FRBM एक्ट : पुनर्विलोकन

जैसा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने भाषण में कहा FRBM एक्ट का
पुनर्विलोकन होना निश्चित है. हमने इससे जुड़े सवाल जैसी कि यह कैसे किया जायेगा ? तथा इससे जुदू समस्याओं तथा उनके समाधानों का विस्तृत वर्णन किया है.

 

Created On: Mar 8, 2017 18:03 ISTModified On: Mar 8, 2017 18:04 IST

FRBM Act Reviewराजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम एक्ट)

01 फरवरी, 2017 को वित्त मंत्री अरूण जेटली द्वारा संसद में केंद्रीय बजट पेश किया गया जहां उन्होंने घोषणा की, कि राजकोषीय जवाबदेही और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम एक्ट) की समीक्षा करने के लिए एक समीति का गठन किया जाएगा। यह कमेटी भविष्य में इसमें बदलाव के लिए भी सुझाव प्रदान करेगी। वित्त मंत्री जेटली ने कहा कि एफआरबीएम एक्ट, 2003 में कई खामियां हैं और इन खामियों को दूर करने की जरूरत है और समय की जरूरत के हिसाब से देखा जाए तो सही मायने में एक आधुनिक एफआरबीएम की जरूरत है।

एफआरबीएम अधिनियम की उपयोगिता

वित्तीय दायित्व और बजट प्रबंधन कानून (एफआरबीएमए) को भारतीय संसद ने वर्ष 2003 में पास किया था। इसका उद्देश्य वित्तीय अनुशासन को संस्थागत रूप देना, वित्तीय घाटे को कम करना व लघु आर्थिक प्रबंधन को बढ़ावा देने के साथ ही बैलेंस और पेमेंट को व्यवस्थित करना है। अतीत में एफआरबीएम अधिनियम की उपयोगियता अत्यधिक सार्वजनिक खर्च निरोधक, राजस्व घाटा को समाप्त करने और राजकोषीय घाटे को कम करने का एक उपाय के रूप में देखी गयी थी। एफआरबीएम अधिनियम का इतिहास मिश्रित रहा है जिसके द्वारा अतीत में सफलताएं और विफलताएं दोनों हासिल हुई हैं। वर्तमान में सरकार ने इस अधिनियम की समीक्षा करने और इसमें सुधार करने हेतु एक पैनल का गठन करने का प्रस्ताव दिया है जो सुझाव भी प्रदान करेगा।
2003 में इसके गठन के बाद से ही भारत सरकार इस अधिनियम का पालन कर रही है। वित्त वर्ष 2004 से लेकर वित्त वर्ष 2008 तक इसका कड़ाई से पालन किया गया। उस समय, राजकोषीय घाटे में तेजी से कमी हुई थी और राजस्व घाटे में सकल घरेलू उत्पाद की 2% की कमी आई थी। वर्ष 2009 में आम चुनाव और वैश्विक आर्थिक संकट की वजह से एफआरबीएम अधिनियम का काफी उल्लंघन किया गया था और राजकोषीय घाटे में सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले 6% तक वृद्धि हुई है। राजकोषीय घाटा अगले दो साल के लिए अनावश्यक रूप से बढ़ना जारी रहा। इसके बाद, एफआरबीएम को 1 साल के लिए निलंबित कर दिया गया था और यह केवल वित्तीय साल 2012 में इस फिर से लागू किया गया था।
2014 के बाद राजग सरकार सत्ता पर काबिज हुई जिसने समझदारी से इस एक्ट को जारी रखा, लेकिन वर्ष 2015 के चालू वित्त वर्ष में यह लक्ष्य को प्राप्त करने में नाकाम रहा। इस अवधि में 0.4 फीसदी वेतन वृद्धि के कारण सकल घरेलू उत्पाद में सार्वजनिक निवेश के राजकोषीय समायोजन में देरी हुई।  वित्त वर्ष 2016 में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 3.5% से बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद के 3.9% पर पहुंच गया था। राजकोषीय घाटे में वृद्धि के बावजूद, केन्द्र सरकार के सार्वजनिक निवेश में सकल घरेलू उत्पाद का योगदान बेहद ही कम 2% का रहा क्योंकि कुल सार्वजनिक निवेश और उद्यमों तथा राज्य एवं  स्थानीय सरकारों द्वारा किया गया कुल सार्वजनिक निवेश सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 8-9 % तक रहा।

