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ग्लोबल वार्मिंग एक वास्तविक मुद्दा है या कोरी कल्पना

Sep 29, 2017 12:49 IST
Is global warming a real issue or not

इस आर्टिकल में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि क्या वाकई में ग्लोबल वार्मिंग की घटना बहुत घातक है या फिर बस यूँ ही लोग इसे चर्चा का विषय बना रहे हैं.

ग्लोबल वार्मिंग एक वास्तविक मुद्दा है: फ़िलहाल के कुछ वर्षों में हमने बहुत अधिक गर्मी देखी है और मौसम भी बदल रहा है.यहां तक कि कई अध्ययन और शोधकर्ताओं का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग चिंता का विषय है. कई दशकों तक के डेटा का  प्रयोग कर वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि ग्लोबल वार्मिंग धीरे-धीरे पृथ्वी के पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संतुलन को नुकसान पहुंचा रही है.

बर्फ और ग्लेशियरों के पिघलने के कारण कई स्थानों पर समुद्र के स्तर में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. एक विश्वसनीय अध्ययन के अनुसार, पिछले 100 सालों में दुनिया भर में औसतन समुद्र के स्तर में 6.7 इंच की वृद्धि हुई है. लगभग 150 वर्षों के तापमान की नियमित निगरानी के आधार पर तापमान लगातार बढ़ रहा है.

ऑटोमोबाइल उद्योग द्वारा वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन तथा भारी प्रदूषण के कारण महासागरों के तापमान में भी वृद्धि हुई है. वस्तुतः ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से वायुमंडल के तापमान में वृद्धि होती है और वातावरण की उस गर्मी को महासागरों द्वारा अवशोषित किये जाने के कारण महासागर का तापमान बढ़ता जा रहा है.  ये सभी आकड़े महासागरों के लिए पंजीकृत तापमान के रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं.

बड़े पैमाने पर ग्लेशियर पिघलते जा रहे हैं तथा उनका आकार निरंतर छोटा होता जा रहा है.यहाँ तक कि ओजोन गैस जो तापमान को बनाए रखने में मददगार होती है उसके स्तर में भी गिरावट आई है.

महासागरों में एसिड के स्तर बढ़ जाने से उसके अम्लीय होने के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है. इससे निरंतर समुद्री जीव तथा समुद्री पारिस्थितिकी को नुकसान हो रहा है.

ग्लोबल वार्मिंग कोई मुद्दा नहीं  है: यदि आप वास्तव में वैज्ञानिकों और उनके अध्ययन पर भरोसा करते हैं, तो वैज्ञानिकों की एक शाखा का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग एक वास्तविक मुद्दा नहीं है.

हालांकि वे उसी अध्ययन को स्वीकार करते हैं जिसमें यह कहा गया है कि ग्लोबल वार्मिंग एक वास्तविक मुद्दा है. लेकिन उस अध्ययन और उसकी  शैली को समझने का इनका अपना अलग तरीका है.इसके अतिरिक्त उन्होंने अलग से इस विषय पर अपने तरीके से कुछ विभिन्न अध्ययन आयोजित किये हैं.

उनके अध्ययन से यह पता चलता है कि 1990 के मध्य से पृथ्वी का औसत तापमान लगातार स्थिर रहा है और तापमान में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ है. चूँकि यह अध्ययन बहुत देर से शुरू हुआ इसलिए ग्लोबल वार्मिंग की धारणा को समर्थन देने के लिए यहां कोई रिकॉर्ड या डेटा नहीं है. सही तुलनात्मक अध्ययन के लिए एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड का होना जरुरी है.

अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि आर्कटिक क्षेत्र में 2012 से बर्फ की मात्रा में लगभग 50% की वृद्धि हुई है. इस तथ्य को ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की अवधारणा के खिलाफ बहुत दृढ़ता से प्रयोग किया जा सकता है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के परिणामों की भविष्यवाणी करने के लिए उपयोग किए जा रहे जलवायु मॉडल गणना विश्वसनीय नहीं हैं और यह दोषपूर्ण हैं. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वैश्विक तापमान में वृद्धि एक प्राकृतिक घटना हो सकती है.

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