शत्रु संपत्ति बिल 2016: जानिए कुछ महत्वपूर्ण तथ्य

संसद ने इस महीने शत्रु संपत्ति बिल 2016 पास किया. इससे पहले शत्रु संपत्ति से जुड़े  मुद्दों को हल करने के लिए एक विधेयक,एक सर्वोच्च न्यायलय कई निर्णय, तथा 6 अध्यादेश रह चुके हैं परन्तु शत्रु संपत्ति को ले के विवाद कभी थमा नहीं.हमने इस अंक में इस नए बिल के प्रावधानों तथा इसके प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया है.

Created On: Mar 22, 2017 11:14 ISTModified On: Mar 22, 2017 12:57 IST

शत्रु सम्पत्ती बिल भारत सरकार ने 49 साल पुराने शत्रु संपत्ति विधेयक( Enemy Property Act) में संशोधन करते हुए नया शत्रु संपत्ति बिल पास किया. लोक सभा ने यह बिल 2006 में पास किया था परन्तु यह बिल राज्यसभा में काफी समय से रुका हुआ था. 2006 के बाद, इस बिल के मुद्दों से जुड़े कम से कम 6 अध्यादेश पारित हो चुके हैं. राज्य सभा ने इस बिल में कुछ और संशोधन करते हुए इसे आखिरकार इस बिल को पास कर दिया.
शत्रु संपत्ति बिल 2016,मुख्यतया शत्रु संपत्ति विधेयक 1968 को संशोधित करता है. वित्त मंत्री अरुण जेटलीने कहा कि 2016 का अध्यादेश 14 मार्च के बाद स्थागित कर दिया जायेगा.नए बिल के बाद कुछ नयी निश्चित चीजें पुराने अध्यादेश की जगह लेंगी. उत्तराधिकार का कानून शत्रु संपत्ति पर लागू होना बंद हो जायेगा, शत्रु संपत्ति का संरक्षक नया नियम आने तक संपत्ति का रक्षक रहेगा, तथा शत्रु संपत्ति के रक्षक या शत्रु कंपनी द्वारा सम्पत्ति का हस्तान्तरण नहीं होगा. यह बिल सिविल न्यायालयों तथा अन्य सत्ताओं को शत्रु संपत्ति से जुड़े विवादों को सुलझाने से रोकता है.

शत्रु संपत्ति( Enemy Property) क्या है?

मानव इतिहास में अमूमन यह देखा गया है कि जब देश युद्ध पर होते है तो वह शत्रु देश के नागरिको तथा कम्पनियों की संपत्ति को जब्त कर लेते है. प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्द के समय इंग्लैंड तथा अमेरिका ने जर्मन कंपनियों की संपत्ति जब्त की थी. ऐसी युद्ध तथा सामान परिस्थितियों में जब्त की गई संपत्ति ही शत्रु सम्पत्ती कही जाती है. संपत्ति को जब्त करने वाले देश की यह सोच रहती है कि युद्द के समय शत्रु देश अपनी संपत्ति का उसके खिलाफ इस्तेमाल न कर पाए.
भारत ने भी ऐसी ही परिस्थितियों में अन्य देशो की संपत्ति जब्त की है. भारत ने पकिस्तान तथा चीन के नागरिको से सम्बंधित संपत्ति जब्त की थी. भारत में शत्रु सम्पत्ति के देख रेख के लिए शत्रु संपत्ति विधेयक 1968 में पारित किया गया. जो शत्रु संपत्ति से जुड़े मालिकाना तथा सरंक्षण के मुद्दों के लिए एक कानून था. परन्तु इसमें मालिकाना तथा संरक्षण से जुड़े अधिकारों के लिए बहुत स्पष्टता थी. फलस्वरूप, शत्रु संपत्ति से सम्बंधित कई मुद्दे भारत की न्यायालयो में आ चुके हैं. इन मुद्दों में से कुछ मुद्दों में, भारतीय नागरिको ने मुद्दे है जिनमे उन्होंने कोर्ट से यह पूछा कि उनके पूर्वजो, जो देश छोड़ कर चले गए, की सम्पत्ती का मालिकाना तथा संरक्षण का हक़ किसके पास है? भारत में, अभी तक कुल 9,500 शत्रु संपत्तिया हैं. इनमे से अधिकतर संपत्ति, पाकिस्तानी नागरिको की हैं जिसकी कुल लागत 1,04,339 करोड़ रुपये है.

