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एक्सपर्ट स्पीक : करियर ऑप्शन के रूप में ह्यूमन रिसोर्स

डॉक्टर दीपक शर्मा ने 1990 में अपना यूपीटीयू से एमबीए कम्प्लीट करने के बाद एक मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में अपने करियर की शुरुआत की.इन्होने सबसे पहले कॉर्निंग इंक कार्पोरेशन में एच आर फील्ड में ज्वाइन किया.

Jan 1, 2020 13:11 IST
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Career in HR – Career in Human Resource Management
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ग्लोबल एचआरलीडर, इन्फ्लूएन्सर और टेड स्पीकर डॉक्टर दीपक शर्मा की जागरण जोश के साथ एक बातचीत

इंटरव्यू का सारांश :

डॉक्टर दीपक शर्मा ने 1990 में अपना यूपीटीयू से एमबीए कम्प्लीट करने के बाद एक मैनेजमेंट ट्रेनी के रूप में अपने करियर की शुरुआत की.इन्होने सबसे पहले कॉर्निंग इंक कार्पोरेशन में एच आर फील्ड में ज्वाइन किया. इस कंपनी में इन्होने लगभग 6 वर्षों तक काम किया और इतने कम समय में एक मैनेजमेंट ट्रेनी से शुरुआत कर इस कंपनी के साउथ एशिया ईस्ट एशिया ऑपरेशन के हेड जैसे पदों पर कार्य करना कॉर्निंग इंक में इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी. उस समय यह विश्व के 6 वीं सबसे बड़ी संस्था थी. इसके बाद इन्होने पेप्सिको होल्डिंग्स, बिरला के भीलवाड़ा ग्रुप,भारत टिश्यूज,एमजीआई और जीएनजी ग्रुप जैसे अनेक बड़ी कंपनियों के साथ काम किया. वर्तमान में ये सिंगापुर के डीएसजी एजी में कार्यरत हैं.

जिस समय उन्होंने ह्यूमन रिसोर्स को अपने करियर के रूप में चुना उस समय यह प्रोफेशन या कोर्स एक ट्रेंडिंग कोर्स था. इस क्षेत्र को चुनने का दूसरा सबसे बड़ा कारण था कि अन्य लोगों से कनेक्ट होने के लिए यह डिपार्टमेंट बेस्ट डिपार्टमेंट है. एच आर ही एक ऐसा डिपार्टमेंट है जहाँ आपको हर तरह के व्यक्ति से मिलने तथा उसके साथ इंटरैक्शन करने का मौका मिलता है.इस डिपार्टमेंट में होने के नाते आप ऑर्गेनाइजेशन के एक छोटे एम्प्लॉयी से लेकर हेड तक के साथ बेझिझक बातचीत कर सकते हैं. यह एम्प्लॉयी तथा मैनेजमेंट के बीच एक पूल का काम करता है तथा इस डिपार्टमेंट का कार्य बहुत चुनौतीपूर्ण भी होता है. किसी भी ऑर्गेनाइजेशन के चार बेसिक पिलर होते हैं – फायनांस,ऑपरेशन,सेल्स एंड मार्केटिंग एवं ह्यूमन रिसोर्स. पहले के तीन डिपार्टमेंट बिना एच आर के कोई भी कार्य नहीं कर सकते हैं.

एक एच आर लीडर के रूप में आपकी सबसे बड़ी ऑब्जरवेशन तथा लर्निंग क्या रही ?

एक बार उन्होंने ने अपनी कंपनी के एच आर हेड से पूछा कि सर अगर मैं आपकी पद तक पहुंचना चाहूं तो इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए ? अध्यक्ष ने उन्हें यह सलाह दिया कि जब आप ऑफिस आते हो प्रतिदिन सुबह सबसे पहले ऑफिस के कर्मचारियों से बातचीत करनी चाहिए,उनकी बातों को सुनना चाहिए,उनकी समस्याओं तथा शिकायतों को समझकर उसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए. सबसे पहले तो एम्प्लॉयी के दर्द का अनुभव करना जरुरी होता है. उसे हर डिपार्टमेंट में जाकर एम्प्लॉयी की समस्याओं को सुनना,देखना तथा समझना चाहिए तथा उनका समय रहते सही निदान ढूँढना चाहिए.ह्यूमन रिसोर्स का काम ही है कर्मचारियों से जुड़ना,उनकी समस्याओं को समझना तथा उनकी समस्याओं से उन्हें छुटकारा दिलाने के लिए सही योजना बनाने का कार्य विशेष रूप से करना चाहिए.

