वोडाफोन ने जीती भारत के खिलाफ पूर्वव्यापी कर मामले में 20,000 करोड़ रुपये की मध्यस्थता

यह मध्यस्थता का मामला वोडाफोन की वर्ष 2007 में भारतीय कंपनी हच एस्सार लिमिटेड की खरीद में दो गैर-निवासी कंपनियों के बीच एक अपतटीय (ऑफ़शोर) लेनदेन का है.

Created On: Sep 29, 2020 16:30 ISTModified On: Sep 29, 2020 17:23 IST

वोडाफोन ग्रुप PLC ने हेग रूलिंग में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय में भारत के खिलाफ दर्ज, लंबे समय से लंबित मध्यस्थता जीत ली है जिसमें भारतीय आयकर अधिकारियों ने नीदरलैंड के साथ द्विपक्षीय निवेश संधि के प्रावधानों का उल्लंघन किया था और कर और दंड के तौर पर 20,000 करोड़ रुपये से अधिक की मांग करने के लिए कानून में संशोधन किया था.

हेग में स्थाई न्यायालय ने यह फैसला सुनाया है कि, यह कर की मांग द्विपक्षीय निवेश संरक्षण समझौते (BIPA) के तहत प्रदान किए गए "न्यायसंगत और उचित व्यवहार मानक" के उल्लंघन में थी. दरअसल, इस मामले में मूल कर की मांग 8,000 करोड़ रुपये से कम थी, लेकिन कर विभाग द्वारा दावा किए गए ब्याज और दंड के कारण इसे बढ़ाकर 22,000 करोड़ रुपये कर दिया गया था.

वोडाफोन ने इस बात की पुष्टि की है कि, निवेश संधि ट्रिब्यूनल ने इस मध्यस्थता मामले को वोडाफोन के पक्ष में पाया. रिपोर्टों के अनुसार, भारत सरकार ने कथित तौर पर इस मध्यस्थता निर्णय के प्रवर्तन को भारतीय अदालतों में चुनौती देने का फैसला किया है और भारत सरकार आश्वस्त है कि, भारतीय अदालतें इस निर्णय को लागू करने के कंपनी के अनुरोध को अस्वीकार कर देंगी

मुकदमा

वोडाफोन इंटरनेशनल होल्डिंग्स BV ने वर्ष 2014 में मध्यस्थता के लिए क़ानूनी कार्यवाही शुरू की थी, जिसमें दावा किया गया था कि, भारत द्वारा आयकर कानून में पूर्वव्यापी संशोधन के माध्यम से उस पर लगाए गए कर दायित्व ने भारत-नीदरलैंड द्विपक्षीय निवेश संधि के तहत न्यायसंगत और निष्पक्ष व्यवहार के सिद्धांतों का उल्लंघन किया था.

स्थायी मध्यस्थता न्यायालय का फैसला: मुख्य विशेषताएं

नीदरलैंड के स्थायी न्यायालय ने अपने एक आदेश में, जिसे 25 सितंबर, 2020 को पारित किया गया था, इस दूरसंचार ऑपरेटर के तर्कों को उचित पाया और भारत सरकार को कंपनी के खिलाफ कर मांग, ब्याज और जुर्माना वापस लेने का निर्देश दिया है.

हेग में स्थित स्थायी न्यायालय ने भारत सरकार को वोडाफोन की कानूनी लागत का 60 प्रतिशत और कंपनी द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को दिए गए शुल्क का 50 प्रतिशत वापस करने का निर्देश दिया है.

भारत की प्रतिक्रिया क्या है?

भारत सरकार ने यह कहा है कि, वह इस निर्णय का अध्ययन करेगी और सभी विकल्पों पर विचार करेगी और उचित फोरम के समक्ष कानूनी उपायों सहित आगे की कार्रवाई के बारे में निर्णय करेगी.

अब भारत सरकार के पास क्या विकल्प हैं?

भारत सरकार अब या तो सिंगापुर उच्च न्यायालय में नवीनतम फैसले के खिलाफ अपील कर सकती है या फिर, इस कर कानून को संशोधित करके, इसे पूर्वव्यापी के स्थान पर, भावी कर कानून बना सकती है. अगर भारत सरकार इस निर्णय के प्रति आगे अपील नहीं करने का विकल्प चुनती है, तो इसे करों के रूप में वोडाफोन को लगभग 85 करोड़ रुपये - करों के तौर पर 45 करोड़ रुपये और लागत के तौर पर 40 करोड़ रुपये - का भुगतान करना होगा. 

पृष्ठभूमि

यह मध्यस्थता का मामला वोडाफोन की वर्ष 2007 में भारतीय कंपनी हच एस्सार लिमिटेड की खरीद का है. वोडाफोन इंटरनेशनल होल्डिंग्स BV ने केमैन आइलैंड्स में स्थित CGP इनवेस्टमेंट्स (होल्डिंग्स) लिमिटेड की पूरी शेयर पूंजी हासिल कर ली थी, जिसके परिणामस्वरूप इसने हच एस्सार में प्रभावी रूप से 67 परसेंट इंटरेस्ट हचिसन टेलीकम्युनिकेशन इंटरनेशनल लिमिटेड से प्राप्त कर लिया था.

इस खरीद को दो गैर-निवासी कंपनियों के बीच अपतटीय लेनदेन के रूप में आयोजित किया गया था. इसके बावजूद, भारत के राजस्व विभाग ने अंतर्निहित परिसंपत्ति के रूप में भारत के शामिल होने के कारण, इस खरीद पर कर लगाने की मांग की और वोडाफोन की नीदरलैंड स्थित होल्डिंग कंपनी को लगभग 12,000 करोड़ रुपये के पूंजीगत लाभ कर के साथ ब्याज और जुर्माने का भुगतान करने के लिए कहा था.

हालांकि, वोडाफोन समूह ने इस मांग का विरोध किया और वर्ष 2012 में इसने भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भारत सरकार के कर विभाग के खिलाफ यह मामला जीत लिया था.

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