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यातना में शामिल सरकारी अधिकारियों के लिए आजीवन कारावास: कानून पैनल

विधि आयोग ने कानों मंत्रालय को सौंपे अपने रिपोर्ट में अत्याचार के लिए दोषी ठहराए गए लोगों के आजीवन जेल की सिफारिश की है, साथ ही सरकार को सुझाव दिया है की कानून के अभाव के कारण अपराधियों को विदेशी देशों से प्रत्यर्पित करने में कठिनाइयों को पूरा करने के लिए सरकार संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के प्रस्ताव को स्वीकार के ले.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अगर सरकार ने अत्याचार और अन्य अमानवीय और अपमानजनक उपचार या सजा पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन को मंजूरी देने का निर्णय लिया है, तो सरकारी अधिकारियों द्वारा यातना को रोकने के लिए विभिन्न कानूनों में संशोधन करने के लिए एक विधेयक पेश किया जाना चाहिए.

कानून मंत्रालय को प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में  मुआवजे और ‘सबूत के बोझ’ के प्रावधानों को समायोजित करने के लिए संसोधन की आवश्यकता है.

रिपोर्ट के महत्वपूर्ण बिंदु

रिपोर्ट ने भारतीय दंड संहिता में दिए गए दंड के भुगतान के अतिरिक्त, मुआवजे का भुगतान करने के लिए धारा 357 बी में संशोधन की सिफारिश की. भारतीय साक्ष्य अधिनियम में एक नई धारा 114 बी के प्रवेश की आवश्यकता.

पुलिस हिरासत में अगर किसी व्यक्ति को कोई चोट या घाव होता है तो , तो यह माना जायेगा कि पुलिस ने चोटों की सजा दी है, और पुलिस अफसरों इसे गलत साबित करने की जिम्मेवारी होगी.

पीड़ितों को मुआवजे देने के मामले पर रिपोर्ट ने कहा की अदालत  एक व्यक्ति के विभिन्न पहलुओं जैसे कि प्रकृति, उद्देश्य, सीमा और चोट के तरीके को ध्यान में रखते हुए "न्यायसंगत मुआवजा" देने का फैसला करेगी.

रिपोर्ट के अनुसार अदालत पीड़ितों की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखेगी और सुनिश्चित करेगी कि मुआवजे से पीड़ित को चिकित्सा उपचार और पुनर्वास के खर्चों में सहायता मिले.

आयोग ने कहा कि नागरिकों पर पुलिस के हिंसा की वजह से होने वाली चोटों की ज़िम्मेदारी राज्य की है, और वह संप्रभुता के नाम पर अपनी जम्मेवारी नहीं हटा सकता.

 

 

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