चीन के वन बेल्ट वन रोड पहल पर भारत की चिंताएं

 हाल ही में बीजिंग में संपन्न वन बेल्ट, वन रोड (ओबोर) शिखर सम्मेलन का बहिष्कार किया गया था. ओबोर का बहिष्कार करते हुए  भारत ने कहा, "कोई भी देश उस परियोजना को स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को अनदेखा किया गया हो”. इस आर्टिकल  में इस पूरे मुद्दे की गहनता के साथ परिचर्चा की गई है.

Created On: May 29, 2017 13:52 ISTModified On: May 29, 2017 14:52 IST

द फर्स्ट वन बेल्ट, वन रोड (ओबोर) शिखर सम्मेलन 15 मई 2017 को बीजिंग, चीन में संपन्न हुआ. शिखर सम्मेलन में  57 देशों के प्रतिनिधियों के लिए वन बेल्ट, वन रोड पहल के तहत व्यापार मार्गों के नेटवर्क का निर्माण करने की चीन की योजनाओं का प्रदर्शन किया गया.
ओबोर की वित्तीय शाखा एशियाई बुनियादी ढांचा निवेश बैंक (एआईआईबी) के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत को इस शिखर सम्मेलन में शामिल होना चाहिए लेकिन भारत ने संप्रभुता, प्रक्रियाओं और नेतृत्व से संबंधित कुछ मुद्दों को लेकर इस सम्मलेन का बहिस्कार किया है.
ओबोर का बहिष्कार करते हुए  भारत ने कहा, "कोई भी देश उस परियोजना को स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें उसकी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को अनदेखा किया गया हो”.
इस पृष्ठभूमि में वन बेल्ट वन रोड के दायरे और लाभ, इससे जुड़ी भारत की चिंताएं उसके कारण, निदान आदि के विषय में सही जानकारी जरुरी है.

भारत चीन रिश्ते वन बेल्ट वन रोड क्या है?
•    पहली बार  चीन की शीर्ष आर्थिक नियोजन एजेंसी, राष्ट्रीय विकास और सुधार आयोग (एनडीआरसी) ने 28 मार्च 2015 को वन बेल्ट, वन रोड पहल के लिए एक कार्य योजना जारी की.
•    मुख्य रूप से  इस पहल में  2049 तक एशिया, यूरोप और अफ्रीका के तीन महाद्वीपों को जोड़ने वाले नए मार्गों को स्थापित करने की कोशिश करने की बात की गयी है.
•    जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि  वन बेल्ट वन रोड के दो हिस्से हैं,सिल्क रोड आर्थिक बेल्ट और 21 वीं सदी का समुद्री सिल्क रोड.
•    सिल्क रोड आर्थिक बेल्ट (एसआरईबी): यह मध्य एशियाई क्षेत्र के पहाड़ी क्षेत्रों में कटौती करके चीन को यूरोप से जोड़ने का प्रयास करता है.
•    बेल्ट शब्द को ओवरलैंड रोड और रेल मार्ग, तेल और प्राकृतिक गैस पाइपलाइन और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के एक नियोजित नेटवर्क के रूप में संदर्भित किया गया है.
•    यह नेटवर्क मध्य एशिया से होते हुए मध्य चीन में शीआन तक  फैला हुआ है और अंततः मॉस्को, रॉटरडैम और वेनिस तक पहुंचता है.
•    इसका फोकस संयुक्त रूप से नई यूरेशियन लैंड ब्रिज का निर्माण और अंतरराष्ट्रीय परिवहन मार्गों का लाभ उठाकर चीन-मंगोलिया-रूस, चीन-मध्य एशिया-पश्चिम एशिया और चीन-इंडोचाई ना प्रायद्वीप आर्थिक गलियारों के विकास पर है.
•    यद्यपि चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर और बांग्लादेश-चीन-भारत-म्यांमार इकोनॉमिक कॉरिडोर ओबोर का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन वे इससे संबंधित हैं.
•    21 वीं सदी समुद्री सिल्क रोड (एमएसआर): यह एसआरईबी के समुद्री समकक्ष है और अफ्रीकी तट से चीन के बंदरगाह से होते हुए स्वेज नहर के माध्यम से भूमध्य सागर तक पहुँचता है.
•    यह योजनाबद्ध बंदरगाह और अन्य तटीय बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का एक नेटवर्क है जो दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया से पूर्व अफ्रीका और उत्तरी भूमध्य सागर तक फैला हुआ है.
•    यह दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर के जरिये चीन के तट से यूरोप तक जाने के लिए बनाया गया है  और चीन के तट से दक्षिण चीन सागर से एक रूट तथा  दक्षिण प्रशांत क्षेत्र तक दूसरे रूट के रूप में जाना जाता है.

