भारत में कॉलेज कैंपस में रैगिंग से बचने के तरीके और रैगिंग प्रिवेंशन प्रोसीजर

भारत, बांग्लादेश और श्री लंका सहित साउथ एशियन नेशन्स के हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस, कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपसों में ‘रैगिंग’ सीनियर और फ्रेशर या जूनियर स्टूडेंट्स के बीच एक आम रस्म बन चुकी है. वैसे तो ‘रैगिंग’ अच्छे अर्थों में सीनियर स्टूडेंट्स और फ्रेशर स्टूडेंट्स के बीच परिचय करने के ऐसे साधन के तौर पर शुरू की गई होगी जिसमें हल्का-फुल्का हंसी-मजाक और मनोरंजन भी शामिल हो. लेकिन हमारे देश भारत में सुप्रसिद्ध कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़, विशेष तौर पर जाने-माने मेडिकल कॉलेजों की हिस्ट्री स्टूडेंट्स की रैगिंग की घटनाओं से भरी पड़ी है. कुछ मामलों में विक्टिम स्टूडेंट्स अत्यधिक डर, निराशा, दुःख और अपमान की वजह से सुसाइड तक कर लेते हैं. आज हमारे देश सहित दुनिया के अनेक देशों के कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपसों में किसी भी किस्म की रैगिंग एक दंडनीय अपराध बन चुकी है. विक्टिम स्टूडेंट को पहुंचे कष्ट, शारीरिक-मानसिक चोट और रैगिंग की गंभीरता के आधार पर रैगिंग करने वाले स्टूडेंट्स को सजा या दंड दिया जाता है.

हमारे देश में इंडियन पेनल कोड (IPC), हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस में रैगिंग की रोकथाम के लिए यूजीसी रेगुलेशन्स, 2009 और अन्य गवर्नमेंट बॉडीज के रैगिंग से निपटने के लॉज़ और नियमों (जैसेकि, ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) और मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (MCI) ने रैगिंग से निपटने के लिए अपने रेगुलेशन्स तैयार किये हैं) के मुताबिक कानूनी कारवाई की जा सकती है.

भारत के विभिन्न कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपसों में होने वाली स्टूडेंट रैगिंग

  • ड्रेस कोड से संबंधित रैगिंग

इस किस्म की रैगिंग में फ्रेशर स्टूडेंट्स को कुछ खास तरह की ड्रेसेज पहने और बालों को अजीब ढंग से रखने के लिए मजबूर किया जाता है ताकि सबका ध्यान उन स्टूडेंट्स की तरफ जाये और लोग उनका मजाक बनाएं. स्पेशल ड्रेस कोड में स्टूडेंट्स अनकम्फ़र्टेबल भी रहते हैं.

  • अपशब्द या स्लैंग

इस रैगिंग में फ्रेशर्स को काफी ज्यादा स्टूडेंट्स के सामने वल्गर सॉन्ग्स सुनाने या डायलॉग बोलने के लिए मजबूर किया जाता है. रैगिंग के दौरान सीनियर्स फ्रेशर्स को अपमानसूचक नामों से बुलाते हैं और बाद में भी दूसरे सभी स्टूडेंट्स उस विक्टिम स्टूडेंट को उसी अपमानजनक नाम से बुलाने लगते हैं.

  • अपमान करके या मजाक उड़ाकर मानसिक चोट पहुंचाना

इस किस्म की रैगिंग में स्टूडेंट्स को अनेक किस्म से अपमानित किया जाता है और उनके गाने, बोलने के तरीके, पहनावे या किसी भी अन्य तरीके से विक्टिम स्टूडेंट्स का काफी मजाक उड़ाया जाता है. इस किस्म की रैगिंग में रंग-रूप, जाति, अमीरी-गरीबी, क्षेत्र, धर्म या जेंडर से संबंधित कमेंट्स आते हैं.

  • रंग-रूप, जाति, धर्म या जेंडर से संबंधित रैगिंग

फ्रेशर स्टूडेंट्स को अक्सर अपने रंग-रूप, जाति, धर्म या जेंडर को लेकर भद्दे कमेंट्स या फब्तियां सुननी पड़ती हैं और कॉलेज या यूनिवर्सिटी कैंपस के स्टूडेंट्स विक्टिम स्टूडेंट्स का इन बेसिस पर लगातार मजाक उड़ाते रहते हैं. ऐसे में, कई बार दुखी होकर विक्टिम स्टूडेंट्स सुसाइड तक कर लेते हैं

  • बर्थ प्लेस और इकनोमिक बैकग्राउंड से संबंधित रैगिंग

इस किस्म की रैगिंग का शिकार अकसर गांव, कस्बों और छोटे शहरों के गरीब स्टूडेंट्स होते हैं.  

