लोकसभा में उपभोक्ता संरक्षण बिल पारित

लोकसभा में 20 दिसंबर 2018 को उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2018 (Consumer Protection Bill) पास हो गया है. यह विधेयक उपभोक्ताओं के हित के संरक्षण तथा उनसे जुड़े विवादों का समय से प्रभावी निपटारा करेगा.

उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे देश के संघीय ढांचे को नुकसान हो. उन्होंने कहा कि 32 साल बाद उपभोक्ता संरक्षण कानून में कोई बदलाव किया गया है. यह विधेयक दो बार स्थायी समिति के पास भेजा जा चुका है.

उद्देश्य:

उपभोक्ता संरक्षण विधेयक 2018 पुराने उपभोक्ता संरक्षण कानून 1986 की जगह लेगा. इसका उद्देश्य भ्रामक विज्ञापनों, डिजिटल लेनदेन और ई-कॉमर्स से जुड़ी समस्याओं को बेहतर तरीके से दूर करके उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना है.

विधेयक से संबंधित मुख्य तथ्य:

•   यह बिल उपभोक्ता अधिकारों को अहमियत प्रदान करता है. इसके साथ ही यह बिल खराब वस्तुओं एवं सेवाओं में दोष से संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए व्यवस्था प्रदान करता है.

   पहले उपभोक्ता को वहां जाकर शिकायत करनी होती थी जहां से उसने सामान खरीदा है, लेकिन अब घर से ही शिकायत की जा सकती है. इसके अलावा विधेयक में मध्यस्थता का भी प्रावधान है.

•   नए विधेयक में प्रावधान है कि अगर जिला और राज्य उपभोक्ता फोरम उपभोक्ता के हित में फैसला सुनाते हैं तो आरोपी कंपनी राष्ट्रीय फोरम में नहीं जा सकती.

•   स्थाई समिति ने भ्रामक विज्ञापनों में दिखने वाले सेलिब्रिटियों को जेल की सजा की सिफारिश की थी लेकिन इसमें केवल जुर्माने का प्रावधान किया गया है.

 

सजा का प्रावधान:

इस विधेयक में यह प्रावधान है कि यदि कोई निर्माता या सेवा प्रदाता झूठा या भ्रामक प्रचार करता है जो उपभोक्ता के हित के खिलाफ है तो उसे दो साल की सजा और 10 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है. अपराध दोहराये जाने पर जुर्माने की राशि 50 लाख रुपये तक और कैद की अवधि पांच साल तक हो जायेगी.

मिलावट करने वालों पर नकेल कसने हेतु विधेयक में अलग से प्रावधान है. यदि उपभोक्ता को कोई नुकसान नहीं पहुँचा है तो छह महीने तक की कैद और एक लाख रुपये तक का जुर्माना है. यदि उपभोक्ता को मामूली स्वास्थ्य नुकसान पहुँचा है तो एक साल तक की कैद और तीन लाख रुपये तक का जुर्माना है.

गंभीर स्वास्थ्य नुकसान की स्थिति में सात साल तक की कैद और पाँच लाख रुपये तक का जुर्माना तथा उपभोक्ता की मृत्यु की स्थिति में कम से कम सात साल और अधिक से अधिक आजीवन कारावास और कम से कम 10 लाख रुपये के जुर्माने की व्यवस्था है.

 

तीन स्तरीय नियामक की व्यवस्था:

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को लागू कराने के लिए तीन स्तरीय नियामक की व्यवस्था की गयी है. सबसे ऊपर राष्ट्रीय आयोग, उसके नीचे राज्य आयोग और सबसे नीचे स्तर पर जिला आयोग होंगे. केंद्रीय आयोग का आदेश नहीं मानने पर छह महीने तक की कैद या 20 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं.

जिला आयोग के आदेश के खिलाफ राज्य आयोग में और राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय आयोग में अपील की जा सकती है. राष्ट्रीय आयोग के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की जा सकेगी. असामान्य परिस्थितियों को छोड़कर अपील आदेश के 30 दिन के भीतर करनी होगी.

 

यह भी पढ़ें: लोकसभा में ट्रांसजेंडर विधेयक ध्वनिमत से पारित

Related Categories

Popular

View More