योजना का क्षेत्र क्या है?


•    ओबोर का दायरा बुनियादी ढांचा निर्माण से आगे है. इसमें विदेशी देशों द्वारा रेंमीनबी, चीनी मुद्रा के अधिक से अधिक वित्तीय एकीकरण और उपयोग को बढ़ावा देने का प्रयास भी शामिल हैं.
•    सिल्क रोड के विषय में क्षेत्रीय सूचना और संचार प्रौद्योगिकी नेटवर्क को जोड़ने तथा क्षेत्र में सीमा पार व्यापार और निवेश के लिए कम बाधाएं एवं अन्य पहलों से सम्बंधित सूचनाओं की जानकरी हेतु इस योजना का विस्तार किया जायेगा.
•    एशियाई इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) और न्यू सिल्क रोड फंड (एनएसआरएफ) जैसे नए क्षेत्रीय संस्थान भी ओआरओबी द्वारा किये गए पहलों की पूर्ति में सहयोग करेंगे.
•    एशियाई इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक का प्राथमिक उद्देश्य एशिया में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का वित्तपोषण करना है.15 महीने की भागीदारी प्रक्रिया के बाद 16 जून 2016 को 100 बिलियन अमरीकी डालर का फंड शुरू हो गया.
•    वर्तमान में इसमें भारत सहित 53 सदस्य हैं, जो एआईआईबी के संस्थापक सदस्य हैं.
•    जून 2016 में  एआईआईबी ने चार देशों - पाकिस्तान, बांग्लादेश, ताजिकिस्तान और इंडोनेशिया में परियोजनाओं के लिए 509 मिलियन अमरीकी डालर का प्रथम ऋण स्वीकृत किया.
•    मई 2017 में  आंध्र प्रदेश में बिजली परियोजना के लिए एआईआईबी ने 160 मिलियन अमरीकी डालर के ऋण का अनुमोदन किया था. यह भारतीय परियोजना के लिए इस बैंक से पहला क्रेडिट था.
•    नई सिल्क रोड फंड (एनएसआरएफ):एनएसआरएफ का उद्देश्य वन बेल्ट, वन रोड के साथ देशों में बढ़ते निवेश को बढ़ावा देना है। अभी तक, चीन ने इस फंड के लिए 40 अरब डॉलर का आश्वासन दिया है और यह 29 दिसंबर 2014 से चालू हो गया है.

ओआरओबी के क्या लाभ हैं ?

ओआरओबी से चीन को मिलने वाला लाभ


•    ओआरओबी के तहत प्रस्तावित कई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं से चीन के सबसे गरीब और कम विकसित क्षेत्रों में मंदी के प्रभाव को कम करने में मदद मिलने की संभावना है.
•    ओआरओबी की पहल चीन की आंतरिक आर्थिक एकता और प्रतिस्पर्धा में सुधार करेगी और क्षेत्रीय रूप से संतुलित विकास को भी प्रोत्साहित करेगी.
•    इसके निर्माण का मुख्य उद्देश्य चीन की भारी औद्योगिक क्षमता का उपयोग करने और क्षेत्रीय बाजारों में चीनी वस्तुओं के प्रवेश को आसान बनाने में उसकी मदद करना है.
•    यह योजना पड़ोसी देशों के मध्य आर्थिक सहयोगकर्ता के रूप में चीन के महत्व को और मजबूत करेगी और संभावित रूप से इस क्षेत्र में बीजिंग के कूटनीतिक उत्थान को बढ़ावा देगी.
•    विशेष रूप से मध्य एशिया में ऊर्जा और खनिज संसाधनों में निवेश में वृद्धि तथा  विदेशी देशों से आयातित वस्तुओं जिसमें मलक्का के स्ट्रेट ऑफ ट्रांसलेट का तेल शामिल है,पर चीन की निर्भरता को कम करने में भी मदद कर सकता है.

