मातृत्व लाभ बिल 2016 : तथ्य तथा विश्लेषण

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के तुरंत एक दिन बाद भारत सरकार ने मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 पारित किआ. इस लेख में हमने इस बिल के लाभ,फायदे तथा संशोधन का जिक्र किआ है.

Created On: Mar 24, 2017 11:25 ISTModified On: Mar 24, 2017 11:30 IST

मातृत्व लाभ संशोधन बिलभारतीय संसद ने मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 को पारित कर दिया. यह विधेयक अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद पारित किया गया. राज्य सभा ने मातृत्व अवकाश के मानदंड़ों को मंजूर कर लिया. इसके साथ ही भारत अधिकतम मातृत्व अवकाश वाले देशो की सूची में तीसरे स्थान पर आ गया है. भारत से पहले, सिर्फ दो देश हैं जहां सबसे अधिक मातृत्व अवकाश दिए जाते हैं, ये देश हैं– कनाडा और नॉर्वे. कनाडा में  50 सप्ताह और नॉर्वे में 44 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलता है.
वर्तमान विधेयक मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 का संशोधित रूप है. मातृत्व लाभ अधिनियम महिलाओं की नौकरी को बचाता है और अपने बच्चे के पोषण के लिए काम से अनुपस्थित रहने पर भी पूरा वेतन पाने का हकदार बनाता है.
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया है कि, " यह महिलाओं के लिए एतिहासिक दिन है", इसमें आगे कहा गया है कि यह विधेयक, " एक स्वस्थ और सुरक्षित माता एवं सु–पोषित शिशु का मार्ग प्रशस्त करेगा."
इस विधेयक ने कई महिलाओं को खुश होने का कारण दिया है लेकिन इससे कई लोग असंतुष्ट भी . विधेयक के लाभ, हानि और प्रभावों पर नीचे चर्चा की जा रही है.

मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 की मुख्य बातें

1. विधेयक गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की नौकरी की रक्षा करता है और अपने बच्चे का ध्यान रखने के लिए काम से अनुपस्थित रहने के बावजूद पूरा वेतन लेने की सुविधा प्रदान करता है.
2.अब से संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं 26 सप्ताह के पूर्ण वेतन वाले मातृत्व अवकाश की हकदार होंगीं, इसमें 12 सप्ताह की बढ़ोतरी की गई है. यह विधेयक करीब 1.8 मिलियन महिलाओं को लाभ पहुंचाएगा.
3. पहले दो शिशु के बाद 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश जारी रहेगा. इसका अर्थ है तीसरे शिशु के लिए सिर्फ 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलेगा.
4. यह नया कानून 10 या उससे अधिक लोगों को नौकरी देने वाले सभी संगठनों या प्रतिष्ठानों पर लागू होगा. इसके अलावा, संशोधित विधेयक में 30 महिलाओं या 50 कर्मचारियों वाले संगठनों या प्रतिष्ठानों के नियोक्ताओं को कार्यालय में या 500 मीटर के दायरे में किसी भी स्थान पर क्रेच की सुविधा प्रदान करना अनिवार्य बनाया गया है. मां को एक दिन में क्रेच में चार बार जाने की अनुमति होगी. इसमें आराम करने के लिए उनके अंतराल भी शामिल होंगे.
5. यह कानून महिलाओं के घर से काम करने, यदि ऐसा संभव हो तो, की भी इजाजत देता है.
6. विधेयक में यह स्वीकार किया गया है कि वैसी महिलाएं जो बच्चा गोद लेती हैं या बच्चे के लिए सरोगेसी का उपयोग करती हैं, बच्चे के साथ संबंध स्थापित करने हेतु उन्हें आरंभिक महीनों में समय की जरूरत होगी.
नया विधेयक गोद लेने वाली या कमिशनिंग मांओं के लिए 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश की अनुमति प्रदान करता है. कमिशनिंग मां को, " ऐसी मां जिसके अंडे का प्रयोग भ्रूण बनाने में किया गया हो और उसे सरोगेट की कोख में डाला गया हो ( अन्य शब्दों में – जैविक मां)" के तौर पर परिभाषित किया गया है.मातृत्व अवकाश का समय गोद लेने या मां को बच्चा दिए जाने की तारीख से गिना जाएगा.
9. विधेयक तीन माह से छोटे बच्चे को गोद लेने वाली मांओं के साथ– साथ सरोगेट शिशु के लिए अपने अंडे का प्रयोग करने वाली माओं ( जैविक मां) को भी 12 सप्ताह के मातृत्व अवकाश देने की बात करता है. ऐसे मामलों में मातृत्व अवकाश के 12 सप्ताह की अवधि गोद लेने या मां को बच्चा दिए जाने की तारीख से गिनी  जाएगी.  
10. संशोधन यह सुनिश्चित करेगा कि पूर्ण गर्भावस्था अवधि के दौरान पूर्ण मातृत्व देखभाल प्रदान की जाए और संगठित क्षेत्र में अधिक –से – अधिक महिलाओं को शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.

मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 के नुकसान

1. असंगठित क्षेत्र के लिए कोई प्रावधान नहीं है

विधेयक से कुछ प्रतिशत महिलाओं को ही फायदा होगा. ज्यादातर किसान, स्व–रोजगार करने वाली महिलाओं, अनुबंध श्रमिकों के तौर पर काम करने वाली महिलाओं आदि के लिए विधेयक में कोई लाभकारी प्रावधान नहीं किए गए हैं.
यहां तक कि अगर कानून पूरी तरह से लागू भी हो जाए तो अध्ययन बताते हैं कि इससे संगठित क्षेत्र की सिर्फ 1.8 मिलियन महिलाओं को ही लाभ पहुंचेगा और देश की 90% से अधिक महिला कार्यबल जो असंगठित क्षेत्र के दायरे में आती हैं, इस विधेयक के प्रावधानों के लाभों से वंचित रह जाएंगी.
विधेयक के कुछ आलोचकों का यह मानना है कि मातृत्व लाभ सभी महिलाओं को एक समान रूप से मिलना चाहिए और इसमें मजदूरी करने वाली महिलाएं भी शामिल की जानी चाहिए.

2. संसद में रूचि की कमी

जब मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 संसद में चर्चा के लिए रखा गया तब सिर्फ 53 सांसद लोकसभा में मौजूद थे. इनमें 11 महिला सांसद शामिल हैं. इन 11 महिला सांसदों में से भी 8 महिला सांसद विपक्षी दल की और 3 ट्रेजरी बेंच की थीं.

3. महिला रोजगार के लिए निवारक हो सकता है
विधेयक में गैर– भेदभाव की कोई धारा नहीं है जो इस बात की गारंटी के लिए जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति के साथ पैतृक लाभों को प्राप्त करने के लिए भेदभाव नहीं किया जाएगा.
विधेयक में किए गए इस संशोधन के साथ मातृत्व अवकाश की अवधि को वर्तमान के 12 सप्ताह की अवधि से बढ़ाकर 26 सप्ताह किया गया है, इससे निजी क्षेत्र में महिलाओं को नौकरी देने में हतोत्साहित कर सकता है.

4. वैज्ञानिक आधार की कमी
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन सम्मेलन 14 सप्ताह के मातृत्व अवकाश की सिफारिश करता है, भारत में पहले से ही 12 सप्ताह की छुट्टी दी जाती है. पिछले अधिनियम में पूर्व–अवधि औऱ बाद–की अवधि के साथ– साथ गर्भपात समेत अन्य सभी पहलुओं को स्पष्ट रूप से वर्णित किया गया था. इस बात के स्पष्ट कारण नहीं हैं कि क्यों मातृत्व अवकाश के लिए "26 सप्ताह" की अवधि सही मात्रा बन गई. स्वास्थ्य सेवा उद्योग ने ईष्टतम अवकाश अवधि निर्धारित नहीं की है. यह सिर्फ इस बात की सलाह देता है कि बच्चे को कब तक स्तनपान कराना चाहिए.

