सूखे की वर्तमान स्थिति और मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदम

बीते दो वर्षों में भारतीय उपमाहाद्वीप में कम वर्षा हुई है जिससे देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ा और लाखों ग्रामीण लोगों का जीवन प्रभावित हुआ.केरल और पुणे के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार मध्य एशिया के उपर के वातावरण के लगातार ठंडा होने से 2020 और 2049 के बीच सूखे की आवृत्ति को बढ़ाएगा.

Created On: May 31, 2016 18:39 ISTModified On: Jun 7, 2016 14:37 IST

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार, मानसून के चार महीने–जून से सितंबर के दौरान अगर वर्षा अपने दीर्घकालीक  औसत से 10 फीसदी कम होती है, तो इसे सूखा मानसून घोषित किया जाएगा.
ला नीना की अनुकूल भूमिका की वजह से इस वर्ष भारतीय मानसून के सामान्य रहने की भविष्यवाणी की गई है. बीते दो वर्षों में भारतीय उपमाहाद्वीप में कम वर्षा हुई है जिससे देश के कई हिस्सों में सूखा पड़ा और लाखों ग्रामीण लोगों का जीवन प्रभावित हुआ.
केरल और पुणे के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार मध्य एशिया के उपर के वातावरण के लगातार ठंडा होने से 2020 और 2049 के बीच सूखे की आवृत्ति को बढ़ाएगा.

सूखे की वर्तमान स्थिति : गंभीर तथ्य


• वर्ष 2015-16 में 11 राज्यों के 266 जिलों को सूखा प्रभावित घोषित किया गया था. उनमें से, 70 फीसदी से ज्यादा जिले 8 राज्यों में थे.
• सूखा प्रभावित 11 राज्य थे– उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडीशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और झारखंड.
• छत्तीसगढ़ और कर्नाटक दोनों ही राज्यों में 93 फीसदी जिले सूखा प्रभावित थे. इसके बाद झारखंड का स्थान आता है जहां 92 फीसदी जिले सूखा प्रभावित थे. ओडीशा और मध्य प्रदेश, इन दोनों राज्यों में 90 फीसदी जिले सूखा प्रभावित थे.
• पूर्ण संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक जिले (50) सूखा प्रभावित थे. इसके बाद मध्य प्रदेश (46) का स्थान है. पांच अन्य राज्यों में 20 से अधिक जिले सूखा प्रभावित थे.
• सूखे की वर्तमान स्थिति ने इन 266 जिलों में 300 मिलियन से अधिक लोगों के जीवन को प्रभावित किया है.
• वर्ष 2015–16 में खाद्यान्न उत्पादन बीते 5 वर्षों के औसत उत्पादन की तुलना में कमी आई है.
• 2010-11 और 2014-15 के बीच औसत खाद्यान्न उत्पादन 255.59 मिलियन टन था जबकि 2015–16 में अनुमानित उत्पादन 253.16 टन की है.

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

 

बजट 2016-17 में की गई घोषणाएं

• सूखा प्रभावित इलाकों में प्रत्येक ब्लॉक को दीन दयाल अंत्योदय मिशन के तहत गहन (इंटेंसिव) ब्लॉक माना जाएगा.
• जल संरक्षण और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत क्लस्टर फैसिलिटेशन टीम्स (सीएफटी) बनाई जाएंगी.
• एनडीआरएफ से सहायता : वर्ष 2015-16 में कई राज्यों ने राष्ट्रीय आपदा राहत कोष (एनडीआरएफ) से वित्तीय सहायता की मांग करते हुए सूखे पर अनुरोध प्रस्तुत किया.
• सूखा प्रभावित 10 राज्यों में सूखे की स्थिति में राहत पहुंचाने के लिए एनडीआरएफ से करीब 13500 करोड़ रुपये मंजूर किए गए.
• महाराष्ट्र को सबसे अधिक धनराशि (3049 करोड़ रुपये) दी गई थी. इसके बाद कर्नाटक का स्थान है जिसे  2263 करोड़ रुपये दिए गए.
• बहु आजीविका को बढ़ावा देने के लिए स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के गठन में तेजी लाई जाएगी.

कृषक समुदाय को सहायता

सूखे के दौरान कृषक समुदाय सबसे बुरी तरह प्रभावित होता है. इस पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने मार्च 2015 में दुखी किसानों को दिए जाने वाले मुआवजे से संबंधित नियमों में संशोधन किया है. संशोधित नियम हैं–
i.  अब तक किसानों की अप्रत्याशित मौसम की वजह से उनकी फसल का 50 फीसदी या उससे अधिक का नुकसान होने पर इनपुट सब्सिडी दी जाती थी लेकिन अब ऐसी स्थिति में 33 फीसदी फसल के खराब होने पर भी सब्सिडी दी जाएगी.
ii. दुखी किसानों को दी जाने वाली मौजूदा इनपुट सब्सिडी में 50 फीसदी का इजाफा किया गया है.
iii.इसके अलावा सूखा समेत अप्रत्याशित संकट के समय किसानों की सुरक्षा को देखते हुए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को मंजूर किया गया है.

सूखा प्रबंधन की सहायता करने में सक्षम कार्यक्रम


• राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना : अप्रैल 2016 में केंद्रीय कैबिनेट ने करीब 3700 करोड़ रुपयों के अनुमानित लागत से राष्ट्रीय जलविज्ञान परियोजना (एनएचपी) को मंजूरी दी है.
• परियोजना सूचना प्रणालियों के इस्तेमाल और रिमोट सेंसिंग समेत नवीनतम प्रौद्योगिकियों को अपनाकर जल संसाधन प्रबंधन में सरकारी एजेंसियों की क्षमता निर्माण करना चाहता है.
• नीरांचल नेशनल वाटरशीड प्रोजेक्ट : केंद्रीय कैबिनेट ने 2142 करोड़ रुपयों के कुल बजट के साथ अक्टूबर 2015 में इसे मंजूरी दी थी जिसमें से भारत 1071 करोड़ रुपयों का खर्च उठाएगा और बाकी का 50 फीसदी लगात विश्व बैंक वहन करेगी.
• यह जलविज्ञान और जल प्रबंधन, कृषि उत्पादन प्रणाली, क्षमता निर्माण और निगरानी एवं मूल्यांकन में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की मदद करेगा.
• तकनीकी सहायता के माध्यम से परियोजना एकीकृत वाटरशीड प्रबंधन कार्यक्रम (आईडब्ल्यूएमपी) का समर्थन करना चाहती है ताकि वृद्धिशील संरक्षण नतीजों और कृषि पैदावार में सुधार हो.
• प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना : इसे केंद्र सरकार ने 2015 और  2020 के अवधि के बीच 50000 करोड़ रुपयों से अधिक के परिव्यय के साथ जुलाई 2015 में मंजूर किया था.
• योजना जल प्रबंधन की मौजूदा योजनाओं को समर्थन प्रदान कर जल के प्रयोग में दक्षता लाना चाहती है.
• सुनिश्चित सिंचाई (हर खेत को पानी) के तहत इसका उद्देश्य कृषियोग्य क्षेत्र का विस्तार करना और पानी की बर्बादी को कम करने के लिए खेतों में पानी के उपयोग दक्षता में सुधार लाना है.

 

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