विशेषज्ञ संवाद: भारत की जनसंख्या देश की संपत्ति है या फिर एक जिम्मेदारी? शिव खेड़ा से जानिये!

हमारे देश में यह जनसंख्या विस्फोट हिंसक अपराधों सहित गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, प्रदूषण, भूख, कुपोषण, वनों की कटाई जैसी अधिकांश समस्याओं का मूल कारण है. हर साल हमारे देश की जनसंख्या बढ़ रही है लेकिन, प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास हो रहा है.

Created On: Jul 26, 2021 17:02 IST
विशेषज्ञ संवाद: भारत की जनसंख्या देश की संपत्ति है या फिर एक जिम्मेदारी? शिव खेड़ा से जानिये!
विशेषज्ञ संवाद: भारत की जनसंख्या देश की संपत्ति है या फिर एक जिम्मेदारी? शिव खेड़ा से जानिये!

भारत की जनसंख्या - संपत्ति या जिम्मेदारी?: हमारे देश में यह जनसंख्या विस्फोट हिंसक अपराधों सहित गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा, प्रदूषण, भूख, कुपोषण, वनों की कटाई जैसी अधिकांश समस्याओं का मूल कारण है. इन दिनों भी अधिकांश भारतीय नागरिकों के लिए जीवन की गुणवत्ता (जीवन जीने के लिए जरुरी सुविधाओं की उपलब्धि सहित) दयनीय है.

हाल की के कुछ अनुमानों के अनुसार, भारत की जनसंख्या चीन से आगे निकल गई है. स्वतंत्र रिपोर्टों ने यह संकेत दिया है कि, कुल मिलाकर भारतीयों के पास 125 करोड़ आधार कार्ड हैं और, लगभग 30 करोड़ नागरिक बिना आधार कार्ड के भारत में रहते हैं. अगर इस अनुमान को एक संदर्भ बिंदु के तौर पर  मान लिया जाए, तो भारत पहले ही 155 करोड़ की कुल आबादी के साथ चीन को पीछे छोड़ चुका है. हमारे पास केवल 02% कृषि भूमि और 04% पीने का पानी है, लेकिन वर्तमान में, भारत में दुनिया की आबादी का लगभग 20% है.

चीन में हर मिनट 11 बच्चे पैदा होते हैं जबकि भारत में हर मिनट 55 बच्चे पैदा होते हैं. भारत में जनसंख्या घनत्व 404 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है. जबकि वैश्विक घनत्व 51 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी है. हमारे देश का यह जनसंख्या विस्फोट किसी बम विस्फोट से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है और प्रभावी जनसंख्या नियंत्रण उपायों को लागू किए बिना एक स्वस्थ, साक्षर, समृद्ध और मजबूत भारत केवल एक सपना बनकर रह जाएगा.

वर्ष 1947 से ही भारत के करदाता देश के विकास में अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं. ये करदाता ही वास्तविक राष्ट्र निर्माता हैं और इन करदाताओं को यह अवश्य सुनिश्चित करना चाहिए कि, उनके प्रतिनिधि राष्ट्रीय हित में कानून बनाएं.

हर साल हमारे देश की जनसंख्या बढ़ रही है लेकिन, प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास हो रहा है. यह ह्रास इतना अधिक है कि, हमारे पास सांस लेने के लिए ताजी हवा और पीने योग्य पानी की कमी हो गई है. तिस पर, वनों की लगातार कटाई के कारण हमारे देश में कृषि भूमि हर साल कम हो रही है.

अधिकांश दूरदर्शी लोग इस बात से सहमत होंगे कि, भारत को दो बच्चों की नीति की आवश्यकता है जिसे गैर-अनुपालन की स्थिति में, सरकारी नौकरियों, सब्सिडी, मतदान का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार जैसे मुद्दों का मानदंड बनाया जाना चाहिए.

यूनाइटेड नेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हम हर साल अपनी आबादी में 2.5 करोड़ लोग और जोड़ रहे हैं, जो ऑस्ट्रेलिया की पूरी आबादी के बराबर है.

भारत के इस जनसंख्या संकट से कैसे निपटें?

जिस तरह इंडोनेशिया ने शिक्षा के माध्यम से ‘दो बच्चे’ नीति को लागू किया है, ठीक उसी तरह से देश की जनता को शिक्षित करना, न केवल आने वाली पीढ़ियों को गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान करने के लिए बल्कि 'डिज़ायर फॉर मेल चाइल्ड' (अर्थात परिवार में लड़के के जन्म की इच्छा) सिंड्रोम को नियंत्रित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है.

ईरानी अधिकारियों ने वर्ष, 1990 के दशक की शुरुआत से वर्ष, 2006 के अंत तक ईरान में परिवार नियोजन करते समय परिवारों को दो से अधिक बच्चे पैदा न करने के लिए प्रोत्साहित किया था. जब परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया गया, तो ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने एक राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू किया और गर्भनिरोधक - गोलियां, कंडोम, आईयूडी, प्रत्यारोपण, ट्यूबल बंधन जैसे अन्य कई  साधनों को देश की जनता द्वारा अपनाने के लिए जोर दिया.

समाधान और उपचार दर्दनाक हो सकते हैं लेकिन फिर, सभी दवाएं मीठी नहीं होती हैं और सभी सर्जरीज़ दर्द रहित नहीं होती हैं, लेकिन यह देश के व्यापक हित में किया जाना चाहिए.

अब समय आ गया है कि, हमारे राष्ट्रीय नेतृत्व में मुख्य मुद्दों का समाधान करने का साहस हो.

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