ट्विन बैलेंस शीट समस्या

ट्विन बैलेंस शीट एक बहुत महत्वपूर्ण  समस्या है, क्योंकि यह देश में निजी निवेश की राह में एक बाधा बनती जा रही है और इसलिए इसकी पकड़ सभी प्रकार के क्षेत्रों के विकास में है।

Created On: Feb 22, 2017 20:10 ISTModified On: Feb 22, 2017 20:07 IST

Twin balance sheet syndromeट्विन बैलेंस शीट समस्या

भारत वित्तीय क्षेत्र में जिन समस्याओं से जूझ रहा है उनमें कॉर्पोरेट बैलेंस शीट और बैंक बैलेंस शीट की समस्या भी शामिल हैं। आर्थिक सर्वेक्षण में भी ट्विन बैलेंस शीट की समस्या की झलक देखने को मिली थी। यह समस्या पुरानी और कंपनियों के दवाब की है तथा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक बैलेंस शीट में बढ़ता हुआ एनपीए भी इसमें शामिल है।

क्या यह एक महत्वपूर्ण समस्या है?

यह एक बहुत महत्वपूर्ण  समस्या है, क्योंकि यह देश में निजी निवेश की राह में एक बाधा बनती जा रही है और इसलिए, इसकी पकड़ विकास के सभी प्रकार के क्षेत्रों से संबंध रखती है। अधिकतर मुद्दे जिनका हल सरकार द्वारा किया गया है, उनमें सरफेसी अधिनियम से लेकर सामरिक ऋण, पुनर्गठन और दबाव वाली परिसंपत्तियों की सतत संचरना से लेकर कंपनियों का पुनर्निर्माण जैसी समस्याएं शामिल है।
इस समस्या से निपटने के लिए अतीत में उठाए गए कदम
भारत ने इस समस्या को हल करने के लिए कई पारंपरिक रास्तों की तरफ रूख किया है। और एक परिणाम के रूप में किसी भी परिसंपति को लेने के लिए बैंकों के पास या किसी अन्य संगठन के पास पर्याप्त कानून मौजूद  हैं। किसी भी अन्य संगठन के लिए पैसा वापस करने और उसे निपटाने के लिए नियम और सख्त हो गए हैं।
उदाहरण के लिए, यदि एक स्टील योजना एसडीआर मार्ग का उपयोग कर अपने ऋण दायित्वों को पूरा करने में असमर्थ रहती है, तो ऐसी स्थिति में बैंक द्वारा उसे टेक ओवर करने का विचार अच्छा विचार हो सकता है। लेकिन, अगर इस्पात क्षेत्र संकट में है, तो बैंक के लिए यह मुश्किल हो जाता है कि वह किसी खरीददार से इस संपत्ति की अच्छी कीमत वसूल सके।
इसके अलावा, बैंक इसे अनिश्चित काल की अवधि के लिए अपने साथ नहीं रख सकता है, क्योंकि इसका चालू रहना बहुत जरूरी है। यह भी एक तथ्य है कि एक भौतिक संपत्ति बहुत तेजी से खराब हो जाती है। किसी भी पुर्ननिर्माण परिसंपत्ति वाली कंपनी को लंबे समय तक अपने पास रखना बैंक के लिए भी मुमकिन नहीं है क्योंकि इससे संपत्ति की कीमत में कमी आने लगती है।
एक परिसंपत्ति को बेचने की प्रक्रिया, एक सामान्य रूप में देश और विशेष रूप से क्षेत्र, दोनों की आर्थिक स्थिति पर बेहद निर्भर करता है।
उदाहरण के लिए, पिछले दो साल में सीमेंट उद्योग के कई क्षेत्र और कई बिजली क्षेत्रों में कई महत्वपूर्ण सौदे हुए हैं। इन सौदों में मजबूत कंपनियों ने कमजोर संपत्ति या निष्क्रिय हो चुकी कंपनियों की पूरी डिवीजनों को अधिग्रहित कर लिया। लेकिन इस तरह के सौदे सभी क्षेत्रों में नहीं देखे गए थे।
उन क्षेत्रों में जहां अति महत्वपूर्ण क्षमता है या जहां एक नया व्यवसाय स्थापित करने में आसानी है तथा और एक बड़े व्यवसाय को शुरू करना कम खर्चीला है, इन क्षेत्रों में ऐसे सौदे नहीं हुए।
अब यहां ऋण (लोन) की बात आती है तो यह एक सेवा उन्मुख क्षेत्र के लिए दिया जाता है, उदाहरण के लिए विमान सेवाएं। इसके पीछे कारण हैं- बैंकरों को होने वाली कठिनाइयां और किंगफिशर तथा कई अन्य मृत प्राय हो चुकी एयरलाइनों के कारण बैंकों की मुसीबतें बढ़ गयीं क्योंकि इन एय़रलाइन कंपनियों के पास इतनी पर्याप्त संपत्ति नहीं थी कि उन्हें बेच के लोन के पैसे हासिल किए जा सके।  अधिकांश एयरलाइने पट्टे पर विमान के साथ कार्य कर रहीं थी और ऐसी स्थिति में विमान प्रदाता कंपनी ने केवल विमान वापस ले लिया।