अन्य क्षेत्रों को लाभ

•    संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के अनुसार, बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव आर्थिक विकास और क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक शक्तिशाली मंच का प्रतिनिधित्व करता है.
•    यह योजना 68 देशों के 4 अरब से अधिक लोगों को प्रभावित करती है. इनमें से अधिकांश विकासशील देशों से सम्बद्ध हैं.
•    विकासशील और विकसित देशों में 2030 तक सतत विकास एजेंडे द्वारा निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने में इसकी संवर्धित बुनियादी सुविधाएं मदद करेंगी.
•    मध्य एशिया क्षेत्र में ऊर्जा संपन्न देशों के संसाधन, ऊर्जा और ऊर्जा की मांगों को पूरा करने में भारत और चीन जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की सहायता करेंगे.
•    एनडीआरसी के अनुसार, साझा हितों, नियति और जिम्मेदारी के सिद्धांत, परस्पर राजनीतिक विश्वास, आर्थिक एकीकरण और सांस्कृतिक समावेश को प्राप्त करने में मदद करेंगे.

भारत की मुख्य चिंता क्या हैं?

एक बेल्ट एक रोड
•    रक्षा मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (आईडीएसए) के अनुसार, ओबोर की पहल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक खुला खतरा नहीं है.
•    हालांकि आईडीएसए के अनुसार, ओबोर का विवरण उजागर करने से भारत को सूक्ष्म सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.
•    एसआरईबी के सन्दर्भ में सबसे बड़ी चुनौती चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) से हैं
•    सीपीईसी परियोजना का संबंध चीन के झिंजियांग प्रांत में कशगर को पाकिस्तान में ग्वादर की रणनीतिक बंदरगाह को जोड़ने से है.भारत के लिए हमेशा से ग्वादर पोर्ट पर चीन-पाकिस्तान का सम्बन्ध चिंता का विषय रहा है.
•    भारत के एक अभिन्न अंग, पाकिस्तान के अधिकृत कश्मीर में सीपीईसी परियोजना रणनीतिक गिलगिट-बाल्तिस्तान क्षेत्र के माध्यम से चलाया जाता है.इससे साफ जाहिर होता है कि भविष्य में कश्मीर विवाद में चीन 'प्रत्यक्ष पार्टी' के रूप में उभर सकता है. यद्यपि हाल के कुछ वर्षों से कारगिल युद्ध के बाद से चीन कश्मीर मुद्दे पर तटस्थ' स्थिति बनाए हुए है. सीपीईसी परियोजना के तहत भारत के इस 'द्विपक्षीय ऐतिहासिक विवाद'  में एक बार फिर चीन सक्रिय हो सकता है.
•    एमएसआर के सन्दर्भ में भारत के समक्ष दो व्यापक चुनौतियां हैं-
•    पहला दक्षिण चीन सागर के संदर्भ में समुद्री शक्ति के रूप में भारत की उपस्थिति और हिंद महासागर क्षेत्र (आईओआर) में भारत का प्रभुत्व.
•    दूसरा, भारत और अन्य शक्तियों जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका (अमेरिका), ऑस्ट्रेलिया और जापान के बीच आईओआर में विकसित समुद्री समझ.
•    दक्षिण पूर्व एशियाई संघों के एसोसिएशन एशियान आज भारत से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद करता है. अपनी मुख्य एशिया नीति के अंतर्गत अमेरिका भी एशियान क्षेत्र में एक सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आग्रह कर रहा है. एमएसआर निश्चित तौर पर आने वाले वर्षों में एक्ट ईस्ट पॉलिसी तथा इस क्षेत्र में भारत के समुद्री प्रभाव का परीक्षण करेगा.

निष्कर्ष
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वन बेल्ट, वन रोड को 2015 से अपनी विदेश नीति और घरेलू आर्थिक रणनीति दोनों का केंद्र बिंदु बना दिया है। निस्संदेह  इस पहल को कार्यान्वित करने के चीन के प्रयासों से क्षेत्रीय आर्थिक, वास्तुकला, क्षेत्रीय व्यापार, निवेश, बुनियादी ढांचे के विकास पर एक महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा. फलस्वरूप भारत सहित अन्य देशों पर इसका रणनीतिक प्रभाव होगा.
इस सन्दर्भ में भारतीय नीति निर्माताओं का लिटमस टेस्ट का सुखद परिणाम इस क्षेत्र में भारत के हितों के लिए किसी भी तरह की व्यवधान की अनुमति के बगैर इस पहल का सबसे अधिक लाभ उठाने की उनकी क्षमता में निहित है.

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