सविनय अवज्ञा आन्दोलन

1930 में स्वतंत्रता दिवस के पालन के लीय, गाँधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आन्दोलन की शुरुआत की गयी जिसका प्रारंभ गाँधी जी के प्रसिद्ध दांडी मार्च से हुआ| 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से गाँधी जी और आश्रम के 78 अन्य सदस्यों ने दांडी, अहमदाबाद से 385 किमी. दूर स्थित भारत के पश्चिमी तट पर स्थित एक गाँव, के लिए पैदल यात्रा आरम्भ की| वे 6 मार्च,1930 को दांडी पहुंचे,जहाँ उन्होंने नमक कानून तोड़ा| उस समय किसी के द्वारा नमक बनाना गैर क़ानूनी था क्योकि इस पर सरकार का एकाधिकार था| गाँधी जी ने समुद्री जल के वाष्पीकरण से बने नमक को मुट्ठी में उठाकर सरकार की अवज्ञा की| नमक कानून की अवज्ञा के साथ ही पूरे देश में सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रसार हो गया|

इस आन्दोलन के प्रथम चरण में नमक बनाने की घटनाएँ पूरे देश में घटित हुई और नमक बनाना लोगों द्वारा सरकारी अवज्ञा का प्रतीक बन गया| तमिलनाडु में सी.राजगोपालाचारी ने दांडी मार्च जैसे ही एक मार्च का आयोजन तिरुचिरापल्ली से वेदारंयम तक किया| प्रसिद्ध कवयित्री सरोजिनी नायडू,जो कांग्रेस की महत्वपूर्ण नेता थी और कांग्रेस की अध्यक्ष भी रही थी, ने सरकार के धरसना (गुजरात) स्थित नमक कारखाने पर अहिंसक सत्याग्रहियों के मार्च का नेतृत्व किया| सरकार द्वरा बर्बरतापूर्वक किये गए लाठी चार्ज में 300 से अधिक लोग घायल हुए और दो लोगों की मौत हो गयी| धरना,हड़ताल व विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और बाद में कर देने से भी मना कर दिया गया| महिलाओं की बड़ी संख्या सहित लाखों लोगों ने इस आन्दोलन में भाग लिया था|

साइमन आयोग द्वारा प्रस्तावित सुधारों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा नवम्बर 1930 लन्दन में प्रथम गोलमेज सम्मलेन का आयोजन किया गया| कांग्रेस,जो उस समय देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रही थी ,ने इसका बहिष्कार किया लेकिन भारतीय राजकुमारों के प्रतिनिधियों, मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा व कुछ अन्य नेताओं ने इसमें भाग लिया|इस सम्मलेन का कोई निष्कर्ष नहीं निकला| ब्रिटिश सरकार जानती थी कि कांग्रेस की भागीदारी के बिना कोई भी संवैधानिक बदलाव भारतीय लोगों द्वारा स्वीकृत नहीं होगा|

वायसराय लॉर्ड इरविन के द्वारा वर्ष 1931 के आरम्भ में कांग्रेस को द्वितीय गोलमेज सम्मलेन में भाग लेने के लिए तैयार करने हेतु प्रयास आरम्भ किये गए| अंततः गाँधी और लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ जिसके तहत सरकार उन सभी राजनीतिक कैदियों को छोड़ने के लिए तैयार हो गयी जिनके खिलाफ हिंसा का कोई मुक़दमा दर्ज नहीं था और कांग्रेस भी सविनय अवज्ञा आन्दोलन को स्थगित करने के लिए तैयार हो गयी थी| अनेक राष्ट्रवादी नेता इस समझौते से खुश नहीं थे|

मार्च 1931 में करांची में वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस अधिवेशन में इस समझौते को कांग्रेस द्वारा अनुमोदित कर दिया गया और कांग्रेस ने द्वितीय गोलमेज सम्मलेन में भाग लिया| सितम्बर 1931 में हुए इस सम्मलेन में भाग लेने के लिए कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी को चुना गया |

