ISRO ने अंतिम समय में टाल दी जीसैट-1 की लॉन्चिंग, जानें कारण

इसरो के अनुसार 2275 किलोग्राम का जीसैट धरती का बहुत जल्दी तस्वीर लेने वाला पर्यवेक्षण उपग्रह है.

Created On: Mar 5, 2020 16:59 ISTModified On: Mar 5, 2020 16:59 IST

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने जियो इमेजिंग सैटेलाइट-1 (जीसैट-1) की 5 मार्च 2020 को होने वाली लॉन्चिंग को फिलहाल टाल दिया है. लॉन्चिंग टालने का मुख्य कारण तकनीकी समस्या बताई जा रही है. इसरो की ओर से कहा गया है कि सैटेलाइट लॉन्चिंग की नई तारीख जल्द ही बताई जाएगी.

इससे पहले सैटेलाइट को भू-स्थिर कक्षा में स्थापित करने के लिए उल्टी गिनती 04 मार्च 2020 को दोपहर 3.43 बजे शुरू करने की जानकारी दी गई थी. यह जानकारी इसरो के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दी. यदि 5 मार्च को इस सैटेलाइट की सफल लॉन्चिंग हो जाती तो इसरो एक बार फिर इतिहास रच देता.

इसरो के मुताबिक, 51.70 मीटर लंबे और 420 टन वजनी जीएसएलवी-एफ10 रॉकेट से आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा के दूसरे लॉन्च पैड से लॉन्च किया जाना था. इसके प्रक्षेपण को लेकर कहा गया था कि 18 मिनट बाद जीएसएलवी रॉकेट जीसैट-1 को पहले जियो सिन्क्रोनस ट्रांसफर आर्बिट (जीटीओ) में पहुंचाएगा.

इसकी खासियत

इसरो के अनुसार 2275 किलोग्राम का जीसैट धरती का बहुत जल्दी तस्वीर लेने वाला पर्यवेक्षण उपग्रह है. इसरो द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक 2275 किलोग्राम वजन वाला उपग्रह जीसैट-1 अत्याधुनिक सजग ‘ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट’ है. ये सैटेलाइट 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में स्थापित किया जाएगा. ये भारत का पहला उपग्रह है जिसे इतनी ऊंची कक्षा में स्थापित किया जायेगा. अभी तक इसरो के भू-अवलोकन उपग्रहों को धरती की 600 किलोमीटर वाली कक्षा में ही स्थापित किया गया है.

इस सैटेलाइट को भूसमकालीन स्थानांतरण कक्षा में स्थापित किया जाएगा. इस सैटेलाइट को जीएसएलवी-एफ 10 द्वारा जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (जीटीओ) में रखा जाएगा. इसके बाद, उपग्रह प्रणोदन प्रणाली का उपयोग करके अंतिम भूस्थिर कक्षा में पहुंच जाएगा. इस जीएसएलवी उड़ान में पहली बार चार मीटर व्यास का ओगिव आकार का पेलोड फेयरिंग (हीट शील्ड) प्रवाहित किया जा रहा है. यह जीएसएलवी की 14वीं उड़ान है. यह सैटेलाइट 50 मीटर से 1.5 किलोमीटर की रिजोल्यूशन में तस्वीरें ले सकता है.

भारतीय उपमहाद्वीप पर 24 घंटे निरंतर नजर रखेगा

इस सैटेलाइट की कक्षा ऐसी होगी और इसे ऐसे कोण पर स्थापित किया जाएगा कि वे भारतीय उपमहाद्वीप पर 24 घंटे निरंतर नजर रख सकेगा. इस सैटेलाइट के जरिए देश के किसी भी भू-भाग की तस्वीरें रीयल टाइम में हासिल की जा सकेंगी.

प्राकृतिक आपदा के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण

इसरो के अनुसार यह सैटेलाइट मौसम की भविष्यवाणी और प्राकृतिक आपदा के दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है. इस उपग्रह की सबसे बड़ी खासियत इसके विशेष पे-लोड (उपकरण) हैं. इनमें इमेजिंग कैमरों की एक विस्तृत श्रृंखला है जो निकट इंफ्रारेड और थर्मल इमेजिंग करने में सक्षम हैं. इन कैमरों में नासा के हब्बल दूरदर्शी जैसा 700 एमएम का एक रिची-च्रीटियन प्रणाली का टेलीस्कोप भी लगा हुआ है.

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