प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा तीन देशों की यात्रा: एक विश्लेषण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 अप्रैल से 17 अप्रैल 2015 के बीच तीन देशों (फ्रांस, जर्मनी तथा कनाडा) की यात्रा की.

Created On: May 2, 2015 16:11 ISTModified On: May 2, 2015 16:15 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 9 अप्रैल से 17 अप्रैल 2015 के बीच तीन देशों (फ्रांस, जर्मनी तथा कनाडा) की यात्रा की . इस यात्रा का उद्देश्य द्विपक्षीय रणनीतिक साझेदारी को सशक्त करना, अर्थव्यवस्था में निवेश प्रवाह की वृद्धि तथा द्विपक्षीय वैज्ञानिक एवं तकनीकी सहयोग बढ़ाना था.

प्रधानमंत्री की इस यात्रा का महत्व घरेलू आर्थिक स्थिति एवं सामरिक/राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में होने वाली पहल का विश्लेषण करके समझा जा सकता है.

सामरिक/राजनीतिक क्षेत्र


इस यात्रा में प्रधानमंत्री ने तीन सरकारों के प्रमुखों के साथ तीन वार्ताएं कीं जिसमें फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रेंकोइस होल्लांदे, जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल और कनाडा के प्रधानमंत्री स्टीफन हार्पर शामिल थे. इस दौरान उन्होंने ज्ञापन पत्रों तथा समझौतों पर हस्ताक्षर किये जिसमें रक्षा, उर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतरिक्ष तथा कौशल विकास शामिल हैं.

फ्रांस के साथ भारत के संबंधों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि फ्रांस ने सुरक्षा परिषद् में भारत के स्थाई सदस्यता के लिए सहमति दी है.

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में से एक होने के नाते फ्रांस का सहयोग भारत के लिए अति महत्वपूर्ण है.

फ्रांस से 36 रॉफेल लड़ाकू जेट विमानों को खरीदने के लिए हुए समझौते द्वारा भारत की विश्व में सामरिक भागीदारी मजबूत होगी तथा घरेलू आवश्यकता भी पूरी होगी.

भारत और जर्मनी के बीच संबंधों की मजबूती से भारत यूरोपियन राजनीति में भी मजबूत स्थिति बना सकता है. भारत ने ब्राज़ील, जर्मनी एवं जापान के साथ मिलकर जी 4 ग्रुप बनाया है ताकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में उन्हें शामिल करने के प्रयासों में तेज़ी आ सके.

इस यात्रा के दौरान नेताओं द्वारा जारी किए गए संयुक्त बयानों से भारत का दूसरे देशों के साथ बढ़ते सहयोग का पता चलता है.

भारत के प्रधानमंत्री की कनाडा यात्रा से दोनों देशों के बीच ऊर्जा क्षेत्र में होने वाली प्रगति के तथ्य स्पष्ट देखे जा सकते हैं.

केमको कारपोरेशन के साथ हुए व्यापारिक समझौते से 2013 के भारत-कनाडा परमाणु सहयोग समझौते को लागू करने में आसानी होगी तथा द्विपक्षीय सहयोग से ऊर्जा की कमी को दूर किया जा सकेगा.

आर्थिक क्षेत्र

भारत के लिए यूरोपीय संघ (ईयू) व्यापारिक समझौते, निवेश तथा विश्व में प्रोद्योगिकी संचार का स्त्रोत है. इन्हीं कारणों से 28 सदस्यी इस राजनीतिक-आर्थिक समूह के साथ सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है.

इसके अलावा पूंजी निर्माण की दर वर्ष 2011-12 में 38.2 थी जो वर्ष 2013-14 में कम होकर 32.3 रह गयी. इसे नियंत्रित करने तथा डिजिटल इंडिया तथा स्मार्ट सिटी के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यूरोपीय संघ के साथ मजबूत संबंधों की आवश्यकता है.  

इस यात्रा के दौरान जर्मनी ने जून 2007 में शुरू किये गए भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत की प्रक्रिया को पूरा करने पर सहमति जताई.

अमेरिका, चीन तथा जापान के बाद जर्मनी विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. जर्मनी यूरोपियन संघ का सबसे बड़ा उत्पादक राष्ट्र है. जर्मनी ने भारत को निर्माण, कौशल विकास, शहरी विकास, नदियों की सफाई,  पर्यावरण के क्षेत्र में सहयोग हेतु सक्रिय कदम उठाने के लिए सहमति जताई.

भारत का फ्रांस से ऊर्जा क्षेत्र में अपेक्षा रखना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि फ्रांस में 75 प्रतिशत बिजली परमाणु ऊर्जा से बनती है.

इस यात्रा के दौरान फ्रांस की प्रमुख परमाणु कंपनी एआरईवीए ने स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी विकसित करने के लिए एल एंड टी और एनपीसीआईएल के साथ दो समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए तथा महाराष्ट्र स्थित जैतापुर परमाणु बिजली संयंत्र पर कार्य में तेज़ी लाने पर भी सहमति जताई.

इसी प्रकार विश्व के सबसे बड़े यूरेनियम आपूर्तिकर्ता केमको ने भारत को 350 मिलियन डॉलर के परमाणु ईंधन की आपूर्ति पर सहमति जताई. यह आपूर्ति 2015 से 2020 तक की जाएगी.

दोनों देशों ने भारत-कनाडा व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर सितम्बर 2015 तक  बातचीत का दौर समाप्त करने तथा विदेशी निवेश संवर्धन और संरक्षण करार 2007 को जल्द से जल्द लागू करने पर भी सहमति जताई. फ्रांस और कनाडा के साथ परमाणु ऊर्जा सौदे इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत विश्व का चौथा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है.

निष्कर्ष

संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि मोदी द्वारा तीन विकसित देशों (जी-8 के सदस्य) की यात्रा देश में व्यापारिक स्थिति का विकास, तकनीकी संसाधनों की मौजूदगी तथा आवश्यक पूँजी की उपलब्धता सुनिश्चित कराने के लिए की गयी थी.

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