  • शारीरिक मारपीट

कई बार विक्टिम स्टूडेंट्स को शारीरिक रूप से चोट भी पहुंचाई जाती है या उनके साथ बेवजह लड़ाई करके मार-पीट की जाती है.

  • सेक्सुअल ओफेंसेज

बहुत बार सीनियर स्टूडेंट्स विक्टिम स्टूडेंट्स के प्रति इस किस्म के अपराध भी करते हैं और विक्टिम स्टूडेंट का काफी मानसिक और शारीरिक शोषण होता रहता है. विक्टिम स्टूडेंट्स अपमान के डर से सबकुछ सहते रहते हैं.

  • प्रेशर का माहौल बना देना

कई बार सीनियर स्टूडेंट्स फ्रेशर या जूनियर स्टूडेंट्स के लिए डर और प्रेशर का ऐसा माहौल कॉलेज कैंपस में बना देते हैं कि स्टूडेंट्स कॉलेज जाने से डरते हैं या फिर, कॉलेज हॉस्टल में डर और प्रेशर के माहौल में दिन-रात जीते हैं.  

  • एकेडेमिक हर्डल्स

इस किस्म की रैगिंग में फ्रेशर या जूनियर स्टूडेंट्स को क्लासेज अटेंड नहीं करने दी जाती या सीनियर स्टूडेंट्स उनसे अपने असाइनमेंट्स बनवाते हैं जिससे विक्टिम स्टूडेंट्स अपनी पढ़ाई नहीं कर पाते हैं.

  • नेशनैलिटी और लैंग्वेज

किसी विदेशी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को उनकी नेशनैलिटी, लैंग्वेज या रेस के आधार पर लगातार परेशान किया जाता है. कई बार विक्टिम स्टूडेंट्स पर इस वजह से जानलेवा हमला भी हो जाता है.

कॉलेज/ यूनिवर्सिटी कैंपस में रैगिंग के कुछ खास कारण

  • बदला लेने का उपाय

किसी भी कॉलेज या यूनिवर्सिटी कैंपस में बहुत बार सीनियर स्टूडेंट्स किसी फ्रेशर स्टूडेंट की रैगिंग केवल अपना कोई पुराना बदला लेने के लिए करते हैं.

  • पीअर प्रेशर

कई बार कॉलेज स्टूडेंट्स अपने दोस्तों और पीअर्स के बीच अपना रॉब डालने के लिए या फिर, उनके बार-बार कहने और उकसाने पर फ्रेशर स्टूडेंट्स की रैगिंग कर देते हैं.

  • धन या गिफ्ट्स हासिल करना

इस रैगिंग का कारण अमीर फ्रेशर्स या जूनियर स्टूडेंट्स से रुपया-पैसा ऐंठना, नई ड्रेस या अन्य गिफ्ट आइटम्स जबरदस्ती हासिल करना होती है जैसेकि किसी फ्रेशर ने नई और महंगी घड़ी पहनी हो तो रैगिंग के दौरान रैगिंग करने वाला सीनियर स्टूडेंट वह घड़ी जबरदस्ती छीन ले या फिर विक्टिम स्टूडेंट से बार-बार धमकी देकर रुपये-पैसे की मांग करता रहे.

  • सताने या चोट पहुंचाने की ख़ुशी

कुछ लोगों को अन्य लोगों को शारीरिक, मानसिक चोट पहुंचाने में या फिर अपने से कमजोर लोगों को डराने-धमकाने में ख़ुशी मिलती है. ऐसे सीनियर स्टूडेंट्स अक्सर फ्रेशर स्टूडेंट्स की रैगिंग करते हैं.

  • सीनियोरिटी का रॉब

बहुत बार किसी कॉलेज या यूनिवर्सिटी के सीनियर स्टूडेंट्स अपने जूनियर और फ्रेशर स्टूडेंट्स पर अपनी सीनियोरिटी का रॉब डालने के लिए ही रैगिंग करते हैं ताकि जूनियर स्टूडेंट्स अपने सीनियर स्टूडेंट्स से  डरकर उनकी हरेक अच्छी या बुरी बात मानते रहें. 

भारत में कॉलेज कैंपस में रैगिंग से बचने और रैगिंग को पूरी तरह रोकने के कुछ महत्वपूर्ण तरीके

  • कॉलेज/ यूनिवर्सिटी काउंसलर

अधिकतर स्टूडेंट्स अपने कॉलेज की बातें अपने पेरेंट्स या गार्जियंस से शेयर नहीं करते हैं. ऐसे में, हरेक कॉलेज या यूनिवर्सिटी में काउंसलर्स का महत्व काफी बढ़ जाता है जो विक्टिम स्टूडेंट्स की शिकायत पर तुरंत एक्शन ले सकते हैं.  

  • क्लोज्ड सर्किट टेलीविज़न (CCTV)

आजकल कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैंपसों में जगह-जगह लगे CCTV कॉलेज/ यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन की आंख और कान बन गए हैं जो कैंपस के भीतर रैगिंग होने से रोकने का काफी अच्छा साधन हैं.

