हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका रमणिका गुप्ता का निधन

हिंदी की प्रसिद्ध साहित्यकार और सामजिक कार्यकर्त्ता रमणिका गुप्ता का 27 मार्च 2019 को दिल्ली में निधन हो गया. वे 89 वर्ष की थीं. वे साहित्य, समाजसेवा और राजनीति सहित कई क्षेत्रों से जुड़ी हुई थीं.

रमणिका गुप्ता ने अपने कार्यकारी वर्षों में स्त्री विमर्श पर उम्दा काम किया और विभिन्न मुद्दों को उठाया. वे एक सामाजिक सरोकारों की पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ की संपादक भी थीं.

रमणिका गुप्ता के बारे में

  • 22 अप्रैल 1930 को पंजाब में जन्मी रमणिका ने आदिवासी व दलित साहित्य को नया आयाम दिया था.
  • रमणिका गुप्ता ने झारखंड के हज़ारीबाग के कोयलांचल से मजदूर आंदोलनों को साहित्य के ज़रिये राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने का काम किया.
  • बिहार विधानसभा और विधान परिषद् में विधायक रही रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे और आपहुदरी’ बेहद लोकप्रिय पुस्तक मानी जाती है.
  • इसके अलावा, उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘भीड़ सतर में चलने लगी है’, ‘तुम कौन’, ‘तिल-तिल नूतन’, ‘मैं आजाद हुई हूं’, ‘अब मूरख नहीं बनेंगे हम’, ‘भला मैं कैसे मरती’, ‘आदम से आदमी तक’, ‘विज्ञापन बनते कवि’, आदि भी शामिल थीं.
  • इसके अलावा ‘कैसे करोगे बँटवारा इतिहास का’, ‘दलित हस्तक्षेप’, ‘निज घरे परदेसी’, ‘सांप्रदायिकता के बदलते चेहरे’, ‘कलम और कुदाल के बहाने’, ‘दलित हस्तक्षेप’, ‘दलित चेतना- साहित्यिक और सामाजिक सरोकार’, ‘दक्षिण- वाम के कठघरे’ और ‘दलित साहित्य’, ‘असम नरसंहार-एक रपट’, ‘राष्ट्रीय एकता’, ‘विघटन के बीज’ भी उनकी यादगार कृतियों में शामिल हैं.

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा

रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘हादसे और आपहुदरी’ भी काफी लोकप्रिय रही है. आपहुदरी को एक दिलचस्प और समाज का आईना बताये जाने वाली आत्मकथा के रूप में जाना जाता था. इसमें समय का इतिहास, विभाजन और राजनीति के चेहरे की असलियत दर्ज है. रमणिका ने ट्रेड युनियन लीडर के तौर पर भी काम किया था जिसके कारण उनकी आत्मकथा में मजदूर वर्ग पर होने वाली ज्यादतियों तथा उनके अधिकारों पर भी प्रकाश डाला गया है. उनका उपन्यास ‘सीता-मौसी’ और कहानी संग्रह ‘बहू जुठाई’ भी खासा लोकप्रिय रहा.

 

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