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भारत और अमेरिका के बीच पहली बार 2+2 वार्ता का आयोजन

भारत और अमेरिका ने 06 सितम्बर 2018 को नई दिल्ली में पहली बार टू प्लस टू (2+2) वार्ता का आयोजन किया. टू प्लस टू बैठक में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि भारत अमेरिका की अफगान नीति का समर्थन करता है. इसके बाद स्वराज ने भारत और अमेरिका की ज्वाइंट प्रेस स्टेटमेंट में मीडिया को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि एनएसजी में जल्द से जल्द भारत की सदस्यता को लेकर बातचीत हुई जिसपर सभी ने सहमति जताई है.

इस मीटिंग में दोनों देशों के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री शामिल हुए. इस मीटिंग में शामिल होने के लिए अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस और विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो 05 सितंबर को दिल्ली पहुंचे थे.

 

2+2 वार्ता दो बार टल चुका है:

अमेरिका ने दो बार इस मीटिंग को टाल चुका है. ये मीटिंग पहले अप्रैल में होनी थी, फिर जून में और अब आखिरकार ये 6 सितंबर को होने वाली है. दोनों ही बार मीटिंग टालने के कोई स्पष्ट कारण नहीं बताए गए थे. ये मीटिंग अबसे प्रत्येक साल होगी. दोनों देश बारी-बारी से इसकी मेजबानी करेंगे.

क्यों अहम है '2+2 वार्ता ?

यह मीटिंग न सिर्फ सांकेतिक रूप से दोनों ही देशों के बहुत महत्वपूर्ण है, बल्कि इसके जरिए दोनों ही देश अपने मनमुटाव दूर करने की कोशिश करेंगे.

एशिया-प्रशांत में चीन का दबदबा बढ़ रहा है. चीन और अमेरिका के संबंध कड़वे हैं. ऐसे में अमेरिका को चीन का मुकाबला करने हेतु भारत से ज्यादा सक्षम देश कोई और नजर नहीं आता. इसलिए अमेरिका भारत को अपनी ओर करना चाहता है. ऐसे में ये मीटिंग दोनों देशों के लिए अपने-अपने हितों को जाहिर करना और सामने वाले की स्थिति भांपने के लिए काफी अहम है.

                    क्या है 2+2 वार्ता?

जब दो देश दो-दो मंत्रिस्तरीय वार्ता में शामिल होते हैं तो इसे विदेश नीति के संबंध में 2+2 वार्ता कहा जाता है. सामान्य तौर पर 2+2 वार्ता में दोनों देशों की तरफ से उनके विदेश और रक्षा मंत्री हिस्सा लेते हैं. वर्ष 2010 में भारत और जापान के बीच भी इस तरह की वार्ता हो चुकी है.

वार्ता से संबंधित मुख्य तथ्य:

एनएसजी सदस्यता:
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की यथाशीघ्र सदस्यता के लिए सहमति बनी, अमेरिका इसके लिए सहयोग करेगा.दोनों देशों के बीच रणनीतिक भागीदारी आगे बढ़ रही है. दोनों देशों में तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था से दोनों को ही फायदा हो रहा है. अमेरिका भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति करने वाले देश के तौर पर उभर रहा है, कारोबार को संतुलित और परस्पर लाभकारी बनाने की कोशिश हो रही है.

अफगान नीति:
भारत और अमेरिका दोनों ही देश साझा लोकतांत्रिक मूल्‍यों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं. दोनों ही देश शांति और नागरिकों की समदृता के लिए काम करने पर राजी हुए हैं. दोनों देश साथ‍ मिलकर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटीस ने वार्ता के बाद कहा कि भारत और अमेरिका साथ मिलकर काम करते रहेंगे और साथ ही उन्‍होंने एक बार फिर से भारत को अमेरिका का सबसे बड़ी रक्षा साझीदार करार दिया.

रक्षा और सुरक्षा:

दोनों देशों की तीनों सेनाओं के बीच पहली बार अगले वर्ष भारत में संयुक्त सैन्य अभ्यास के आयोजन का भी फैसला किया गया। यह अभ्यास देश के पूर्वी तट पर किया जाएगा.

दोनों पक्षों को समुद्री क्षेत्र की आजादी सुनिश्चित करनी चाहिए और समुद्री विवादों के शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में काम करना चाहिए.

अमेरिका भारत के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाने का प्रयास कर रहा है जिसे क्षेत्र में चीन के बढ़ते सैन्य प्रभुत्व के संतुलन के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है. भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अमेरिका द्वारा लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों को ग्लोबल टेररिस्ट्स की सूची में डालने का स्वागत किया.