 

किसी ऑर्गनाइजेशन के विकास तथा भविष्य में पी एंड एल से जुड़े दायित्वों के प्रति निर्णायक फैसले लेने में ह्यूमन र्रिसोर्स मैनेजमेंट की ओवरऑल भूमिका क्या होती ?

एचआर की भूमिका उस पहले दिन से ही शुरू हो जाती है जब वे कंपनी के लिए एक संभावित कर्मचारी का इंटरव्यू लेते हैं. वे इंटरव्यू के दौरान कैंडिडेट के विषय ज्ञान, कंपनी कल्चर तथा भिन्न भिन्न मानदंडों के आधार पर उनका टेस्ट लेते है और पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद कंपनी के लिए उन्हें रिक्रूट करते हैं. संक्षिप्त में कहें तो कर्मचारियों की नियुक्ति से लेकर उन्हें कंपनी का एक हिस्सा बनाने तक सारे काम एच आर के जिम्मे ही होता है. ऑर्गेनाइजेशन के बाहरी तथा आतंरिक सभी कर्मचारियों की देखभाल की जिम्मेदारी भी इनकी ही होती है. इसके अतिरिक्त उन्हें कर्मचारियों के रोज रोज के कार्यों तथा उनके व्यवहार पर भी नजर रखनी पड़ती है. यदि हाई लेवल के एच आर प्रोफेशनल की बात की जाय तो ऑर्गेनाइजेशनल डिजाइन, ऑर्गेनाइजेशनल रीस्ट्रक्चरिंग,बिजनेस प्रोसेस इंजीनियरिंग तथा बिजनेस प्रोसेस इम्प्रूवमेंट में इनका महत्वपूर्ण योगदान रहता है.

श्री दीपक का मानना ​​है कि ऐसे व्यक्ति जो किसी ऑर्गेनाइजेशन के लोअर लेवल से लेकर हायर लेवल तक दोनों में ही अपना योगदान देते हैं वे निश्चित रूप से बोर्डरूम की कुर्सी पाने के हकदार हैं. साथ ही वे यह भी कहते हैं कि बेशक बोर्ड रूम के सीईओ आदि का दृष्टिकोण आम लोगों के वनिस्पत थोड़ा अलग ही रहता है. दीपक शर्मा ने

ग्रुप चीफ ह्यूमन रिसोर्स ऑफिसर के रूप में काम किया है और उनके संगठन की लगभग 30 से 35 कंपनियां हैं और उन प्रत्येक कम्पनियों के सीईओ हैं. वे भी उन सीईओ के साथ काम करते हुए बोर्डरूम के कामकाज का हिस्सा रहे हैं. उनके योगदान पूरे समूह के पी एंड एल के लिए थे, न कि सिर्फ एक कंपनी के लिए. इसलिए, यह आवश्यक नहीं है कि किसी संगठन के पी एंड एल में योगदान देने के लिए आपको सीईओ या सीएफओ होना चाहिए, आप अन्य तरीकों से भी इसमें योगदान दे सकते हैं.

