आर्मेनिया और अजरबैजान युद्ध विराम के लिए हुए सहमत, यहां पढ़ें सारी महत्त्वपूर्ण जानकारी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट कर आर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोलस पशिनयान और अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव को आधी रात से संघर्ष विराम का प्रभावी ढंग से पालन करने के लिए सहमत होने के लिए बधाई दी है.

Oct 27, 2020 20:09 IST

आर्मेनिया और अजरबैजान 26 अक्टूबर, 2020 से नागोर्नो-काराबाख़संघर्ष में "मानवीय संघर्ष विराम" का सम्मान करने के लिए सहमत हुए हैं. यह घोषणा अमेरिकी विदेश विभाग द्वारा की गई थी.

 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट कर आर्मेनियाई प्रधानमंत्री निकोलस पशिनयान और अज़रबैजान के राष्ट्रपति इल्हाम अलीयेव को आधी रात से संघर्ष विराम का प्रभावी ढंग से पालन करने के लिए सहमत होने के लिए बधाई दी है.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अनुमान के मुताबिक, हफ्तों चलने वाली इस लड़ाई में अब तक लगभग 5,000 लोग मारे गए हैं.

इन दोनों पूर्व सोवियत गणराज्यों - आर्मेनिया और अजरबैजान - ने बार-बार वार्ता के लिए सभी अंतर्राष्ट्रीय कॉलों और नागोर्नो-काराबाख़ के विवादित क्षेत्र पर भयंकर लड़ाई को रोकने के प्रस्ताव को  खारिज कर दिया. इससे पहले, फ्रांस द्वारा शुरू की गई युद्धविराम वार्ता और रूस द्वारा दूसरी बार शुरू की गई युद्धविराम वार्ता को पहले ही तोड़ दिया गया था.

रूस, फ्रांस ने किया हस्तक्षेप

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुएल मैक्रोन ने 1 अक्टूबर, 2020 को जातीय आर्मेनियाई सेना और अजरबैजान के बीच तत्काल संघर्ष विराम का आह्वान किया था.

OSCE मिन्स्क समूह

रूस, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका के OSCE मिन्स्क समूह की स्थापना वर्ष 1992 में यूरोप में आयोजित एक सुरक्षा और सहयोग सम्मेलन में की गई थी, जोकि नागोर्नो-काराबाख़ पर अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच एक शांतिपूर्ण प्रस्ताव की पेशकश करने के लिए हुआ था.

संघर्ष क्षेत्रों में मार्शल लॉ घोषित

अज़रबैजान ने सीमावर्ती क्षेत्रों में मार्शल लॉ घोषित किया है, जबकि आर्मेनिया ने इसे पूरे देश के लिए घोषित किया है. विवादित क्षेत्र में तनाव बढ़ने के बाद आर्मेनिया ने भी इस क्षेत्र में अपनी पुरुष आबादी जुटाई है.

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आर्मेनिया और अजरबैजान लगभग चार दशकों से दक्षिण काकेशस के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित भूमि के एक टुकड़े- नागोर्नो-काराबाख़ पर संघर्ष में उलझे हुए हैं. यह विवाद पहली बार वर्ष 1988 में शुरू हुआ था और बीते वर्षों में इसने बड़े पैमाने पर मानव अधिकारों का उल्लंघन किया है, एक गंभीर शरणार्थी संकट उत्पन्न किया है और दोनों गणराज्यों की अर्थव्यवस्थाओं को भी बहुत प्रभावित किया है.

बिश्केक प्रोटोकॉल: एक परिचय

आर्मेनिया और अजरबैजान का यह संघर्ष 1990 के दशक की शुरुआत में हुई, सशस्त्र झड़पों में हजारों लोगों की मौत के साथ ही शुरू हो गया था और रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और फ्रांस द्वारा मध्यस्थता से युद्धविराम किया गया था.

हालांकि, बिश्केक प्रोटोकॉल दोनों पक्षों के बीच एक स्थाई शांति प्रक्रिया में बदलने में विफल रहा है, क्योंकि दोनों पक्षों की ओर से वर्ष 2008, वर्ष 2016 और अब फिर से, वर्ष 2020 में, कई बार इस संघर्ष विराम कॉल का उल्लंघन होता रहा है.

यद्यपि नागोर्नो-काराबाख़ क्षेत्र को अंतर्राष्ट्रीय रूप से अजरबैजान के एक भाग के रूप में मान्यता प्राप्त है, यह क्षेत्र अभी भी विवादित बना हुआ है क्योंकि इस पर जातीय आर्मेनियाई लोगों द्वारा नियंत्रित स्थापित है.

हाल ही में क्या हुआ?

गत 27 सितंबर, 2020 को आर्मेनिया और अजरबैजान के बीच घातक लड़ाई छिड़ गई, जो दोनों पक्षों के बीच भारी भारी गोलीबारी के साथ शुरू हुई और दोनों ही पक्षों ने इस हिंसक प्रकोप के लिए एक-दूसरे को दोषी ठहराया. यह भी कहा जाता है कि, इस खूनी संघर्ष में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई थी.

टर्की कैसे शामिल हुआ है?

आर्मेनिया ने टर्की (तुर्की) पर सीरिया के हजारों भाड़े के सैनिकों (मर्सीनरीज़) को भेजकर संघर्ष में दख़ल देने का आरोप लगाया है, लेकिन यह दावा टर्की ने तुरंत खारिज कर दिया. टर्की कथित रूप से, तेल संपदा से समृद्ध और तुर्क-भाषी अजरबैजान का समर्थन कर रहा है.

दूसरी ओर, आर्मेनिया, प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तुर्क साम्राज्य के तहत टर्की द्वारा किए गए लगभग 1.5 मिलियन आर्मेनियाई लोगों के नरसंहार के बाद, टर्की के प्रति शत्रुता की भावना रखता है.

रूस कैसे शामिल है?

रूस पूर्व सोवियत देशों के सामूहिक सुरक्षा संधि संगठन और सैन्य गठबंधन का नेतृत्व करता है जिसमें आर्मेनिया भी शामिल है, जो विशेष रूप से अपनी सेना के संदर्भ में, रूसी समर्थन पर बहुत अधिक निर्भर करता है.

पृष्ठभूमि

राजनीतिक मोर्चे पर, जब से आर्मेनिया ने पूर्व सोवियत संघ से स्वतंत्रता प्राप्त की है, यहां राजनीतिक और आर्थिक अस्थिरता का माहौल बना हुआ है, जबकि मुस्लिम-बहुसंख्यक अजरबैजान में वर्ष 1993 के बाद से एकल परिवार के सत्तावादी पकड़ रही है.

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