सार्वभौमिक प्रतिरक्षा अभियान: एक विश्लेषण

भारत में, सर्वभौमिक प्रतिरक्षा अभियान ने कई रोगों की रोकथाम तथा निवारण में बहुत बड़ा योगदान दिया है.यहाँ हमने इस पूरे अभियान , इसका इतिहास तथा इसके प्रभावों की विस्तृत चर्चा की है.

Created On: Mar 30, 2017 11:55 ISTModified On: Mar 30, 2017 12:06 IST

भारत का सार्वभौमिक प्रतिरक्षा अभियान लाभार्थियों, टीकों, भौगौलिक क्षेत्र में विस्तार, प्रतिरक्षा सम्मेलनों तथा आवृत्त विविध क्षेत्रों के हिसाब से दुनिया का सबसे बड़ा अभियान है.

पृष्ठभूमि सार्वभौमिक प्रतिरक्षा अभियान

भारत में (यूआईपी) 1वर्ष तक के शिशुओं को समस्त टीको जैसे OPV, DPT, BCG आदि उपलब्ध करवाने हेतु प्रतिबद्ध है. सबसे पहले यह अभियान 1978 में EPI के लांच साथ शुरू किया गया था. EPI का प्राथमिक लक्ष्य 80% शिशुवों को प्रतिरक्षा अभियान में सम्मिलित करना था. EPI के बाद सार्वभौमिक प्रतिरक्षा अभियान 1985  में कई चरणों में लांच किया गया. 1985  में इस अभियान में खसरे के  टीके को शामिल किया गया तथा 1990 में विटामिन A के अनुपूरण को शामिल किया गया.

इससे पहले भी इसी तरह के अभियानों की बदौलत भारत से चेचक को 1975 में ख़त्म कर दिया गया था. इसके बाद यूआईपी  की मदद से 2014 में भारत पोलियो तथा अगस्त 2015 में मातृ एवं नवजात टिटनेस से मुक्त हो गया. दिसम्बर 2014 में भारत सरकार ने प्रतिरक्षा को महत्व देते हुए मिशन इंद्रधनुष आरम्भ किया. इन्द्रधनुष मिशन का मुख्य उद्देश्य भारत के पांच साल से कम के 90% शिशुओं को पूरी तरह से प्रतिरक्षित करना था.

यह टीके क्या हैं ?

अब सरकार द्वारा यूआईपी में  चार नए टीके शामिल गए है, यह टीके पोलियो, पी सी वी टीका, दस्त के लिए रोटावायरस टीका, न्यूमोनिया के लिए टीका तथा खसरा के लिए रूबेला टीका है.
इससे पहले भारत सरकार ने 2011 में एचआईबी (Haemophilus influenza type B) के लिए एक पंचसंयोजक टीका का सूत्रपात किया था. यह पंचसंयोजक टीका टीटेनस, दिप्थीरिया, हैपेटीटस B, काली खांसी, तथा HIB की रोकथाम के लिए लांच किया गया था. इसके अलावा, भारत नवजात कार्य योजना ( आई एन ए पी )सितम्बर 2014 में लांच की गई. इस अभियान का उद्देश्य मृतप्रसव को रोकना तथा  नवजात शिशुओं की मृत्यु दर कम करना था. इस  योजना का एक और उद्देश्य देश की नवजात मृत्यु तथा मृत प्रसव की दर को 2030 तक एकल अंक तक लाना है. वर्तमान में, भारत में यह दर 38/1,000 है. सरकार ने इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्धता दिखाते हुए यूआइपी में चार नये टीके शामिल किये है जो निम्न हैं:

1.न्यूमोकोकल संयुग्म टीका

भारत में बैक्टीरियल निमोनिया की वजह से पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु किसी भी अन्य बीमारी की तुलना में सबसे अधिक होती है. दुनिया में स्ट्रैपटोकोकस निमोनिया से सबसे ज्यादा मृत्यु भारत में होती है. यह बैक्टीरिया सामान्यतया निमोनिया से जुड़ा है. भारत में
न्यूमोकोकल निमोनिया के 5-6 लाख गंभीर मामले तथा इसकी वजेह से 95,000-1,05,000 मृत्यु वार्षिक रूप से अब भी होती हैं. यूआईपी में अब न्यूमोकोकल निमोनिया के लिए टीका उपलब्ध है.

2. पेपिलोमा वायरस टीका

दुनियाभर में महिलाओं को होने वाले कैंसर में शीर्ष से तीसरा कैंसर ग्रीवा का कैंसर है. विश्वभर में हर चौथे ग्रीवा कैंसर में एक मामला भारत का होता है. भारत में इसके अमूमन 1.32 लाख नए मामले हर साल आते हैं और इसकी वजह से तकरीबन 75,000 मृत्यु हर साल होती हैं. एच पी वी -16 तथा 18 लगभग 80 to 85 प्रतिशत ग्रीवा कैंसर के लिए उत्तरदायी हैं. अब यूआइपी के तहत इसके रोकथाम के लिए टीके उपलब्ध हैं जो 9-13 वर्ष तक की बालिकाओं को दिए जाते हैं.

