भारत इजराइल रिश्ते: आगे क्या?

 इस वर्ष भारत और इस्राइल अपने राजनयिक संबंधों की 25वीं वर्षगांठ मना रहे हैं. इस अवसर पर, हमने भारत– इस्राइल संबंधों, उसकी चुनौतियों और प्रभावों का विश्लेषण किया है.

Created On: Mar 23, 2017 18:55 ISTModified On: Mar 23, 2017 18:51 IST

भारत इजराइल राजनयिक रिश्तेभारत और इस्राइल के बीच वर्ष 1992 में स्थापित किए गए राजनयिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं. भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की दूरदर्शिता ने भारत– इस्राइल भागीदारी की शुरुआत की थी जिसका आज आभार प्रकट किया जाना चाहिए. भारत और इस्राइल के बीच द्विपक्षीय संबंधों के सामान्यीकरण से पहले पर्दे के पीछे सुरक्षा वार्ताएं हुईं थीं. इसके बाद, हाल के वर्षों में, भारत इस्राइल के साथ पारस्परिक रूप से अधिक लाभकारी द्विपक्षीय संबंध स्थापित करने का पक्षधर रहा है जिसमें आतंकवाद का मुकाबला करने और सैन्य संबंधों को मजबूत करना शामिल है.

 2014 के बाद नीतिगत बदलाव

2014 से पहले, जब एनडीए सरकार 2014 में सत्ता में आई, ऐसा लगता है कि भारत के राजनयिक  एजेंडे में इस्राइल को अन्य पश्चिमी एशियाई देशों के मुकाबले अधिक प्राथमिकता दी गई है. यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत और इस्राइल  आतंकवाद का मुकाबला करने, रक्षा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष अन्वेषण, कृषि और कई अन्य क्षेत्रों में अपने संबंधों को मजबूत बना रहे हैं.
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस्राइल के साथ घनिष्ठ संबंध के सबूत उनके गुजरात के मुख्यमंत्री काल से ही  मिलते हैं जब इस्राइल गुजरात के प्रभावी आर्थिक विकास को प्राप्त करने में मदद करने वाले महत्वपूर्ण देश के तौर पर सामने आया था.

29 जनवरी को भारत और इस्राइल के राजनयिक संबंधों के 25 वर्ष पूरे हुए. इस बात को ध्यान में रखते हुए, दोनों देशों ने कई कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई. इसमें जनवरी 2018 में वर्षगांठ वर्ष के समापन से पहले प्रधानमंत्रियों के दौरे भी शामिल हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस वर्ष जून में इस्राइल की यात्रा पर जा सकते हैं. यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली इस्राइल यात्रा होगी. मोदी और नेतन्याहू के बीच पहली बैठक सितंबर 2014 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान हुई थी. एक दशक  के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच होने वाली वह पहली बैठक थी.

राष्ट्रपति का दौरा

अक्टूबर 2015 में भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस्राइल का दौरा किया था जो किसी भी भारतीय राष्ट्रपति का पहला इस्राइल दौरा था. आमतौर पर भारतीय राष्ट्रपति का विदेश दौरा आकर्षण का केंद्र नहीं होता लेकिन प्रणब मुखर्जी की फिलिस्तीन, जॉर्डन और इस्राइल का दौरा जून में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बहुप्रतक्षित इस्राइल दौरे का अग्रदूत साबित हुआ.
जनवरी 2016 मे भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी इस्राइल का दौरा किया था. उनका दौरा नई दिल्ली के प्रयासों को जारी रखने का हिस्सा था जो न सिर्फ इस्राइल के साथ भारतीय संबंधों को मजबूत बनाना चाहता है बल्कि इसे अधिक सार्वजनिक भी करना चाहता है.

फिलिस्तीन के मुद्दे पर भारत का रवैया

अतीत में भारत के सर्वोच्च नेताओं द्वारा इस्राइल के किए गए महत्वपूर्ण दौरे फिलिस्तीन के साथ एक ही दौरे में मिलाए गए थे. विदेश मंत्री जसवंत सिंह और केंद्रीय गृह मंत्री एल.के. अडवाणी के वर्ष 2000 का दौरा और वर्ष 2012 में विदेश मंत्री के तौर पर एस.एम. कृष्णा का दौरा को क्षेत्रीय दौरा बताया जाता है क्योंकि इन मंत्रियों ने अपने दौरे के दौरान इस्राइल और फिलिस्तीन दोनों ही के सरकारों के साथ बैठक की थी.
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नवंबर 2014 में इस्राइल का दौरा किया था. चूंकि यह दौरा सिर्फ इस्राइल का था, इसलिए इसे ऐतिहासिक दौरा कहा गया था. गृह मंत्री के दौरे से फिलिस्तीनी अधिकारियों से मुलाकात को हटाए जाने की घटना को इस्राइल के साथ जॉर्डन और फिलिस्तीन के उच्च –स्तरीय आधिकारिक दौरों को एक साथ किए जाने की भारत सरकार की परंपरा को बदलने के तौर पर देखा गया था.
अब, इस समय, भारतीय सरकार ने इस्राइल के साथ बीते युग की परंपरा को खत्म करने का फैसला किया है. इससे पहले भारत  इस्राइल– फिलिस्तीन विवाद के बढ़ने के आधार पर हमेशा इस्राइल के साथ समझौते पर प्रतिबंध लगाता रहा है,
फिलिस्तीन के मामले पर भारत के बदलते विचार के सबूत भारत सरकार द्वारा उठाए गए हाल के कदमों में पाए जा सकते हैं. इनमें से एक है संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (यूएनएचआरसी) में बीते वर्ष गाजा में "कथित युद्ध अपराधों" का जिक्र करते हुए इस्राइल की आलोचना करना और वोटिंग प्रक्रिया का हिस्सा न बनना.
यूएनएचआरसी में वोट यूएनएचआरसी की एक रिपोर्ट पर आधारित था, जिसमें कहा गया था कि इस्राइल और फिलिस्तीन सशस्त्र बलों ने 50 दिनों तक चले गाजा युद्ध के दौरान युद्ध अपराध किए हैं. इस युद्ध में करीब 1,500 लोगों की मौत हुई थी. मतदान का हिस्सा न बनने वाले देशों में से भारत भी एक था. अन्य देश थे– मैसिडोनिया, इथियोपिया, केन्या और पैरागुवे. इस्राइल का सबसे बड़ा समर्थन संयुक्त राज्य अमेरिका ने रेजल्युशन के खिलाफ वोट किया था.