कर्मचारियों द्वारा एक दूसरे के विचारों को स्वीकार करने से जुडी रणनीति

जब आप एक अच्छे टीम लीडर के रूप में किसी टीम के साथ काम करते हैं तब आप कोई भी निर्णय व्यक्तिगत आधार पर नहीं लेकर उसे सामूहिक आधार पर लेते हैं. उदाहरण के लिए मानलीजिये कि आप एक सेल्स मैनेजर हैं तथा एक नए डीलर की नियुक्ति करना चाहते हैं. इसके लिए आपको अपने टीम के साथ इसके हानि,लाभ तथा उस समय का मार्केट सीन आदि के विषय में वृहद् स्तर पर चर्चा करनी चाहिए. आपको इस विषय पर जूनियर सेल्स मैनेजर,सेल्स ऑफिसर और अन्य स्टाफ से उनकी प्रतिक्रिया अवश्य लेनी चाहिए. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किस लेवल के अधिकारी है ? जूनियर लेवल या सीनियर लेवल. सिर्फ आपको यह समझ में आना चाहिए कि कोई बात कैसे कहनी है तथा लोगों की प्रतिक्रिया उसपर कैसी है ? कोई भी प्रतिक्रिया देने से पहले ये सोंचे कि किस समय, किस जगह पर और किस तरह की प्रतिक्रिया देनी है ? उदहारण के लिए यदि कोई सेल्समैन सीधे ऑपरेशन डिपार्टमेंट में जाकर अपनी प्रतिक्रिया देता है तो यह सही नहीं होगा. इससे उसमें कार्य कुशलता की कमी झलकती है. ऑपरेशन डिपार्टमेंट में वह वस्तुओं की डिमांड की बात कर सकता है सेल्स की नहीं. वैसे ऑपरेशनल प्रोफेशनल्स सेल्समैन से अपनी फीडबैक की बात कर सकते है. वैसे किसी भी ऑर्गनाइजेशन में क्रॉस फंक्शनल टीम होती है लेकिन किसके लिए किस जगह पर कौन सी प्रतिक्रिया देनी है ? इस बात की पूर्ण जानकारी एक स्किल्ड कर्मचारी को होना चाहिए. यहाँ प्रतिक्रिया देने के कई लेवल होते हैं क्योंकि सभी विभाग अलग अलग सन्दर्भों जैसे विभागीय, कार्यात्मक, व्यक्तिगत आदि के आधार पर भिन्न भिन्न होते हैं. इसलिए उनके लिए दिए जा रहे प्रतिक्रियाओं के विषय में भी सजग रहने की जरुरत पड़ती है क्योकि इनके विषय में चर्चा टीम वर्क के तहत की जाती है.

मुख्य लीडरशिप क्वालिटी जिसका विकास हर कर्मचारी को अपने अन्दर करना चाहिए

श्री दीपक शर्मा का यह मानना है कि आजकल सबसे बड़ी समस्या है लोगों द्वारा लीडरशिप शब्द का गलत अर्थ लगाया जाना. उनका कहना है कि आप किसी भी ऑर्गनाइजेशन को देख लीजिये उसका विभाजन मुख्यतः 4 लेयर में किया गया होता है-एक्स्क्यूटर,प्लानर्स,स्ट्रेटेजिक और लीडरशिप. वे कहते हैं कि आजकल हर कोई लीडर बनने की होड़ में लगा हुआ है अर्थात लीडर बनना चाहता है जो कि संभव नहीं है.जिस तरह किसी जहाज को चलाने के लिए सिर्फ एक ही कप्तान की जरुरत होती है उसी तरह ऑर्गनाइजेशन में भी एक ही कप्तान(लीडर) की जरुरत होती है. यदि जहाज में एक से अधिक कप्तान हो जाएँ और सभी अपने अपने अनुसार जहाज को ले जाने की कोशिश करें तो जरा सोचिये क्या जहाज कभी भी गंतव्य स्थल पर पहुँच पाएगी?हरगिज नहीं. वही बात किसी  ऑर्गनाइजेशन के साथ भी लागू होती है. वे कहते हैं कि ऑर्गनाइजेशन के 4 डिपार्टमेंट के हेड ही अपने अपने कार्यों के लिए लीडर होते हैं. टीम हमेशा बड़े  कर्मचारी से लेकर अंत में छोटे कर्मचारी तक आकर समाप्त होती है. इसलिए हर डिपार्टमेंट का हेड ही उसका लीडर हुआ.लीडरशिप कुल 6 प्रकार की होती है जैसे –सहज लीडरशिप, स्थितिजन्य लीडरशिप आदि. यह उस लेवल पर निर्भर करता है जिस लेवल पर कोई भी कर्मचारी नेता बनना चाहता है लेकिन इससे पहले कर्मचारियों को अपने कार्य तथा अपनी भूमिका की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए. ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई लीडर बन जाय. अगर हर कोई लीडर बन जाए तो अन्य भूमिकाएं जो उतनी ही महत्वपूर्ण है, कौन निभाएगा ?

