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बैंकिंग विनियमन अधिनियम क्या है और इसमें क्या परिवर्तन हुए हैं?

बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 भारत में एक कानून है जो भारत में सभी बैंकिंग फर्मों को नियंत्रित करता है. इसे बैंकिंग कंपनी अधिनियम 1949 के रूप में पारित किया गया था. देश में बैंकों की वित्तीय हालत को ठीक करने के लिए इसमें परिवर्तन करते हुए अब सहकारी बैंकों को भी रिज़र्व बैंक के दायरे में लाया गया है. आइये इस लेख में जानते हैं कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 क्या है और इसमें क्या परिवर्तन किये गये हैं?
Jul 13, 2020 13:43 IST
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Amendments in the Banking Regulation Act
Amendments in the Banking Regulation Act

देश में सहकारी बैंकों और कमर्शियल बैंकों की ख़राब होती हालत को देखते हुए सरकार हर संभव उपाय कर रही है. इसी दिशा में काम करते हुए सरकार ने बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में परिवर्तन करने के लिए एक अध्यादेश पास किया है जिसके कारण भारत के बैंकिंग क्षेत्र का नक्सा हमेशा के लिए बदल गया है.

राष्ट्रपति श्री राम नाथ कोविंद ने सभी शहरी सहकारी बैंकों और बहु-राज्यीय सहकारी बैंकों को रिजर्व बैंक की निगरानी में लाने वाले बैंकिंग नियमन (संशोधन) अध्यादेश, 2020 को 27 जून 2020 को मंजूरी दे दी है. 

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अब अध्यादेश पारित होने के बाद सभी को-ऑपरेटिव, रिज़र्व बैंक की निगरानी में आ जायेंगे जिससे जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा ठीक ढंग से की जा सकेगी.

बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 क्या है? (What is Banking Regulation Act, 1949)

बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 भारत में एक कानून है जो भारत में सभी बैंकिंग फर्मों को नियंत्रित करता है. इसे बैंकिंग कंपनी अधिनियम 1949 के रूप में पारित किया गया था. यह 16 मार्च 1949 से लागू हुआ और 1 मार्च 1966 से बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 में बदल गया था.

यह अधिनियम; भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को बैंकों को लाइसेंस देने की शक्ति देता है, शेयरधारकों के शेयरहोल्डिंग और वोटिंग अधिकारों का नियमन करता है; बोर्डों और प्रबंधन की नियुक्ति की निगरानी करता है. बैंकों के संचालन को विनियमित, ऑडिट के लिए निर्देश देना; नियंत्रण अधिस्थगन, विलय और परिसमापन; सार्वजनिक भलाई और बैंकिंग नीति के हितों में निर्देश जारी करता है और जरूरत पड़ने पर दंड का प्रावधान भी करता है.

आइये जानते हैं कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में क्या-क्या परिवर्तन हुए हैं?

बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में कुछ परिवर्तन किये गये हैं जो कि बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 के तहत किये गए हैं.

विधेयक, 2020 प्रावधान करता है  कि अधिनियम, 1949 इन दो समितियों पर लागू नहीं होगा: (i) प्राथमिक कृषि ऋण समितियों और (ii) सहकारी समितियों पर लागू नहीं होगा, जिनका प्रमुख व्यवसाय कृषि विकास के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण है.

इसके अलावा यह (संशोधन) विधेयक, 2020, इन सहकारी सोसाइटियों को निम्न काम करने की अनुमति भी नहीं देता है;

1. अपने नाम में या उनके व्यवसाय के संबंध में 'बैंक', 'बैंकर' या 'बैंकिंग' शब्दों का उपयोग करें और (ii) एक इकाई के रूप में कार्य करें जो चेक को मंजूरी दे.

2. सहकारी बैंकों द्वारा शेयरों और प्रतिभूतियों को जारी करना: विधेयक यह प्रावधान करता है कि सहकारी बैंक इक्विटी शेयरों, वरीयता शेयरों, या विशेष शेयरों को अंकित मूल्य पर या अपने सदस्यों को प्रीमियम पर या संचालन के अपने क्षेत्र में रहने वाले किसी अन्य व्यक्ति को जारी कर सकता है.

3. संशोधन विधेयक में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति सहकारी बैंक द्वारा उसे जारी किए गए शेयरों के सरेंडर के लिए भुगतान की मांग का हकदार नहीं होगा. इसके अलावा एक सहकारी बैंक RBI द्वारा दिए गए निर्देशों के अलावा अपनी शेयर पूंजी को निकाल या कम नहीं कर सकता है.

4. निदेशक मंडल का गठन: अधिनियम में कहा गया है कि RBI एक बहु-राज्य सहकारी बैंक के निदेशक मंडल को कुछ शर्तों के साथ पांच साल तक के लिए सुपरसीड कर सकता है.  इन शर्तों में ऐसे मामले शामिल हैं जहां आरबीआई द्वारा बोर्ड को सुपरसीड करना और जमाकर्ताओं की सुरक्षा करना सार्वजनिक हित में है.

5. सहकारी बैंकों को छूट देने की शक्ति: संशोधन विधेयक में कहा गया है कि RBI सहकारी बैंक या सहकारी बैंकों के वर्ग को अधिसूचना के माध्यम से अधिनियम के कुछ प्रावधानों से छूट दे सकता है. ये प्रावधान हैं; रोजगार, निदेशक मंडल की योग्यता और, एक अध्यक्ष की नियुक्ति से संबंधित हैं. इनके चयन में किसको क्या छूट मिलेगी यह भी रिज़र्व बैंक द्वारा तय किया जायेगा.

6. बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम,1949 में कहा गया है कि सहकारी बैंक, जिस शहर, स्थान, गाँव में काम कर रहे हैं वहां से हट कर ब्रांच रिज़र्व बैंक की अनुमति के बिना कहीं और नहीं खोल सकते हैं. लेकिन अब इस नए संशोधन विधेयक में यह प्रावधान बदल दिया गया है.

उम्मीद है कि बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम,1949 में बदलाव होने से देश के सहकारी बैंकों के अधिकारियों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप कम होगा और इनकी कार्यशैली में परिवर्तन होगा जिससे भारत की बैंकिंग व्यवस्था में जनता का विश्वास बढेगा.

 

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