उदाहरण

हाल ही में शत्रु संपत्ति का विवाद सामने तब आया जब भारत के शत्रु संपत्ति के रक्षक ने नवाब की संपत्ति की शत्रु संपत्ति घोषित किया था. हमीदुल्ला खान भोपाल का आखिरी नवाब था.उसकी दो बेटियाँ थी- आबिदा सुलतान तथा साजिदा सुलतान. हमीदुल्ला खान तथा साजिदा सुलतान ने अपनी संपत्ति कई लोगो को बेची थी जिसके कारण नवाब संपत्ति का मालिकाना हक़ काफी बार बदला. साजिदा सुलतान जो सैफ अली खान की दादी थी, उनकी बहन आबिदा खान 1961 में पकिस्तान चली गई. और भारत में शत्रु संपत्ति विधेयक 1968 में आया.
अगर नवाब प्रॉपर्टी को कोर्ट शत्रु संपत्ति घोषित कर देती है तो नए बिल के मुताबिक इस प्रॉपर्टी से जुड़े सभी लोगो इससे प्रभावित होंगे. भले ही उन्होंने दशको पहले संपत्ति खरीदी हो वो अपना इस संपत्ति से अपना मालिकाना हक़ खो देंगे. नवाब संपत्ति के अंतर्गत व्यावसायिक संपत्ति, होटल, निजी सम्पत्ती तथा नगर प्रसाशन के स्वामित्व वाली संपत्ति आते है.

शत्रु संपत्ति से जुड़े कानूनों का इतिहास

भारत- चीन1962 युद्द तथा भारत- पाकिस्तान 1965 तथा 1971 युद्ध के समय भारत सरकार ने पाकिस्तानी तथा चीनी नागरिको की संपत्ति भारत का रक्षा अधिनियम के अंतर्गत जब्त की थी. जिस देश ने भारत तथा भारत के नागरिको के खिलाफ आक्रामक काम किये उस देश को शत्रु देश कहा गया. भारत के शत्रु देशो की भारत में जो संपत्ति थी उसे शत्रु संपत्ति कहा गया.
इस संपत्ति के अंतर्गत बिल्डिंग, जमीन, सोना, गहने तथा कंपनियों के शेयर सम्मिलित थे.
भारत का रक्षा अधिनियम कुछ तात्कालिक कानूनों से बना था जिसका प्रभाव युद्ध ख़त्म होते ही ख़त्म हो गया. भारत सरकार ने युद्द के दौरान जब्त संपत्ति के लिए 1968 में शत्रु संपत्ति विधेयक पारित किया. लेकिन इस विधेयक में संपत्ति पर अधिकार से जुड़ी कई अस्पष्टताएं थी. भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने 2005 में इससे जुड़े कुछ सवाल तथा जटिलताओ को सुलझाने की कोशिश की. नयायालय ने अपने निर्णय में कहा कि शत्रु संपत्ति का रक्षक शत्रु संपत्ति को ट्रस्टी की तरह संभाले था शत्रु संपत्ति का मालिकाना हक़ भी उसी के पास कायम रहेगा. इसीलिए शत्रु के देहांत के बाद शत्रु संपत्ति का मालिकाना हक़ इसके वैध वारिस को जाना चाहिए.
भारत सरकार ने 2010 में शत्रु संपत्ति के रक्षक की शक्ति बढ़ने हेतु एक अध्यादेश पारित किया. इस अध्यादेश ने शत्रु संपत्ति के सवामित्व का अधिकार इसके रक्षक को देने की पेशकश की भले ही शत्रु ने अपनी राष्ट्रीयता बदल दी हो या उसका देहांत हो गया हो. लेकिन इस अध्यादेश को जल्द ही ख़त्म कर दिया गया.
इसके बाद शत्रु संपत्ति को लेकर पांच अन्य अध्यादेश पारित हुए. और शत्रु सम्पत्ती ने विधायी ध्यान को 2016 में अपने ओर खींचा. 2016 के अध्यादेश ने शत्रु संपत्ति के रक्षक को स्वामित्व का अधिकार दे दिया. यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के एकदम विपरीत था. और आखिर में दिसम्बर 2016 के अध्यादेश को भारत की संसद ने शत्रु संपत्ति बिल 2016 के रूप में पास किया.

चिंताएं

भारत की संसद में इस मुद्दे पर बहसे हुयी.तथा विपक्षी पार्टियों ने सरकार की इस बात पे आलोचना की कि यह बिल कार्य मंत्रणा समिति के सुझाओं का उल्लंघन करता है और यह बिल तब पास किआ गया जब सदन लगभग सदस्यों से खाली था.
यह बिल शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत हुयी सभी कानूनी सौदों को ख़ारिज करता है.इसका मतलब यह हुवा कि अगर किसी इंसान ने अच्छी भावना के तहत ऐसी सम्पत्ती खरीदी थी तो उससे उस संपत्ति का मालिकाना हक़ छिन जायेगा.
नया बिल भारतीय नागरिको ,जो शात्री संपत्ति के वैध उत्तराधिकारी है, को उत्तराधिकारी बनाने से रोकता है तथा उन्हें शत्रु शब्द के परिभाषा के अन्दर ले आता है.
यह बिल सिविल न्यायालयों तथा अन्य सत्ताओं को शत्रु संपत्ति से जुड़े विवादों को सुलझाने से रोकता है.
इस बिल के अनुसार शत्रु संपत्ति से जुड़ी न्यायिक सुनवाई केवल उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों में ही होगी.

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