भारत और इस्राइल के बीच समझौते

वर्तमान में, इस्राइल भारत के सर्वोच्च रक्षा भागीदारों में से एक है. वर्ष 1992 और 2016 के बीच भारत  ने इस्राइल से निगरानी के लिए मानवरहित हवाई वाहनों, जमीन– से– हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों, रडारों और एंटी– टैंक मिसाइलों का आयात किया है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट(एसआईपीआरआई), जो वैश्विक रक्षा बिक्री का विश्लेषण करता है, के अनुसार, भारत 2012 से 2016 बीच हथियारों का आयात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश रहा है. भारत का हथियार आयात कुल वैश्विक आयात का 13% है.

एसआईपीआरआई के आंकड़े यह भी बताते हैं कि बीते पांच वर्षों में भारत और इस्राइल के बीच हुए रक्षा सौदे सालाना औसतन 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से भी अधिक के रहे हैं. भारत इस्राइल से जमीन–से–हवा में मार करने वाली मध्यम दूरी की मिसाइल रक्षा प्रणाली भी खरीदना चाहता है. यह सौदा 2.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का होगा. रक्षा के अलावा, आतंकवाद का सामना करने भारत–इस्राइल संबंध का सर्वोच्च उच्च प्रोफाइल है. सबंध खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, पानी, कृषि और शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बने हैं.

प्रभाव

 1. भारत– इस्राइल के बीच मजबूत संबंधों का प्रभाव भारत– अमेरिका के संबंधों पर सीधे– सीधे पड़ेगा जिसे भारत, इस्राइल और अमेरिका के बीच एक नई धुरी के तौर पर देखा जा रहा है.
 2.   यह भारत की आतंकवाद के खिलाफ लंबी जंग को भी प्रभावित करेगा. यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान को अलग–थलग करने में भारत की मदद करेगा.
 3. मजबूत द्विपक्षीय संबंध भारत की रक्षा रणनीति को बढ़ावा दे सकती है.
 4.   भारत यूएनएसई की स्थायी स्थस्यता में इस्राइल से समर्थन मिलने की उम्मीद कर रहा है.
 5.  यह अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे नाटो, आसियान, ब्रिक्स आदि में भारत को विशेष मान्यता भी दिलाएगा.
 6.  भारत के किसानों को इस्राइल के ड्रिप सिंचाई में विशेषज्ञता का लाभ मिलेगा. हैदराबाद और बैंगलोर में कई स्टार्ट–अप्स इस्राइली कृषि कंपनियों को रोल मॉडल के रूप में देखते हैं.

चुनौतियां

भारत ने फिलिस्तीन राज्य की स्वतंत्रता का ऐतिहासिक रूप से समर्थन किया है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि एकल दौरा भारत के परंपरागत दृष्टिकोण की गंभीरता को प्रभावित कर सकते हैं. अभी तक भारत ने पश्चिम एशियाई क्षेत्र में क्षेत्रीय खिलाड़ियों के बीच व्यावहारिक संतुलन बनाने में कामयाबी हासिल की हुई है. भारत के लिए ईरान और खाड़ी के देशों के साथ अपने महत्वपूर्ण ऊर्जा समझौतों को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा. और भारतीय प्रधानमंत्री की एकल यात्रा नए ठोस परिणाम प्राप्त करने में सक्षम हैं, इस पर भी लोगों को आश्चर्य हो सकता है.
भारत के सामने एक और चुनौती यह है कि नई दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए बोली लगाई है. भारत को अपनी उम्मीदवारी के लिए अरब देशों से ठोस समर्थन की जरूरत है. ये अरब देश संयुक्त राष्ट्र महासभा में बड़ा समूह बनाते हैं और वे फिलिस्तीन की वजह से भारत को दूर होता नहीं देखना चाहेंगे.

निष्कर्ष

इस्राइल के राजनयिक और राजनेता भारत के साथ इस्राइल के निकट संबंधों के प्रति बेहद स्पष्ट हैं. इस्राइल के लिए यह अनुकूल सार्वजनिक संदर्भ ने वर्तमान भारतीय सरकार को इस्राइल के साथ सौदा करने में अपने पूर्वर्ती सरकारों से अलग करता है. इस्राइल और भारत के बीच इन विकासों के साथ सकारात्मक संकेत मिलते हैं. इस्राइल नीति में भारत के बदलाव भी स्पष्ट नजर आते हैं. इसे देखते हुए, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक चिंताओं के रूप में भारत– इस्राइल संबंध और भारत के अरब देशों के साथ संबंध को अलग करने में सफल होगा.

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