इस्लामिक बैंकिंग क्या है और भारत को इससे कैसे फायदा होगा?

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपेक्षाकृत नया शब्द है क्योंकि इस संबंध में बहुत अधिक चर्चा नहीं हो रही है. इस बात का उल्लेख करना यहां ठीक रहेगा कि आरबीआई ने भारत में बैंकिंग की इस प्रणाली को शुरु करने का एक प्रस्ताव रखा है. कुछ लोगों ने इसका स्वागत किया है जबकि कुछ ने इसका जबरदस्त विरोध किया है.

 इस्लामिक बैंकिंग है क्या?

हमने निकट भविषय में शुरु होने वाली बैंकिंग की नई शैली के बारे में चरणबद्ध तरीके से काफी चर्चा की है लेकिन इनकी वास्तविक प्रकृति की व्याख्या करना अभी भी बाकी है. इस्लामिक बैंकिंग शरीयत कानून का अनुपालन करने वाली बैंकिंग गतिविधि को दर्शाता है. इससे बैंकिंग गतिविधियों और इस्लामिक वित्त में शरीयत के कानूनों का व्यावहारिक रूप से लागू किए जाने का संकेत मिलता है. इसका अधिक उपयुक्त नाम होता– 'शरीयत अनुवर्ती बैंकिंग (शरीयत कम्प्लाइअन्ट बैंकिंग)'.

इस प्रकार की बैंकिंग का मुख्य सिद्धांत है यह लोगों को दिए गए ऋण पर ब्याज लेने से रोकता है.  इस्लाम में इसे ‘रीबा’ माना जाता है. दूसरी तरफ, जो चीज इस्लाम में निषिद्ध हैं जैसे शराब, पोर्क (सुअर का मांस) आदि बैंकिंग की इस प्रणाली के माध्यम से वित्तपोषण नहीं किया जाना चाहिए.

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अब सवाल यह उठता है कि यह प्रणाली काम कैसे करेगी क्योंकि इसमें ब्याज से आमदनी नहीं होती? बैंक ऋण से होने वाले लाभ पर फलते– फूलते हैं लेकिन यहां तो ऐसा कुछ भी नहीं है. वास्तव में, इस्लामिक बैंकिंग लाभ और हानि को साझा करने की अवधारणा पर आधारित है. यह कहता है कि आप अनुचित ब्याज अर्जित नहीं कर सकते लेकिन आप निवेशक की ओर से इच्छित जोखिम के तत्व के साथ किए गए निवेश से उचित लाभ कमा सकते हैं. इसलिए इस्लामिक बैंक वहां पैसा देने को आजाद है जहां ब्याज की बजाय लाभ और हानि हो. बैंक इस लाभ को इक्ट्ठा करता है और उसे ऐसी जगह निवेश करता है जो शरीयत के अनुसार हो जैसे शरियत– बॉन्ड आदि. इस तरह, यह कमाई कर सकता है और काफी समय तक बना रह सकता है.

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इस्लामिक बैंकिंगः विकास को समझना

इस्लामिक बैंकिंग मलेशिया में ताबुंग हाजी (Tabung Haji) नाम के वित्तीय संगठन से प्रेरित है जिसने तीर्थयात्रा के लिए ब्याजमुक्त पैसे की जरूरत की मांग को देखते हुए इस प्रवृत्ति की शुरुआत की थी. वर्ष 1963 में, बैंक 1281 जमाकर्ताओं के साथ शुरु हुआ था और जल्द ही इनकी संख्या बढ़ कर 8 लाख हो गई थी. इसके बाद, इस्लामिक बैंक मिस्र में लोकप्रिय हो गए. हाल के वर्षों में विश्व में शरीयत–अनुवर्ती बैंकिंग को बढ़ावा देने के विचार के साथ इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक का विकास हुआ है.

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इस्लामिक बैंकिंग और भारत : आगे की राह

आरबीआई ने हाल ही में एक राय रखी है कि परंपरागात बैंकों में अलग इस्लामिक बैंकिंग विंडो होना चाहिए ताकि हमारे देश में इस्लामिक बैंकिंग को बढ़ावा दिया जा सके. लेकिन यह अवधारणा हमारे देश में कितनी प्रासंगिक है? भविष्य में इस प्रकार की बैंकिंग को किस प्रकार के मुद्दों का सामना करना पड़ सकता है? भारत में इस नए प्रकार की बैंकिंग को सेंटर स्टेज पर देखने से पहले इन मुद्दों को सुलझाए जाने की जरूरत है.

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भारत के लिए इस्लामिक बैंकिंग अपेक्षाकृत नई अवधारणा है. हालांकि, इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि गैर–मुसलमान देश होने के बावजूद चीन, अमेरिका, यूके आदि ने इस संदर्भ में काफी प्रगति की है. भारत क्षमताओं से भरा है और इस्लामिक बैंकिंग मुस्लिम आधार और देश के अप्रयुक्त संसाधनों का प्रयोगकर देश के लिए काफी फायदेमंद होने जा रहा है. केंद्रीय बैंक का यह कदम सही दिशा में है और आने वाले वर्षों में इसकी रुपरेखा तैयार करने की जरूरत है ताकि इसकी राह आसान हो सके. इस्लामिक बैंकिंग भविष्य है और भारत इससे काफी लाभ कमा सकता है.

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