क में पढ़ाना पड़ता था, किन्तु अब उनके पास कक्षा 2 तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए एक बिल्डिंग है.

निष्कर्ष:

उपर दिए गए नाम ऐसे व्यक्तियों के हैं जिन्होंने अपने निजी स्वार्थों के बारे में न सोच कर गरीब और  शिक्षा के प्रति समर्पित छात्रों को पढ़ाने का हर संभव प्रयास किया. जिनके लिए उम्र कोई मान्यता नहीं रखती. इसलिए हमें अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए और उनके द्वारा पढ़ाये गए हर टॉपिक को ध्यान से पढ़ना चाहिए.

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