यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई): परिभाषा, विशेषताएं, लाभ और हानि

आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में, देश में गरीबी और आय असमानता को कम करने के प्रयास में, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देश में विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के स्थान पर यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम (यूबीआई) की वकालत की थी.

अर्थशास्त्री सुरेश तेंदुलकर ने देश के गरीब लोगों को पोषण युक्त भोजन खाने के लिए या गरीबी रेखा से बाहर निकालने के लिए प्रति व्यक्ति न्यूनतम प्रति वर्ष Rs.7,620 देने की सिफारिश की थी. इसी सिफारिस को ध्यान में रखकर यूनिवर्सल बेसिक इनकम का विचार पनपा था.

यूनिवर्सल बेसिक इनकम की परिभाषा (Definition of Universal Basic Income);

यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) एक देश के 75% लोगों को एक मुश्त फिक्स धनराशि देने की योजना है. इसमें लाभार्थियों का चयन करने के लिए उनकी आय, रोजगार की स्थिति, भौगोलिक स्थिति इत्यादि का आकलन नहीं किया जायेगा. यूबीआई का उद्देश्य देश में गरीबी को कम करना और नागरिकों में आर्थिक समानता बढ़ाना है.

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एनडीए सरकार देश की 75% आबादी को प्रति व्यक्ति न्यूनतम रु .7,2020 देने की योजना बना रही है. इसका नाम ही यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम होगा.

यूनिवर्सल बेसिक इनकम स्कीम की अनुमानित लागत सकल घरेलू उत्पाद की 4.9% हो सकती है.

यूनिवर्सल बेसिक इनकम की विशेषताएं (Features of Universal Basic Income);

1. यूनिवर्सल स्कीम (Universal Scheme): यूनिवर्सल बेसिक इनकम मुख्य रूप से एक सार्वभौमिक योजना है. इसका मतलब है कि यूबीआई समाज के किसी वर्ग विशेष के लिए खास तौर से नहीं बनायीं गयी है अर्थात इस योजना का लाभार्थी देश का कोई भी नागरिक हो सकता है.

2. निश्चित आय (Fixed Income): लाभार्थियों को एक निश्चित अंतराल पर यानी मासिक / वार्षिक रूप से धन वितरित किया जाएगा.

3. नकद भुगतान (Cash Payment): योजना के अंतर्गत तय राशि को लाभार्थियों के खाते में सीधे ट्रान्सफर किया जायेगा. अर्थात इस योजना में कैश के अलावा कैश जैसी कोई और वस्तु जैसे कूपन इत्यादि नहीं दी जाएगी.

4. बिना शर्त योजना (Unconditional Scheme):

इस योजना में लाभार्थी की आर्थिक स्थिति या रोजगार की स्थिति को ध्यान में नहीं रखा जायेगा. अर्थात लाभार्थी को इस योजना का लाभ लेने के लिए सामाजिक-आर्थिक पहचान को साबित करने की आवश्यकता नहीं है.

5. व्यक्तिगत लाभार्थी (Individual Beneficiary): इस योजना में परिवार के प्रत्येक सदस्य (या वयस्क नागरिक) को व्यक्तिगत रूप से लाभ दिया जायेगा अर्थात इस योजना में लाभार्थी की इकाई व्यक्ति होगी पूरा परिवार नहीं.

 यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) की आवश्यकता क्यों?
1. देश में असमानता को कम करने और गरीबी दूर करने के लिए यूबीआई एक मील का पत्थर साबित होगी.

2. यूबीआई; समाज के गरीब तबके की क्रय शक्ति को बढ़ाएगा, इसलिए अर्थव्यवस्था में सकल मांग अधिक होगी जो उत्पादन और निवेश को प्रेरित करेगी जिससे देश का समग्र विकास होगा.

3. यह योजना देश के सभी व्यक्तियों के लिए सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करेगी.

यूनिवर्सल बेसिक इनकम (UBI) के लाभ:
1. वर्तमान में सरकार विभिन्न सामाजिक कल्याण योजनाओं के माध्यम से लोगों के कल्याण को बढ़ाने का प्रयास करती है लेकिन अब सरकार उन्हें नकद पैसा देकर इस प्रवृत्ति को बदलना चाहती है ताकि लोग अपनी पसंद की सेवाएं / सामान खरीद सकें.

2. यूबीआई व्यक्तियों को सुरक्षित और फिक्स्ड इनकम प्रदान करेगी

3. यह स्कीम देश में गरीबी और आर्थिक असमानता को कम करने में मदद करेगी.

4. यह स्कीम देश के लोगों के हाथों में अतिरिक्त क्रय शक्ति देगी जिससे देश में उत्पादनकारी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.

5. इस योजना को लागू करना आसान है क्योंकि इसमें लाभार्थियों को चिन्हित नहीं करना पड़ेगा.

6. यह योजना सरकारी धन के अपव्यय और भ्रष्टाचार को कम करेगी क्योंकि इसका कार्यान्वयन बहुत सरल है और पैसा सीधे लाभार्थियों के खाते में भेजा जायेगा.

यूबीआई की संभावित कमियां;
1. इस बात की प्रबल संभावना है कि गरीबों को मुफ्त पैसा उन्हें आलसी बना सकता है और वे काम ना करने के लिए प्रेरित होंगे.

2. इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि दी गई नकदी उत्पादक गतिविधियों, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि पर खर्च की जाएगी. यह तंबाकू, शराब, ड्रग्स और अन्य लक्जरी वस्तुओं आदि पर खर्च की जा सकती है अगर ऐसा हुआ तो इस योजना का उद्येश्य ही विफल हो जायेगा.

3. लोगों को मुफ्त नकद देने से अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति की दर में वृद्धि होगी क्योंकि देश में उपभोक्ताबादी गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.

4. बड़ी साधारण सी बात है जब किसी को मुफ्त में खाने पीने को मिलता रहेगा तो फिर वह व्यक्ति काम क्यों करेगा? ऐसा हो सकता है कि लोग फसल की कटाई के समय काम करने से मना कर दें जैसा कि मनरेगा के मामले में देखा गया था. ऐसा भी हो सकता है कि लोग अधिक मजदूरी की मांग करने लगें जिससे कि कृषि उत्पादन की लागत बढ़ जाएगी और किसानों की आय पर विपरीत असर पड़ेगा.

निष्कर्ष में यह कहा जा सकता है कि इतिहास ने साबित कर दिया है कि मुफ्तखोरी ने लोगों की आर्थिक स्थितियों को कभी नहीं बदला है. इसलिए प्रति व्यक्ति 7,620 रुपये प्रति वर्ष देने से बहुत कुछ नहीं बदलेगा जैसा कि मनरेगा जैसी योजना के साथ हुआ है जिसमें गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को हर साल 10 हजार रुपये दिए जाते हैं.

इसलिए समय की जरूरत यह है कि सरकार लोगों को मछली पकड़ना सिखाये ना कि उन्हें मुफ्त में मछली बांटे क्योंकि यदि आप किसी को एक मछली देंगे तो वह अपना पेट भर लेगा लेकिन यदि आपने उसको मछली पकड़ना सिखा दिया तो वह अपने परिवार का पेट भर लेगा.

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