आर्थिक सर्वेक्षण द्वारा पेश किए गए समाधान

आर्थिक सर्वेक्षण में सुझाव है कि सबसे जटिल और सबसे बड़ी एनपीए खरीदने और फिर उनका निपटान करने के लिए पब्लिक सेक्टर एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (पीएआरए) का गठन किया जाए। यह एक उचित विचार की तरह लगता है, लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि पीएआरए (जिसे लोगों ने एक बुरा बैंक करार दिया है) को भी संपति के निपटान में उसी तरह की समस्या का सामना करना पडेगा जैसा कि बैंको के साथ होता है और ऐसी स्थिति में यह भी विफल रहेगा।
 यह स्पष्ट है कि यदि निष्क्रिय हो चुकी संपत्ति के लिए एक बाजार है, तो फिर पैसे को वसूल करने की समस्या नहीं होगी। असली समस्या यह है कि यहां निष्क्रिय हो चुकी संपति की कंपनी के लिए कोई बाजार ही नहीं हैं और कई क्षेत्र इस तरह की समस्याओं से दो चार हो रहे हैं।
ट्विन बैलेंस शीट की समस्या को हल करने के लिए पीएआरए को क्यों लागू किया जाना चाहिए? इस मुद्दे को समझाने को लेकर आर्थिक सर्वेक्षण में इन 6 कारणों पर बल दिया गया है :
1. यह सिर्फ बैंक नहीं है, यह कंपनियों के बारे में भी बहुत कुछ है। अब तक, बुरा ऋण (बैड लोन) की समस्या की सार्वजनिक चर्चा का मतलब होता था बैंक की पूंजी। इसके निवारण हेतु टीबीएस की मुख्य बाधा को दूर करने के लिए पैसा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की जरूरत लग रहा था। लेकिन पैसे की व्यवस्था करना सबसे आसान काम है क्योंकि संसाधनों की लागत  का आदेश जारी करना सरकार के हाथ में होता है। सबसे कठिन समस्या है बुरे लोन को हासिल करना।
2.यह एक आर्थिक समस्या है, न कि नैतिकता का खेल । बगैर शक के कई ऐसे मामले हैं जहां ऋण चुकाने की समस्याओं का कारण केवल पैसा रहा। लेकिन विशाल समस्याओं के कारण ही आर्थिक माहौल में अप्रत्याशित परिवर्तन हुए हैं। इनमें समय सारिणी, विनिमय दरें, और विकास दर मान्यताएं गलत साबित हुई हैं।
3.भारी मात्रा में कर्ज बड़ी कंपनियों को दिया गया है। एकाग्रता एक अवसर पैदा करती है क्योंकि टीबीएस का प्रयोग मामलों की एक अपेक्षाकृत छोटी संख्या को हल करने के लिए किया जा सकता है। लेकिन यह भी एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है, क्योंकि बड़े मामलों का हल करना स्वाभाविक रूप से मुश्किल हो जाता है।
4. इनमें से अधिकतर कंपनियों को वर्तमान कर्ज के मामले मौजूदा स्तर पर अलाभकारी हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ी कंपनियों में नकदी प्रवाह कम हो गया है, वो भी वहां हुआ जहां इस मुद्दे का हल करने के लिए लगभग 50 प्रतिशत से अधिक की आवश्यकता है ऐसे में एकमात्र विकल्प इक्विटी के लिए ऋण में परिवर्तित करना, कंपनियों को अपने हाथ में लेना, और फिर उन्हें नुकसान में बेचना आदि रह जाता है।
5. अपनी योजनाओं में मदद करने के बावजूद बैंकों को इन मुद्दों का हल निकालने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। अन्य मुद्दों के अलावा, वे गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं,क्योंकि कई बड़े लेनदार इससे जुड़े हुए हैं। यदि पीएसयू बैंक बड़े कर्ज में कटौती करते हैं तो यह जांच एजेंसियों का ध्यान आकर्षित कर सकती है। लेकिन बड़ी कंपनियों पर कार्यवाई करना राजनीतिक रूप से मुश्किल है।
6. देरी से इसमें समस्या पैदा हो रही है। चूंकि बैंक बड़े मामलों को हल नहीं कर सकते, वे बस देनदार को पैसा मुहैया करा सकते हैं। लेकिन यह सरकार के लिए महंगा है, क्योंकि इसका मतलब है बैड लोने बढ़ने के कारण  पुनर्पूंजीकरण में बढ़ोत्तरी होने से राजनीतिक कठिनाइयों में भी बढ़ोत्तरी होती है। देरी होना अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह है क्योंकि बदहाल हो चुके बैंक अपने लोन वापस लेने के लिए प्रयासरत रहते हैं, जबकि मुश्किल दौर से गुजर रही कंपनिया अपने निवेश में कमी कर देती हैं।

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