3. इन्फ्लुएंजा का टीका

यह ज्ञात है कि माँ टीके से रोके जा सकने वाली बीमारियों  से गर्भावस्था के दौरान प्रतिरक्षा करने से माँ तथा पैदा होने वाले शिशु को उन बीमारियों से बचाती है. यह MNT की रोकथाम के लिए एक कारगर तरीका है.क्लिनिकल परीक्षणों से यह सामने आया है कि गर्भवती महिलाओं को शुरू के छः महीनो में लगाने से इन्फ्लुएंजा टीका लगाने से माँ और नवजात शिशु दोनों को इन्फ्लुएंजा बीमारी से बचाया जा सकता है.
 महाराष्ट्र सरकार ने गर्भवती महिलाओं के लिए मौसमी फ़्लू टीकाकरण आरम्भ किया है. मौसमू फ्लू टीका H1N1 महामारी जैसी बीमारियों से भी गर्भवती महिलाओं को बचाता है.

4.हैजा का टीका


हैजा भारत में रोगों की संख्या तथा मृत्यु दर बढाने में एक प्रमुख कारक है. भारत में हैजा की रोकथाम तथा इलाज के लिए भारत में बना मौखिक टीका उपलब्ध है. यह अनुमान है कि भारत में हैजा की प्रति वर्ष 7-8 नए मामले आते हैं जो अमूमन 20,000-24,000 मौतों का कारण बनते हैं. इस बीमारी लगभग 400-500 मिलियन लोग खतरे में रहते हैं.

बीमारियों की जानकारी

भारत में दुनिया के सर्वाधिक टीका रहित बच्चे हैं. भारत में 89 लाख बच्चों को सभी  टीके  नहीं मिलते तथा 17 लाख बच्चों को कोई भी टीका नहीं मिलता. भारत में 2014 तक केवल 65% पूरी तरह से प्रतिरक्षित हैं. जर्मन खसरा जो की सीआरएस के नाम से भी जाना जाता है,प्रतिवर्ष कमसे कम 25,000 बच्चो को प्रभावित करता है. इस बीमारी के प्रमुख लक्षण मोतियाबिंद तथा बहरापन है और यह ह्रदय तथा दिमाग को भी प्रभावित कर सकता है.
इसके अलवा, दस्त, जो रोटावायरस की वजह से होते हैं 5 साल तक बच्चो में मौत का प्रमुख कारण है. भारत में 80,000 से 1 लाख  बच्चे इस बीमारी की वजेह से मर जाते हैं जबकि 9 लाख बच्चे गंभीर अवस्था में अस्पतालो में भर्ती किये जाते हैं. अन्य 32.7 लाख बच्चे इस बीमारी की वजह  से अस्पतालों में ले जाये जाते हैं.

यूआईपी के प्रभाव

यूआईपी के अंतर्गत शामिल किये गए टीकों की वजह से 1 लाख वयस्कों की मृत्यु, 1 लाख शिशुओ की मृत्यु तथा कमसे कम 10 लाख अस्पतालों में भर्ती के मामले रोके जा सकेंगे. अब भारत में 13 गंभीर बीमारियों के लिए मुफ्त टीके उपलब्ध हैं जो लगभग 27 मिलियन बच्चों को इन बीमारियों से बचायेंगे. इस वजह से यूआईपी दुनिया का सबसे बड़ा जन्म पलटन वाला अभियान बन जायेगा. कुछ अध्ययनो ने यह दर्शाया है कि टीके रहित बच्चे टीकाकृत बच्चो की तुलना में 5 साल तक मृत्यु के लिए तीन से छः गुना ज्यादा जोखिम में होते हैं. इसीलिए टीके बीमारी तथा मृत्यु रोकने के लागत प्रभावी तथा कारगर हस्तक्षेप हैं.

उपसंहार

अब तक प्रतिरक्षा अभियान ने 5 साल तक के बच्चो में वार्षिक मृत्यु दर को 3.3 मिलियन से 1.3 मिलियन तक कम किया है. प्रतिरक्षा अभियान के बढ़ने तथा नए नए टीको के आने से भारत में रोगों के निवारण तथा रोकथाम में काफी वित्तीय कटौती हुयी है तथा इससे एक बहुत बड़ी आबादी को फायदा हुआ है. खासकर गरीब तबके के लोगो को  प्रतिरक्षा अभियानों से बहुत मदद पहुची है. इसीलिए आने वाले समय में यह उम्मीद बनी रहेगी की इस अभियान से भविष्य में भी रोगों के रोकथाम तथा निवारण में मदद मिलती रहेगी.

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