इस दौरान दोनों देशों के बीच अहम सुरक्षा समझौते COMCASA पर हस्ताक्षर हुए. इस समझौते के बाद अमेरिका संवेदनशील सुरक्षा तकनीकों को भारत को बेच सकेगा. खास बात यह है कि भारत पहला ऐसा गैर-नाटो देश होगा, जिसे अमेरिका यह सुविधा देने जा रहा है.

भारत की रक्षामंत्री सीतारमण ने कहा की भारत-अमेरिका सहयोग और रक्षा क्षेत्र में हमारी साझेदारी और बढ़ती परिपक्वता को दर्शाता है. उन्‍होंने कहा कि हर बैठक के बाद हमारे रक्षा क्षेत्र को और ताकत मिलती है. आज भारत रक्षा के क्षेत्र में अमेरिका के साथ जितना काम कर रहा है उतना किसी अन्‍य देशों के साथ नहीं कर रहा. बात चाहे किसी प्रशिक्षण की हो या फिर संयुक्‍त अभ्‍यास की अमेरिका और भारत के बीच रक्षा नीति मजबूत हुई है.

आतंकवाद:

सुषमा स्वराज ने अमेरिकी मंत्रियों के सामने आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को खरी-खरी सुनाते हुए कहा कि अमेरिका द्वारा लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों की नामजदगी स्वागत योग्य हैं. उन्होंने कहा कि 26/11 हमले की 10वीं वर्षगांठ पर हम इसके गुनहगारों को सजा दिलाने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं. बातचीत में सीमापार आतंकवाद का मुद्दा भी शामिल रहा. उन्होंने कहा कि सीमापार आतंकवाद को समर्थन देने की पाकिस्तान की नीति के खिलाफ अमेरिका का रुख स्वागत योग्य है. विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ने इस बैठक में H1 वीज़ा का मुद्दा भी उठाया, हमें उम्मीद है कि अमेरिका भारत के हितों में ध्यान में रखते हुए कोई फैसला लेगा. यह वीजा आईटी प्रोफेशनल्स पर प्रभाव डालता है.

भारत और अमेरिका ने पाकिस्तान से यह सुनिश्चित करने को कहा कि उसके भूभाग का उपयोग आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए नहीं हो. दोनों देशों ने पाकिस्तान से यह भी कहा कि मुंबई, पठानकोट और उरी हमले सहित सीमा पार से हुए विभिन्न आतंकवादी हमलों के सरगनाओं को जल्दी से जल्दी न्याय की जद में लाया जाए.

पाकिस्तान को यह सख्त चेतावनी भारत और अमेरिका के बीच पहली बार हुयी ‘टू प्लस टू’ वार्ता के बाद दी गयी. वार्ता के दौरान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने अमेरिकी विदेश मंत्री माइकल आर पोम्पिओ और रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के साथ व्यापक विचार-विमर्श किया.

मंत्रियों ने ज्ञात या संदिग्ध आतंकवादियों के बारे में सूचना साझा करने के प्रयासों को बढ़ाने और विदेशी आतंकवादियों के संबंध में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद संकल्प 2396 को लागू करने के अपने इरादे की घोषणा की. इसमें कहा गया है कि मंत्रियों ने इस क्षेत्र में परोक्ष आतंकवाद के किसी भी प्रयोग की निंदा की और इस संदर्भ में उन्होंने पाकिस्तान को यह सुनिश्चित करने को कहा कि उसके नियंत्रण वाले भूभाग का उपयोग दूसरे देशों में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए नहीं किया जाए.

उन्होंने कहा कि 26/11 के हमलों की 10 वीं बरसी पर हमने इस आतंकवादी हमले के पीछे के सरगनाओं के लिए न्याय और दंड के महत्व की पहचान की. मंत्रियों ने 2017 में आतंकवादियों के संबंध में की गयी घोषणाओं पर द्विपक्षीय वार्ता की शुरूआत का स्वागत किया जो अल-कायदा, आईएसआईएस, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजब-उल मुजाहिदीन, हक्कानी नेटवर्क, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, डी-कंपनी और उनसे जुड़े विभिन्न आतंकवादी समूहों के खिलाफ कार्रवाई और सहयोग को मजबूत कर रहा है.

ईरान से कच्चे तेल के आयात पर अमेरिकी पाबंदी और रूस से एस-400वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली खरीदने की भारत की योजना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है.

टू प्लस टू (2+2) वार्ता  का फैसला जून 2017 में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बैठक में किया गया था. टू प्लस टू वार्ता की अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि अमेरिका इस तरह का साझा विमर्श अभी तक सिर्फ आस्ट्रेलिया और जापान के साथ करता है. इन दोनों देशों को वह अपने रणनीतिक मामलों के लिए बेहद अहम मानता है.

यह भी पढ़ें: भारत और बुल्गारिया के मध्य चार समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये

 
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