वर्क प्लेस पर हुए बदलाव को स्वीकार करने हेतु आवश्यक टिप्स और स्ट्रेटेजी

एक वर्किंग प्रोफेशनल के रूप में हम वर्कप्लेस पर हुए बदलाव को सहजतया स्वीकार नहीं कर पाते हैं. ऐसे कोई भी बदलाव जिससे हमारे कंफर्ट जोन पर असर पड़ता है हम उसे स्वीकार नहीं करते हैं.मेट्रो ट्रेन प्रोजेक्ट का उदहारण देते हुए डॉक्टर दीपक कहते हैं किसी भी आधारभूत परियोजना के विकास के दौरान जो परिवर्तन होता है उस असुविधा के प्रति लोगों की शिकायत होती ही है और इसके लिए हमें कई शिकायतों का भी सामना करना पड़ता है. लेकिन कभी कभी हमें अपनी भलाई के लिए परिवर्तन को स्वीकार करना पड़ता है जबकि हम कत्तई स्वीकार करना नहीं चाहते हैं.इसी तरह कार्पोरेट ऑफिस तथा प्रोफेशनल लाइफ में प्रोग्रेस तथा भलाई के लिए बदलाव की जरुरत पड़ती है जिसे आम तौर पर लोग स्वीकार करना नहीं चाहते हैं. प्रारंभिक अवस्था में इस बदलाव का महत्व उन्हें समझ नहीं आता लेकिन कुछ समय बाद वे उसके महत्व को पूरी तरह समझ पाते है

परिवर्तन की अवधारणा के विषय में आगे बोलते हुए डॉक्टर दीपक ने कहा चेंज में मुख्यतः तीन आयाम हैं, यानी

समय के साथ बदलें, मांग के साथ बदलें और स्वयं के लिए बदलें और जो भी इन आयामों में से किसी एक के तहत परिवर्तन स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, वे खुद अपने पतन का कारण बनेंगे.

एक उदाहरण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कुछ साल पहले मोबाइल फोन जो पहले बहुत प्रचलन में थे जैसे नोकिया और ब्लैकबेरी. लेकिन आज ये मार्केट से बिलकुल गायब हैं क्योंकि इन कम्पनियों ने मार्केट में हो रहे बदलाव के अनुरूप अपने आप को नहीं बदला. दूसरी तरफ मोबाइल के कई ब्रांड आये जो मार्केट और कस्टमर की जरूरतों के अनुरूप अपने प्रोडक्ट में परिवर्तन करते रहें, ये सारे आज के मार्केट में पूरी तरह से सफल हैं और बिजनेस कर रहे हैं. कार्पोरेट लाइफ और प्रोफेशनल लाइफ में भी यह बात समान रूप से लागू होती है. कोई भी ऑर्गनाइजेशन तथा कर्मचारी जो परिवर्तन को स्वीकार करने के लिए हमेशा मानसिक रूप से तैयार रहते हैं उनकी प्रोफेशनल लाइफ सफल रहती है.

परिवर्तन के विषय में आगे और कहते हुए डॉक्टर शर्मा कहते है कि परिवर्तन एक झरने की तरह होता है जो हमेशा ऊपर से नीचे की ओर बहता है.लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि कॉर्पोरेट ऑर्गनाइजेशन में परिवर्तन हमेशा नीचे से ऊपर की ओर की जाती है जो सरासर गलत है.इसलिए  किसी भी ऑर्गनाइजेशन में  परिवर्तन हमेशा हायर लेवल से लोवर लेवल की ओर किया जाना चाहिए.

कार्यालय में कोई भी कठिन निर्णय लेते वक्त इन सुझावों का पालन करें

डॉ शर्मा कहते हैं कि  काम कर रहे प्रोफेशनल्स को अपने प्रोफेशनल लाइफ में नित्य प्रति निर्णय लेने पड़ते हैं. वैसे निर्णय के विषय में कुछ भी सही या गलत नहीं कहा जा सकता. एक ही निर्णय किसी के लिए सही साबित हो सकता है तो किसी और के लिए गलत भी साबित हो सकता है. लेकिन जब बात कॉर्पोरेट लाइफ से जुड़े निर्णय लेने की हो तो प्रोफेशनल्स को अपनी प्राथमिकताओं की जाँच करने के बाद ही कोई निर्णय लेना चाहिए. उन्हें यह सोचना चाहिए कि क्या उनका निर्णय ऑर्गनाइजेशन के हित में है, इससे उनके जूनियर तथा सीनियर सभी समान रूप से प्रभावित होंगे तथा वे स्वयं भी उससे उतना ही प्रभावित होंगे. ऐसा विचार करने पर अवश्य ही वह निर्णय संभावित रूप से एक अच्छा निर्णय होगा.

प्रोफेशनल लाइफ में सबसे कठिन निर्णय होता है एक एच आर मैनेजर के रूप में किसी कर्मचारी की नियुक्ति  करना या फिर उसे हटाना. कभी कभी एच आर मैनेजर के इस तरह के निर्णय को लोग या अन्य कर्मचारी गलत समझते हैं लेकिन कंपनी हित में लॉन्ग टर्म के लिए यह जरुरी होता है.एक अस्वास्थ्यकर ऑर्गनाइजेशन को बनाए रखने की बजाय वीआरएस योजनाओं और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से कुछ कर्मचारियों की छंटनी बेहतर है जिससे अंततः सभी कर्मचारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं.