  • एंटी-रैगिंग स्क्वैड

सीनियर स्टूडेंट्स की एक टीम या कुछ टीमें एंटी-रैगिंग स्क्वैड के तौर पर कैंपस में हरेक जगह रैगिंग की घटनाओं पर नजर रख सकती हैं ताकि कैंपस के भीतर बिलकुल भी रैगिंग न हो सके.

  • एंटी-रैगिंग कमेटी

हरेक कॉलेज या यूनिवर्सिटी में एंटी-रैगिंग कमेटी अपने कैंपस में एंटी-रैगिंग के रूल्स एंड रेगुलेशन्स के मुताबिक सभी जरुरी एक्शन्स ले सकती है ताकि रैगिंग को पूरी तरह रोका जा सके.

  • मॉनिटरिंग सेल – रैगिंग

कई कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में कुछ सीनियर स्टूडेंट्स, टीचिंग स्टाफ और सीनियर फैकल्टी मेंबर्स मिलकर रैगिंग के खिलाफ मॉनिटरिंग सेल बनाकर अपना काम करते हैं. ऐसे कॉलेज और यूनिवर्सिटी में सीनियर स्टूडेंट्स मॉनिटरिंग सेल के डर की वजह से फ्रेशर स्टूडेंट्स की रैगिंग नहीं करते हैं.

  • फ्रेशर स्टूडेंट्स का सीनियर स्टूडेंट्स के साथ इंटरैक्शन

कॉलेज/ यूनिवर्सिटी का नया सेशन शुरू होने के साथ ही सीनियर-जूनियर/ फ्रेशर स्टूडेंट्स के बीच हेल्दी इंटरैक्शन रैगिंग की घटनाओं को प्रभावी तरीके से रोक सकता है. इस इंटरैक्शन के समय लेक्चरर और प्रोफेसर भी मौजूद रहें तो काफी अच्छा रहे.

  • वास्तविकता की जानकारी

बहुत बार सीनियर स्टूडेंट्स केवल अपना टाइम पास करने या फिर, हंसी-मजाक के लिए फ्रेशर्स की रैगिंग करते हैं. उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं होता है कि विक्टिम स्टूडेंट को कितनी अधिक शारीरिक-मानसिक चोट पहुंच सकती है. ऐसे में अगर कॉलेज एडमिनिस्ट्रेशन सीनियर स्टूडेंट्स को रैगिंग की वास्तविकता की सही जानकारी पहले से ही प्रदान करे तो शायद रैगिंग की घटनाओं में काफी कमी आ जाए.

  • पेरेंट्स/ गार्जियंस की जिम्मेदारी

विक्टिम स्टूडेंट के पेरेंट्स या गार्जियंस की यह जिम्मेदारी है कि वे रैगिंग का शिकार बने अपने बच्चे को हरेक तरीके से सपोर्ट करें और रैगिंग करने वाले स्टूडेंट्स के प्रति कानूनी कारवाई करने के लिए सभी जरुरी कदम उठायें.

  • एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन और पोर्टल

भारत में जून, 2009 से नेशनल लेवल पर एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन शुरू की गई है जिसमें एक ईमेल आईडी और एक 24x7 लाइव टोल-फ्री फ़ोन नंबर (1800-180-5522) है. विक्टिम स्टूडेंट्स एंटी-रैगिंग पोर्टल: www.antiragging.in या  www.amanmovement.org पर भी विजिट कर सकते हैं.

  • नाम के बिना रैगिंग कंप्लेंट्स

एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन में विक्टिम स्टूडेंट या उनके पेरेंट्स/ गार्जियन बिना अपना नाम बताये अपनी रैगिंग कंप्लेंट दर्ज कर सकते हैं. ऐसा इसलिए किया गया है क्योंकि अक्सर विक्टिम स्टूडेंट को रैगिंग करने वाले स्टूडेंट्स के साथ ही कॉलेज कैंपस या कॉलेज हॉस्टल में रहना पड़ता है. नाम पता चलने पर विक्टेम स्टूडेंट को जान का खतरा तक हो सकता है.  

  • रैगिंग से जुड़ी सज़ा और स्ट्रिक्ट एक्शन्स

कॉलेज और यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन रैगिंग के लिए दोषी स्टूडेंट्स के खिलाफ काफी स्ट्रिक्ट एक्शन लें ताकि विक्टिम स्टूडेंट को न्याय मिल सके, भविष्य में अन्य सभी स्टूडेंट्स रैगिंग से बच जाएं और कॉलेज कैंपस में रैगिंग को बढ़ावा न मिल सके. सज़ा के तौर पर दोषी स्टूडेंट्स को कॉलेज से निकाल देना, जेल या फिर जुर्माना भी हो सकता है.

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