‘कचरे से ऊर्जा’ पर गठित कस्तूरीरंगन कार्यबल ने योजना आयोग को अपनी रिपोर्ट पेश की

‘कचरे से ऊर्जा’ पर गठित कस्तूरीरंगन कार्यबल ने 14 मई 2014 को अपनी रिपोर्ट योजना आयोग को सौंपी.

Created On: May 26, 2014 14:18 IST

‘कचरे से ऊर्जा’ पर गठित कस्तूरीरंगन कार्यबल ने 14 मई 2014 को अपनी रिपोर्ट योजना आयोग को सौंपी. रिपोर्ट में नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू) प्रबंधन के लिए समन्वित दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया गया है, इसमें कहा गया है कि स्रोत पर कचरा इकट्ठा करना और उसमें कमी लाना भी कचरे का कुशल निपटान है.

इस कार्यबल का गठन डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू) के तकनीकी रूप से व्यवहार्य, वित्तीय रूप से व्यावहारिक और पर्यावरण दृष्टि से सक्षम प्रसंस्करण और निपटान तकनीकी की पहचान करने के लिए किया गया था.

रिपोर्ट के मुख्य आकर्षण

•    इस रिपोर्ट में एक केंद्रीकृत अथवा विकेंद्रित कचरा निपटान सुविधाएं स्थाएपित करने पर बल दिया गया है. यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कचरे की मात्रा और गुणवत्ताा क्याि है, और उसके निपटान के लिए क्या  टेक्नॉभलोजी अपनाई जाती है तथा वित्तीाय रूप से यह कितनी व्यिवहार्य है.

•    इस रिपोर्ट में समुचित टेक्नॉभलोजी के चयन के लिए दिशा-निर्देश तय किये गए हैं और यह उस टेक्नॉपलोजी की तरफ स्पतष्ट‍ इशारा करती है जो विभिन्नी वर्गों वाले शहरों द्वारा अपनाई जा सकती हैं.

•    यह रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर देती है कि कचरे से प्राप्ति ईंधन (आरडीएफ) को दहनशील ईंधन के रूप में परिवर्तित करने पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि इस प्रकार के ईंधन को बिजलीघरों में इस्ते माल किया जा सके.

•    शहरी भारत में इस समय नगर-निगमों के पास प्रतिदिन 170,000 टन कचरा आता है. इसका सिर्फ 19 प्रतिशत शोधित किया जाता है और बाकी डंप स्थलों में डाल दिया जाता है. इस कारण स्वापस्य्कि  और पर्यावरण के लिए गंभीर समस्यााएं पैदा हो रहीं हैं.

•    कार्यदल का ज़ोर एमएसडब्ल्यू के सभी घटकों की क्षमता के इष्टतम उपयोग करके निपटान के लिए अपशिष्ट की मात्रा ‘5-R की अवधारणा’ – घटाना (Reduce), पुनर्प्रयोग (Reuse), पुनःप्राप्ती (Recover), पुनःचक्रण (Recycle), पुनःनिर्माण (Remanufacture) का प्रयोग करके एवं एकीकृत नगरपालिका ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के माध्यम से, ऊर्जा प्राप्ती एवं अन्य उपयोगी पदार्थ प्राप्त करके व अवशिष्ट कचरे का सुरक्षित निपटान किया जा सकता हैं.

•    पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) तरीके को सतत कचरा प्रबंधन के लक्ष्यए प्राप्तु करने और सेवा देने का उपयुक्त् तरीका माना गया है. इस रिपोर्ट में पीपीपी मोड के जरिए कचरे से ऊर्जा तैयार करने की परियोजनाएं शुरू करने के तरीके दिए गए हैं, जिसमें 40 प्रतिशत तक व्यवहार्यता अंतर वित्त पोषण भी शामिल है.

•    2031 तक 165 मिलियन टन के अनुमानित अपशिष्ट उत्पादन को देखते हुए, 20 वर्षों में 66 हजार हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता लैंड फिल स्थलों के रूप में होगी, हमारा देश इतनी अधिक मात्रा में भूमि बर्बाद करने का जोखिम नहीं उठा सकता है.

•    कार्यदल (टीएफ़) ने इसे गंभीरता से लिया हैं और लैंड फिल स्थलों को जा रहे कचरे को उपयुक्त प्रौद्योगिकी का उपयोग कर एमएसडब्ल्यू के प्रसंस्करण के माध्यम से कम कम से कम 75 प्रतिशत कम करना जरूरी समझता हैं.

•    यह रिपोर्ट शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) को नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू) प्रबंधन के लिए समन्वित दृष्टिकोण अपनाने के साथ कचरे से ऊर्जा पर पर ध्यान केंद्रित के लिए मार्गदर्शित करती हैं और भारत सरकार और राज्य सरकारों को एक संसाधन, एमएसडब्ल्यू की अप्रयुक्त ऊर्जा क्षमता के दोहन, और उचित संग्रह, परिवहन, प्रसंस्करण और अंतिम निपटान सुनिश्चित करने हेतु नगरपालिका ठोस अपशिष्ट के अनुकूलतम उपयोग की सुविधा के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता के विस्तार की सलाह देती हैं.

पृष्ठभूमि

•    वर्तमान में अनुमानित हैं की शहरी क्षेत्रों में 377 मिलियन लोगों द्वारा प्रतिवर्ष 62 मिलियन टन नगरपालिका ठोस अपशिष्ट (एमएसडब्ल्यू) पदार्थ उत्पन्न किया जाता हैं, जिसका 80% से अधिक नगर निगम प्राधिकारियों द्वारा विवेकहीनता से अस्वास्थ्यकर रूप में डंप यार्ड में निस्तारण किया जाता हैं जो कि स्वास्थ्य और पर्यावरण क्षरण की समस्याओं को बढ़ाती हैं.

•    इस अप्रयुक्त अपशिष्ट में दहनशील कचरे के 32,890 टीपीडी से, जिसमे कचरे से प्राप्तऔ ईंधन (आरडीएफ) शामिल हैं, में 439 मेगावाट विद्युत उत्पादन की क्षमता है; प्रति दिन 1.3 करोड़ घन मीटर बायोगैस या बायोगैस से 72 मेगावाट विद्युत उत्पादन और प्रतिवर्ष 5.4 करोड़ मीट्रिक टन खाद जो कृषि कार्यों में उपयोग में लायी जाती हैं.

•    विद्यमान नीतियां, कार्यक्रम और प्रबंधन संरचना इस अपशिष्ट के प्रबंधन के लिए आसन्न चुनौती पर पर्याप्त रूप से को ध्यान नहीं देते हैं जिसको 2031 तक 165 मिलियन टन एवं 2050 तक 436 मिलियन टन होने का अनुमान हैं. इसके अतिरिक्त अगर एमएसडब्ल्यू का  वर्तमान 62 लाख टन वार्षिक उत्पादन उपचार के बिना फेंक दिया जाना जारी रहता हैं तो इसे प्रतिदिन 340,000 घन मीटर जगह की आवश्यकता होगी (प्रति वर्ष 1,240 हेक्टेयर).

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