पहली बार भारतीय नौसेना में पनडुब्बी बचाव वाहन शामिल किया गया

भारतीय नौसेना ने हाल ही में देश के पहले गहन जलमग्न बचाव वाहन (डीएसआरवी) को सेवा में शामिल कर लिया. मुंबई और विशाखापत्तनम में स्थायी रूप से जल्द ही तैनात करने के लिए एक और ऐसे ही वाहन को हासिल किया जायेगा. अब तक अमेरिका, रूस, जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड जैसे देशों के पास ही यह सुविधा मौजूद थी लेकिन अब भारत भी इस श्रेणी में आ गया है.

भारतीय नौसेना के प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा ने इस विशेष वाहन को नौसेना के बेड़े में शामिल करने के अवसर पर कहा, “इस वाहन की प्रणाली ने भारतीय नौसेना को विश्व नौसेना के ऐसे छोटे समूह में शामिल कर दिया है, जिनके पास समेकित पनडुब्बी बचाव क्षमता है.”

यह विशिष्ट पनडुब्बी बचाव क्षमता प्राप्त करने में नौसेना के केंद्रित वर्षों के प्रयासों की परिणति को दर्शाती है. ऐसा दूसरा वाहन भारत के लिए रवाना हो चुका है और उसे विशाखापत्तम में नौसेना के इकाई में तैनात किया जाएगा.

डीएसआरवी की विशेषताएं

•    यह वाहन एक गोते में 14 लोगों को बचा सकता है.

•    परीक्षणों के दौरान, डीएसआरवी 666 मीटर तक सफलतापूर्वक नीचे गया, जो भारतीय जल सीमा में 'मानव निर्मित पोत' द्वारा गहन जलमग्न के लिए एक रिकॉर्ड है.

•    इन वाहनों की मदद से मुसीबत में फंसी पनडुब्बी के चालक दल के सदस्यों को बाहर निकालने में मदद मिलेगी.

•    डीएसआरवी की उपलब्धता हमेशा रहने से हिंद महासागर में भारतीय नौसेना संकट में फंसी पनडुब्बियों के बचाव व राहत के लिये हमेशा तैयार रह सकेगी.

•    इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए शिप से ले जाने के साथ-साथ इसे रिमोट से भी संचालित किए जा सकता है.

 

सिंधुरक्षक पनडुब्बी हादसा

भारतीय नौसेना की परमाणु पनडुब्बी सिंधुरक्षक 13 अगस्त 2013 को समुद्र के नीचे दुर्घटनाग्रस्त होने पर विस्फोट होने के बाद डूब गई. इस पनडुब्बी में सवार 18 भारतीय नौसेनिक भी शहीद हुए. रूस में निर्मित सिंधुरक्षक पनडुब्बी में मध्यरात्रि के कुछ ही देर बाद विस्फोट होने से भयंकर आग लग गई थी. इससे पहले आईएनएस सिंधुरक्षक में 2010 में भी आग लगी थी जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और दो अन्य लोग घायल हो गए थे. यह दुर्घटना बैटरी बॉक्स में विस्फोट के कारण हुई थी.


डीएसआरवी का महत्व
यदि समुद्र के भीतर किसी भारतीय सबमरीन के साथ कोई दुर्घटना होती थी तो भारत अब तक अमेरिका की मदद पर निर्भर था. अमेरिकी नौसेना को अपने उपकरणों के साथ यहां तक पहुंचने में काफी समय लग जाता था और इससे जिंदगी भी दांव पर लगी रहती थी. डीएसआरवी के आने से भारतीय नौसेना खुद समुद्र के अंदर होने वाले किसी भी दुर्घटना से निपटने में सक्षम हो गई है.

 

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