आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को मंत्री पद पर नियुक्ति न करने की सर्वोच्च न्यायालय की सलाह

सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने अपराधी पृष्ठभूमि वाले लोगों को मंत्री न बनाने से संबधित याचिका को 27 अगस्त 2014 को ख़ारिज कर दिया.

Created On: Aug 30, 2014 15:12 ISTModified On: Aug 30, 2014 15:18 IST

सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायधीशों की संविधान पीठ ने उस जनहित याचिका को 27 अगस्त 2014 को ख़ारिज कर दिया जिसमें केंद्र और राज्य सराकारों को आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को मंत्री पद पर नियुक्ति न करने का निर्देश देने की मांग की गई थी. यह जनहित याचिका मनोज नरूला ने वर्ष 2004 में दायर की थी.

संविधान पीठ के अन्य सदस्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति  दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए बोबडे रहे. संविधान पीठ ने यह फैसला 123 पृष्ठों में दिया.
 
संविधान पीठ ने अपने फैसले में उन मंत्रियों को अयोग्य करार देने से इंकार कर दिया जिन पर आपराधिक और भ्रष्टाचार के आरोप तय किए जा चुके हैं. संविधान पीठ ने प्रधानमंत्री को सलाह दी है कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले दागी लोगों को मंत्री का पद नहीं दिया जाए. पीठ ने कहा कि हम दागी सांसदों, विधायकों को मंत्री पद के लिए अयोग्य नहीं ठहरा रहे हैं. यह प्रधानमंत्री के विवेक पर निर्भर करता है कि वह दागी जनप्रतिनिधियों को मंत्रिमंडल में जगह देने के लिए कितने संवेदनशील हैं. संवैधानिक पुनर्जागरण और लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने के लिए दागियों से दूरी बनाए रखना जरूरी है.

संविधान पीठ ने ऐसे लोगों के नामों की सिफारिश राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास न भेजने का फैसला प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के विवेक पर छोड़ दिया. संविधान पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक मशबिरा मात्र है. वह संविधान के अनुच्छेद-75(1) (प्रधानमंत्री एवं मंत्रि परिषद की नियुक्ति) में अयोग्यता नहीं जोड़ सकती लेकिन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को ऐसे लोगों को मंत्री बनाने पर विचार नहीं करना चाहिए, जिनकी पृष्ठभूमि आपराधिक रही है और जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार समेत गंभीर मामलों में आरोप तय किए गए हैं.

संविधान पीठ ने कहा कि संविधान, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों पर गहरा विशवास रखता है और उनसे आशा की जाती है कि वे संवैधानिक जिम्मेदारी और नैतिकता के साथ काम करेंगे. प्रधानमंत्री को संवैधानिक न्यास का विश्वास पात्र समझा जाता है और उन्हें ‘राष्ट्रीय हित’ में काम करना चाहिए. साथ ही स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद-75(1) की व्याख्या करते समय नई अयोग्यता नहीं जोड़ी जा सकती. जब कानून में गंभीर अपराधों या भ्रष्टाचार में अभियोग तय होने पर किसी को चुनाव लड़ने के अयोग्य नहीं माना गया है तो अनुच्छेद-75(1) (केंद्रीय मंत्रिमंडल का चयन) या 164(1) (राज्य मंत्रिमंडल का चयन) में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के अधिकारों की व्याख्या करते हुए उसे अयोग्यता के तौर पर शामिल नहीं किया जा सकता.

संविधान पीठ ने कहा कि उन सांसदों या विधायकों की बात नहीं कर रहे हैं जिनके विरुद्ध अपराध साबित होने पर उनकी सदस्यता निरस्त करने का सर्वोच्च न्यायालय ने ही वर्ष 2013 में फैसला सुनाया था. दो वर्ष से कम सजा पाए व्यक्ति जनप्रतिनधित्व कानून के तहत वर्तमान में भी सांसद निर्वाचित हो सकते हैं और मंत्री पद भी हासिल कर सकते हैं. लेकिन बात उन लोगों की है जिनके विरुद्ध संगीन और गंभीर आरोपों को लेकर अदालत अभियोग तय कर चुकी है. इनमें भ्रष्टाचार के मुकदमे भी शामिल हैं. आरोप तय होने पर क्या उन्हें मंत्री का पद दिया जाना चाहिए. संविधान पीठ ने कहा कि नैतिक और संवैधानिक मूल्य इस तरह के लोगों को मंत्रिमंडल से दूर रखने की ओर इशारा करते हैं.

संविधान पीठ ने कहा कि प्रधानमंत्री को यह ध्यान में रखना चाहिए कि अवांछित तत्व या लोग, जो अपराधों की खास श्रेणी के आरोपों का सामना कर रहें हैं, वे संवैधानिक नैतिकता या सुशासन के सिद्धांतों को बाधित कर सकते हैं या उन्हें रोक सकते हैं और इस तरह संवैधानिक विश्वास घटा सकते हैं. संविधान यही कहता है और प्रधानमंत्री से यही संवैधानिक उम्मीद है. बाकी सब प्रधानमंत्री की समझदारी पर छोड़ा जाता है. हम न तो इससे कुछ ज्यादा कहा रहें हैं न ही कम.
    
पीठ ने आम सहमति से इस मामले पर फैसला दिया. प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा और न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसए बोबडे की ओर से न्यायाधीश न्यायमूर्ति  दीपक मिश्रा ने 123 पृष्ठों का फैसला सुनाया. न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने मुख्य निर्णय से सहमति व्यक्त की परन्तु अपने विचार अलग से व्यक्त किए.

न्यायाधीश न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने कहा कि इस तरह यह मेरा दृढ मत है कि खुद भी भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा एवं सच्चा विश्वास रखने की और अपने कर्तव्यों का पालन वफादारी और ईमानदारी के साथ करने की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्रियों को सलाह है कि वे अपने मंत्रिपरिषद में ऐसे लोगों को शामिल करने से बचें, जिनके खिलाफ आपराधिक अदालत में अनैतिकता और खासतौर पर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के तीसरे अध्याय में दिए अपराधों के तहत आरोप तय किए गए हैं.


जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तीसरे अध्याय संसद और राज्य विधानसभाओं की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराने से जुड़ा है.

विदित हो कि याचिकाकर्ता मनोज नरूला ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल कर मंत्रिमंडल से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मंत्रियों को हटाने की मांग की थी, जिसे वर्ष 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया था, लेकिन याचिकाकर्ता की तरफ से पुनर्विचार याचिका दायर करने पर न्यायालय ने मामले को संवैधानिक बेंच को भेज दिया था.

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