कांग्रेस के करांची अधिवेशन में मूल अधिकारों व आर्थिक नीति से सम्बंधित महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया गया| इसने देश में व्याप्त सामाजिक व आर्थिक समस्याओं से सम्बंधित राष्ट्रवादी आन्दोलन की नीति को निर्माण किया| इसमें उन मूल अधिकारों का वर्णन था जिन्हें जाति व धर्म के भेदभाव के बिना सभी लोगों को प्रदान किया जायेगा| साथ ही कुछ उद्योगों के राष्ट्रीयकरण,भारतीय उद्योगों के प्रोत्साहन और कामगारों व कृषकों के कल्याण हेतु योजनाओं का भी इसमें समर्थन किया गया था|

इस प्रस्ताव ने राष्ट्रीय आन्दोलन पर समाजवादी विचारों के बढते प्रभाव को प्रदर्शित किया| गाँधी जी,जो कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि थे,के अलावा कुछ अन्य भारतीय भी थे जिन्होंने इस सम्मलेन में भाग लिया था| इनमे भारतीय रजवाड़े, हिन्दू, मुस्लिम और सिक्ख सांप्रदायिक नेता शामिल थे| ये नेता ब्रिटिशों के हाथों की कठपुतली मात्र थे| रजवाड़े मुख्यतः शासकों के रूप में अपनी हितों को सुरक्षित करने में रूचि रखते थे|

सम्मलेन में भाग लेने के लिए सांप्रदायिक नेताओं का चयन ब्रिटिश शासकों ने किया था| उन्होंने दावा किया कि वे अपने अपने समुदायों के प्रतिनिधि है न की देश के,हालाँकि उनके अपने ही समुदाय में उनका प्रभाव बहुत सीमित था| कांग्रेस के प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी ने पूरे देश का प्रतिनिधित्व किया| न तो रजवाड़े और न ही सांप्रदायिक नेता भारत की स्वतंत्रता में रूचि रखते थे| इसी कारण द्वितीय गोलमेज सम्मलेन में कोई समझौता नहीं हो सका और उसे असफल घोषित कर दिया गया|

गाँधी जी ने भारत वापस लौटकर सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पुनः आरम्भ किया| सरकार का दमन सम्मलेन चलने के दौरान भी जारी रहा और अब तो यह और भी ज्यादा तेज हो गया था| गाँधी और अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया| सरकार द्वरा किये दमन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लगभग एक साल में 120000 लोगों को जेल में डाल दिया गया था|

आन्दोलन को 1934 में वापस ले लिया गया| कांग्रेस ने 1934 में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया जिसमे यह मांग की गयी कि लोगों द्वारा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित संवैधानिक सभा आहूत की जाये| इसमें घोषित  किया गया कि केवल ऐसी ही कोई सभा भारत के लिए संविधान का निर्माण कर सकती है| इसमें यह भी कहा गया कि सिर्फ लोगों को ही यह तय करने का अधिकार है कि वे किस प्रकार की सरकार के तहत रहना चाहते हैं| हालाँकि कांग्रेस अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल नहीं हुई लेकिन वह देश के दूसरे सबसे बड़े जन-आन्दोलन में लोगों के एक वर्ग को शामिल करने में सफल रही| इसने भारतीय समाज में बदलाव लाने के लिए क्रांतिकारी लक्ष्यों को भी स्वीकार किया|

सविनय अवज्ञा आन्दोलन का प्रभाव

• इसने ब्रिटिश सरकार के प्रति जन आस्था को हिला दिया और स्वतंत्रता आन्दोलन की सामाजिक जड़ों को स्थापित किया,साथ ही प्रभात फेरी और पर्चे बांटने जैसे प्रचार के नए तरीकों को ख्याति दिलाई|

• इसने ब्रिटिशों की दमनकारी नमक नीति को समाप्त किया जिसका अनुसरण महाराष्ट्र ,कर्नाटक और संयुक्त प्रान्त में वन कानून की अवज्ञा करने तथा पूर्वी भारत में ग्रामीण ‘चौकीदारी कर’ अदा न करने के रूप में किया गया|

Related Categories

Popular

View More