स्वाइन इन्फ्लुएंज़ा

दिसम्बर 2014 और जनवरी 2015 में स्वाइन इन्फ्लुएंज़ा नामक बीमारी चर्चा में रही.

Created On: Feb 2, 2015 18:10 ISTModified On: Feb 2, 2015 18:13 IST

दिसम्बर 2014 और जनवरी 2015 में स्वाइन इन्फ्लुएंज़ा नामक बीमारी चर्चा में रही. देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में अब तक स्वाइन फ्लू के 41 मामले सामने आ चुके हैं. इनमें से 04 मामले वैसे हैं जिनमें पीड़ित की मौत भी हो चुकी है. विशेषज्ञों के विचार में स्वाइन फ्लू के विषाणु अब कमजोर पड़ चुके हैं और यह केवल मौसमी फ्लू है.
 
स्वाइन फ्लू से प्रभावित होने वाले लोगों की संख्या में अचानक आई ये वृद्धि कोहरे के कारण है जो गर्मी आने और बढ़ने के साथ खत्म हो जाएगी. ऐसे परिदृश्य में आम लोगों के लिए स्वाइन फ्लू के कारण, प्रकृति और बचाव के बारे में जानकारी आवश्यक है.

क्या है स्वाइन फ्लू-
स्वाइन फ्लू  एक ऐसा संक्रमण है जो विभिन्न प्रकार के स्वाइन इन्फ्लूएंज़ा विषाणु के कारण  फैलता है. सूअरों में पाई जाने वाले स्वाइन इंफ्लूएंज़ा विषाणु इंफ्लूएंज़ा विषाणुओं के परिवार की ही एक नस्ल है.
 
वर्ष 2009 में यह पता चला कि स्वाइन इंफ्लूएंज़ा विषाणु की इस नस्ल में इंफ्लूएंज़ा ए और इंफ्लूएंज़ा सी विषाणु है. यह दोनों विषाणु छह ज्ञात विषाणुओं की सूची में शामिल हैं. मानव इंफ्लूएंज़ा (इंफ्लूएंज़ा परिवार के विषाणुओं का मानवों पर आक्रमण) फैलाने वाले तीन विषाणुओं में से दो विषाणु वही हैं जो सूअरों में भी इस बीमारी के प्रेषण के कारक माने जाते हैं.

सामान्यतया सूअरों में इंफ्लूएंज़ा ए विषाणु पाये जाते हैं जबकि उनमें  इंफ्लूएंज़ा सी कम देखी जाती है. स्वाइन इन्फ्लूएंज़ा विषाणुओं में इंफ्लूएंज़ा ए के उप-समूह एच1एन1, एच1एन2 और एच2एन3 आदि शामिल हैं.

             
कैसे होता है इसका संक्रमण -
स्वाइन इन्फ्लूएंज़ा सूअरों में आसानी से लेकिन मानवों के बीच इसका संक्रमण दुर्लभ होता है. वैसे लोग जो सूअरों के सम्पर्क में लगातार बने रहते हैं उनमें इस संक्रमण का ज़ोखिम अधिक रहता है.

संयुक्त राज्य अमेरिका में कुल नवजात सूअरों में से करीब आधे में यह विषाणु पाये गये हैं. पॉलट्री में काम करने वाले लोगों को ज़ूनोटिक संक्रमण (ज़ूनोसिस) का खतरा अत्यधिक होता है.

‘जूनोसिस’ जानवरों की संक्रामक बीमारी है जो मानवों में स्थानांतरित हो जाती है. इबोला और स्वाइन इन्फ्लूएंज़ा ज़ूनोसिस के ही उदाहरण हैं.

वर्ष 2009 की चर्चित एच1एन1 विषाणु ज़ूनोटिक स्वाइन फ्लू नहीं थी क्योंकि मानवों में इसका स्थानांतरण सूअरों से नहीं बल्कि मानवों से ही हुआ था. ऐसे लोगों के बीच इनसे बचने के लिए टीका और इसका लोगों में अधिक फैलाव को रोकना एक महत्तवपूर्ण कदम हो सकता है.

सूअरों से मानवों में इन्फ्लूएंज़ा का सीधा स्थानांतरण दुर्लभ है. इसका प्रमाण है कि वर्ष 1958 से अब तक ऐसे केवल 50 मामलें ही सामने आए हैं. स्वाइन का मानवों में स्थानांतरण मुख्य रूप से स्वाइन फार्मों में ही होता है जहाँ किसानों का सूअरों से सीधा सम्पर्क होता है. मानवों के बीच इन्फ्लूएंज़ा का फैलाव खाँसने अथवा छींकने से होता है. इसके परिणामस्वरूप दूसरे मनुष्यों में भी यह संक्रमण फैल जाता है. यह विषाणु साथ भोजन करने से नहीं फैलता.
 
वैश्विक स्तर पर स्वाइन इन्फ्लूएंज़ा की घटनाएं-
अमेरिका में  इस इन्फ्लूएंज़ा का आक्रमण वर्ष 1976 में हुआ था. इससे बचाव के लिए व्यापक स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाया गया था जिसके परिणामस्वरूप केवल एक पीड़ित व्यक्ति ही मौत का शिकार बना. वर्ष 2009 में एच1एन1 विषाणु के फैलाव का सामना भारत समेत अमेरिका और मैक्सिको जैसे देशों को करना पड़ा था. इस फ्लू के कारण करीब 1800 लोग काल के गाल में समा गए. वर्ष 2010 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह घोषणा कर दी कि स्वाइन इन्फ्लूएंज़ा का खतरा टल चुका है.

स्वाइन फ्लू से बचाव-

इससे बचाव की तकनीक का मतलब होता है कि किस प्रकार इसके विषाणु को ज्यादा लोगों के बीच फैलने से रोका जा सके. बचाव की तकनीकों में संक्रमण नियंत्रण के मानक तरीकें
शामिल हैं जैसे हाथों का धोना और विशेषकर तब जब लोग बाहरी वातावरण के संपर्क में होकर आए हों.
विशेषज्ञों में इस बात को लेकर सहमति है कि हाथों की सही तरीके से धुलाई लोगों में इसके विषाणु के फैलाव को रोक सकता है. लोक स्वास्थ्य और उत्तरदायी प्राधिकारों के पास इस फ्लू से बचाने के लिए कार्य योजना होती है जो इसकी भयावहता के आधार पर लोगों से सामाजिक दूरी बनाने की गुजारिश करती है.  
किसानों और अन्य लोगों को (जिनका पशुओं और विशेषकर सूअरों) संक्रमित पशुओं के पास जाते वक्त चेहरे पर मास्क पहनकर जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. सूअरों से मनुष्यों में इस विषाणुओं के संक्रमण को रोकने के लिए उनका टीकाकरण एक वृहद और व्यापक तरीका है.

स्वाइन इंफ्लूएंज़ा के उपचार के लिए टीके-
विभिन्न प्रकार के स्वाइन फ्लू के लिए कई टीके उपलब्ध हैं. बीमारी नियंत्रण और रोकथाम केंद्र, अमेरिका इस संक्रमण के उपचार अथवा रोकथाम के लिए ओसेल्टामिविर (टेमिफ्लू) या ज़ानामिविर (रेलेंज़ा) जैसे टीकों की संस्तुति करते हैं.

इस विषाणु से संक्रमित होने वाले अधिकांश लोग बिना किसी विशेष चिकित्सीय देखभाल अथवा विषाणु रोधी ड्रग्स के बिना भी पूर्णतया स्वस्थ हो सकते हैं.

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