मानव और प्राकृतिक प्रणालियों पर जलवायु प्रभावों पर आईपीसीसी की पांचवीं आकलन रिपोर्ट जारी

आईपीसीसी द्वारा जारी रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु पर गंभीर, व्यापक और अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ सकता है.

Created On: Apr 1, 2014 17:15 ISTModified On: Apr 1, 2014 17:20 IST

आईपीसीसी द्वारा 30 मार्च 2014 को जारी रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग की वजह से जलवायु पर गंभीर, व्यापक और अपरिवर्तनीय प्रभाव पड़ सकता है. संयुक्त राष्ट्र समर्थित पैनल की रिपोर्ट "जलवायु परिवर्तन 2014: प्रभाव, अनुकूलन और भेद्यता" (Climate Change 2014: Impacts, Adaptation and Vulnerability) को जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) ने अंतिम रूप दिया.

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विश्व भर में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर यह व्यापक औऱ तकनीकी मूल्यांकन जापान के योकोहामा में वैज्ञानिकों और अधिकारियों के एक सप्ताह तक चली चर्चा के बाद प्रकाशित की गई थी. बैठक 25 से 29 मार्च 2014 के बीच आयोजित की गई और यह रिपोर्ट 12000 वैज्ञानिक सहकर्मियों की समीक्षा के अध्ययन पर आधारित है.

संयुक्त राष्ट्र के जलवायु पैनल ने कहा कि रिपोर्ट में उसके प्रभावों के पैमाने पर ढेरों सबूत हैं. वैज्ञानिकों से भरा यह पैनल वर्तमान में प्राकृतिक प्रणालियों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव से चितिंत तो था ही लेकिन इसके साथ ही वह इसके मानव जाति पर पड़ने वाले प्रभाव से भी डरा हुआ था. रिपोर्ट के सारांश में यह दावा भी किया गया है कि बढ़ते तापमान की वजह से स्वास्थ्य, घर, खाद्य एवं सुरक्षा पर भी खतरा मंडरा सकता है.

जारी की गई रिपोर्ट में इस तथ्य पर खास तौर पर प्रकाश डाला गया है कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पड़ने वाले प्रभावों के वैज्ञानिक सबूत वर्ष 2007 में जारी आखिरी रिपोर्ट की तुलना में लगभग दुगुना हो गया है. इसमें ग्लोशियरों का पिघलना या परमाफोर्स्ट जैसे तथ्यों पर भी प्रकाश डाला गया है. इसमें कहा गया है कि हाल के दशकों में ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव प्राकृतिक और मानव प्रणाली के साथ सभी महाद्वीपों और सागरों पर पड़ा है.
 
सारांश दस्तावेज में सागर के साथ मीठेपानी के प्रणाली पर ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को रेखांकित किया गया है और कहा गया है कि सागर पहले से भी अधिक अम्लीय हो गए है जिससे सागर में पाए जाने वाले कोरल और अन्य प्रजातियों के लिए खतरा पैदा हो गया है.

सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र जिस पर प्रकाश डाला गया है वह खाद्य सुरक्षा का है. जलवायु में होने वाले ये परिवर्तन वर्ष 2050 तक गेहूं, चावल और मक्के जैसे अनाजों की पैदावार को प्रभावित कर सकते हैं. सितंबर 2013 में आईपीसीसी ने चेतावनी दी थी कि मुख्य रूप से मनुष्य ही ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से समुद्र के स्तर में वृद्धि हो रही है. तीसरी रिपोर्ट जिसमें जलवायु परिवर्तन के शमन पर फोकस होगा वह जर्मनी के बर्लिन में अप्रैल में जारी होगा. पांचवी असेसमेंट रिपोर्ट की सिंथेसिस रिपोर्ट (एसवाईआर) पर 27 से 31 अक्टूबर 2014 तक डेनमार्क के कोपेनहेगेन में विचार किया जाएगा.
 
इसी तरह का शिखर सम्मेलन पेरिस में 2015 में आयोजित किया जाएगा जिसका फोकस 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल की जगह नई अंतरराष्ट्रीय जलवायु संधि को बनाने पर होगा. शिखर सम्मेलन का पहला चरण 2012 के आखिर में समाप्त हो गया.
 
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी)
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) जलवायु परिवर्तन का आकलन करने वाली प्रमुख वैज्ञानिक अंतरराष्ट्रीय इकाई है औऱ इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में किया गया था. इसकी स्थापना 1988 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण प्रोग्राम (यूएनईपी) और विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने की थी जिसका उद्देश्य विश्व को जलवायु परिवर्तन की वर्तमान स्थिति पर स्पष्ट वैज्ञानिक विचार और उसका पर्यावरण एवं सामाजिक– आर्थिक प्रभावों को प्रस्तुत करना था. इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा ने डब्ल्यूएमओ और यूएनईपी द्वारा आईपीसीसी की स्थापना के कदम का समर्थन किया था.
 
• आईपीसीसी अध्यक्ष– राजेन्द्र पचौरी
• अध्ययन के प्रमुख लेखक– डॉ. साल्लेमुल हक
• रिपोर्ट के सह– लेखक– मैगी ओपोन्डो, नैरोबी विश्वविद्यालय
• विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव– मिशेल जारौड

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