एफआरबीएम अधिनियम में समस्याएं और उनका समाधान

तीन प्रमुख समस्याओं के साथ इस अधिनियम की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है-

सबसे पहले, एफआरबीएम अधिनियम का फोकस केवल केंद्रीय बजट है जबकि सरकार को केंद्र, राज्यों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) को ध्यान में रखते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के उधार लेने की आवश्यकता (PSBR) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत का पीएसबीआर राजकोषीय घाटे की तुलना में बहुत अधिक है। हाल के वर्षों में ये दोनों अलग अलग दिशाओं में शिफ्ट हुए हैं। भारत का राजकोषीय घाटा कम हो गया है, लेकिन पीएसबीआर बढ़ोत्तरी हो रही है।

दूसरा, अतीत में भी केंद्र सरकार का राजस्व घाटा काफी ऊंचे स्तर तक पहुंचा है। एफआरबीएम अधिनियम का लक्ष्य राजस्व घाटे को कम करना होता है, लेकिन 1998- 2003 की संक्षिप्त अवधि को छोड़कर पिछले 25 वर्षों से भी अधिक तक इसके सार्वजनिक क्षेत्र के राजस्व में कोई पूर्ति नहीं हुई।
नतीजतन, केंद्र सरकार को उपभोग व्यय की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए उधार लेना पड़ा। और सार्वजनिक क्षेत्र ने भी समग्र उधार लेने की तुलना में भी अधिक का निवेश किया है। इसलिए यह एकमात्र तथ्य केंद्र सरकार के वित्त की एक गलत तस्वीर पेश करता है।
भारत को न केवल सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों द्वारा अधिक निवेश की आवश्यकता है, बल्कि शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए परिवहन, सिंचाई, ऊर्जा और सामाजिक बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं पर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा भी अधिक निवेश की जरूरत है। इसलिए, यह कहा जा सकता है कि, यदि केंद्र सरकार द्वारा उपरोक्त तथ्यों को लागू किया जाता है तो इससे केंद्र को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से ज्यादा लाभांश मिल सकता है और इन उपक्रमों को अपना रणनीतिक निवेश कोष का आवंटन भी करना होगा।

तीसरा, राजकोषीय नीति की प्रकृति में विपरीत चक्रीय होनी चाहिए, ताकि एफआरबीएम स्वत: नियमों का निर्माण कर उनको लागू कर सके। चक्रीय लचीलेपन से इससे सुधार होगा और भविष्य के लिए उम्मीद भी बनेगी। वर्तमान अधिनियम में इस तरह का चक्रीय लचीलापन शामिल नहीं है। इसी का परिणाम था कि वैश्विक संकट के समय में सरकार के पास एफआरबीएम के नियमों का उल्लंघन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। नतीजतन, राजकोषीय घाटा में सकल घरेलू उत्पाद के 6.5% तक वृद्धि हुई है और पीएबीआर सकल घरेलू उत्पाद का 8% से भी अधिक था।

निष्कर्ष:
तकनीकी विशेषज्ञों के साथ एक राजकोषीय परिषद की स्थापना करना उपयोगी होगा और प्रत्येक बजट की राजकोषीय स्थिरता को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा। यह एफआरबीएम अधिनियम एक लंबी अवधि के तहत वित्तीय वर्ष के प्रक्षेप वक्र की कल्पना करने के लिए उपयोगी साबित होगा। इसके परिणाम स्वरूप इससे निश्चित रूप से संसदीय अंतर्दृष्टि की गुणवत्ता में सुधार होगा और इससे एक उपयोगात्मक सार्वजनिक बहस को भी बढ़ावा मिलेगा।
आदर्श रूप में यह कहना उचित होगा कि एफआरबीएम अधिनियम को विभिन्न संख्याओं के साथ निर्धारित नहीं करना चाहिए। सरकार से यह कहा जाना चाहिए कि सरकारी कर्ज-जीडीपी अनुपात निहितार्थ और अधिक संख्या के निहितार्थ का एक स्पष्ट विश्लेषण पेश करे। सरकार से एक अर्थव्यवस्था के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में भी पूछा जाना चाहिए, जैसे- मंहगाई और कम से कम हर पांच साल तक वित्त वर्ष प्रक्षेप वक्र के बारे में पूछा जाना चाहिए। इससे लक्ष्य प्राप्ति के लिए और अधिक स्पष्टता होगी तथा एक स्वस्थ्य बहस भी हो सकेगी।

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