संगठनात्मक परिवर्तन के लिए इनोवेशन जरूरी है

डॉ शर्मा के अनुसार,इनोवेशन और क्रिएटिविटी किसी भी प्रोफेशनल के लाइफ का एक अभिन्न अंग है. आजकल चल रहे नवीन इनोवेशन प्रोसेस तो प्रोफेशनल्स की लाइफलाइन है.

इनोवेशन एक ऑर्गनाइजेशन की व्यावसायिक प्रक्रिया में मूल्यवर्धन की प्रक्रिया है और यह किसी भी स्तर और मंच पर हो सकता है. इनोवेशन के माध्यम से ही नित्य नए नए विचार आते हैं तथा कंपनी के लाभ के लिए अलग अलग तरीके से काम किया जा सकता है. किसी भी क्षेत्र में चाहे वह  नए प्रोडक्ट की शुरुआत हो, नई नीतियों का मसौदा तैयार करना या बेहतर संगठनात्मक उत्पादन के लिए सरल और प्रभावी प्रक्रिया बनाना, इन सभी को इनोवेशन द्वारा संचालित किया जाता है.

एक उदाहरण देते हुए उन्होंने यह बात समझाने की कोशिश की है. वे कहते हैं कि एक बार जब मैं किसी टेक्सटाइल कंपनी में कार्य कर रहा था उस समय मेरे समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी बिना किसी केमिकल का प्रयोग किये रेशम फाइबर का प्रसंस्करण. उस समय मैंने टेक्सटाइल इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट किये हुए एक विशेषज्ञ को नियुक्त किया. वे विशेषज्ञ बिना किसी केमिकल का प्रयोग किये प्राकृतिक प्रक्रियाओं से रेशम फाइबर के प्रसंस्करण की जानकारी रखते थे और उन्होंने अपनी इस क्वालिटी का प्रयोग उस समय हमारी कंपनी के लिए किया जिससे हामरी समस्या का समाधान हमें मिल गया.उस समय, यह क्रिएटिविटी और इनोवेशन ही था जिसने संगठन की गुणवत्ता खोए बिना संगठन को चुनौती से उबरने में मदद की.

वह कई संगठनों में व्यक्तिगत बैलेंस स्कोर कार्ड (बीएससी) प्रणाली के कार्यान्वयन पर भी विस्तार से बताते हुए कहते हैं कि इससे उच्च कर्मचारी संतुष्टि के स्तर को सुनिश्चित करते हुए संगठनात्मक उत्पादन में वृद्धि करने में मदद मिलती है.

किसी ऑर्गनाइजेशन में इनोवेशन की प्रक्रिया के महत्व पर जोर देते हुए दीपक शर्मा कहते हैं कि किसी ऑर्गनाइजेशन में यह सफलता की कुंजी है.हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि कुछ मामलों में जबरन क्रिएटिविटी और इनोवेशन विनाशकारी भी साबित हो सकता है.

श्री दीपक शर्मा बहुत जल्द ही एक एच आर प्रोफेशनल के रूप में  युवा प्रोफेशनल्स तथा फ्यूचर एच आर लीडर्स के लिए कुछ और महत्वपूर्ण टिप्स तथा अपने गहन अनुभव और अंतर्दृष्टि को शेयर करेंगे. अतः एचआर प्रोफेशनल की करियर का चुनाव करते समय ध्यान रखने योग्य बातों को जानने तथा नवीन अपडेट्स के लिए हमारे साथ बने रहें.

विशेषज्ञ के बारे में:

श्री दीपक शर्मा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ अहमदाबाद और द इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के पूर्व छात्र रहे हैं. फॉर्च्यून 50 एमएनसी और पब्लिक लिस्टेड कंपनियों में एचआर और इंडस्ट्रीयल रिलेशंस के क्षेत्र में उनके पास 27 वर्षों का अनुभव है. उन्हें यूएस इकोनोमी काउंसिल और यूएस एचआर जर्नल द्वारा दुनिया के शीर्ष 30 सबसे प्रभावशाली ह्यूमन रिसोर्स लीडर्स की सूची में 19 वें स्थान पर रखा गया है. इन्हें अवार्ड विनिग एचआर, थॉट लीडर और टेड टॉक स्पीकर के रूप में जाना जाता है.

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