5.सरोगेसी के बारे में अस्पष्टता

बिल में सरोगेसी के विषय को संबोधित नहीं किया गया है. सरोगेसी के मामले पर राज्य सभा में शीतकाल के दौरान चर्चा की गई थी. लेकिन विधेयक में सरोगेसी को गलत समझा गया है हालांकि यह 100 मिलयन अमेरिकी डॉलर का उद्योग बन चुका है. विधेयक कहता है कि सरोगेसी से पहले बच्चे को अपनाने वाला व्यक्ति बच्चे के साथ संबंध स्थापित करने के लिए मातृत्व अवकाश का हकदार है लेकिन दूसरे कानून सरोगेसी को लगभग असंभव बनाते हैं.

उद्योग पर प्रभाव

लैंगिक समानता पर बात करने वाले कानून सैद्धांतिक रूप से बहुत अच्छे हैं लेकिन उन्हें उद्यम में सहज रूप से होना चाहिए और दायित्व की तरह नहीं लिया जाना चाहिए. इसलिए यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे लाभों को स्वैच्छिक रूप से मान्यता प्रदान करने हेतु उद्योगों को प्रोत्साहित करे.
20 या 25 कर्मचारियों वाले एक स्टार्टअप या एसएमई के लिए 26 सप्ताह का अवकाश बहुत बड़ा नुकसान है क्योंकि वे बहुत कम लाभ पर काम करते हैं.
इस प्रकार के परिदृश्य उद्यम को काफी नुकसान पहुंचाएंगे और कुछ नौकरियों को बेमानी कर देगा.  उच्च न्यूनतम मजदूरी, पीएफ/ईएसआई योगदान में बढ़ोतरी के साथ बड़े बोनस और इस विधेयक में नए अवकाश प्रावधानों के साथ मेक इन इंडिया के आदर्श पहले से कहीं अधिक मुश्किल लगते हैं.
नए विधेयक के परिणामस्वरूप शादीशुदा महिलाओं को नौकरी देने में हिचकिचाहट होगी क्योंकि विकसित देशों में प्रचलित डाटा गोपनीयता कानून भारत में पूरी तरह से नहीं अपनाए जाते.
इसलिए बिना किसी कानूनी दायित्व के क्या आप शादीशुदा हैं? जैसे निजी प्रश्नों को पूछने पर रोक नहीं लगाया जा सकता. ऐसे सवाल साक्षात्कार में पूछे जाते हैं और महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नौकरी हासिल करना आसान नहीं होगा.
26 सप्ताह तक की अनुपस्थिति का प्रबंध करना उद्योग के लिए बहुत मुश्किल होगा. ऐसी बड़ी अनुपस्थिति न तो अस्थायी कर्मचारी द्वारा प्रतिस्थापित की जा सकती है और न ही उत्पादकता को प्रभावित किए बिना प्रणाली को प्रबंधित किया जा सकता है.
इसलिए श्रम कानूनों की पूर्ति की सुविधा का विचार सरकार को उद्योग में इस कानून को सफलतापूर्वक लागू करने में मदद कर सकता है. सरकार को इस प्रकार की सुविधा देने वालों को भी प्रोत्साहित करना चाहिए.

निष्कर्ष

कुछ कमियों के बावजूद यह विधेयक भारतीय महिलाओं के लिए लाभकारी है क्योंकि भारतीय समाज में महिलाओं को बच्चे के प्रति अधिक जिम्मेदार और देखभाल करने वाला माना जाता है. यह विधेयक भारतीय महिलाओं को उनके बच्चों की जिम्मेदारी उठाने में मदद करेगा. यह विधेयक असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए इस प्रकार के कानून की जरूरत पर चर्चा करने की वजह प्रदान करेगा.

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