बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों नष्ट कर दिया था?

प्राचीन भारत में नालंदा विश्वविद्यालय उच्च् शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विश्व विख्यात केन्द्र था. यह दुनिया का सबसे पुराने विश्वविद्यालय में से एक है. इसकी स्थापना 5वीं शताब्दी में गुप्त वंश के शासक सम्राट कुमारगुप्त ने की थी और महेन्द्रादित्य के खिताब को अपनाया था. यह विश्वविद्यालय पटना, वर्तमान बिहार राज्य से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास स्थित है.

महायान बौध धर्म के इस विश्वविद्यालय में हीनयान बौद्ध धर्म के साथ अन्य धर्मों की शिक्षा दी जाती थी और अनेक देशों के छात्र पढ़ने आते थे. अनेक पुराभिलेखों और सातवीं सदी में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है. चीनी यात्री ह्वेनसांग ने यहां लगभग साल भर शिक्षा ली थी.

हम आपको बता दें कि विश्व का यह प्रथम पूर्णत: आवासीय विश्वविद्यालय था और उस समय इसमें तकरीबन 10,000 विद्यार्थी और लगभग 2,000 अध्यापक थे. इसमें शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यार्थी भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी आते थे. आइये इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते हैं कि कैसे नालंदा विश्वविद्यालय का पतन हुआ और इसके पीछे क्या कारण थें.

नालंदा विश्वविद्यालय का पतन कैसे और कब हुआ  
अभिलेखों के अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय को आक्रमणकारियों ने तीन बार नष्ट किया था, लेकिन केवल दो बार ही इसको पुनर्निर्मित किया गया.

पहला विनाश स्कंदगुप्त (455-467 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान मिहिरकुल के तहत ह्यून के कारण हुआ था. लेकिन स्कंदगुप्त के उत्तराधिकारीयों ने पुस्तकालय की मरम्मत करवाई और एक बड़ी इमारत के साथ सुधार दिया था.

दूसरा विनाश 7वीं शताब्दी की शुरुआत में गौदास ने किया था. इस बार, बौद्ध राजा हर्षवर्धन (606-648 ईस्वी) ने विश्वविद्यालय की मरम्मत करवाई थी.

तीसरा और सबसे विनाशकारी हमला 1193 में तुर्क सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी और उसकी सेना ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया था. ऐसा माना जाता है धार्मिक ग्रंथों के जलने के कारण भारत में एक बड़े धर्म के रूप में उभरते हुए बौद्ध धर्म को सैकड़ों वर्षों तक का झटका लगा था और तब से लेकर अब तक यह पूर्ण रूप से इन घटनाओं से नहीं उभर सका है.

आइये अब अध्ययन करते हैं कि आखिर बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को क्यों नष्ट कर दिया था?


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उस समय बख्तियार खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था और एक बार वह काफी बीमार पड़ा. उसने अपने हकीमों से काफी इलाज करवाया मगर वह ठीक नहीं हो सका और मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया. तभी किसी ने उसको सलाह दी कि वह नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को दिखाए और इलाज करवाए. परन्तु खिलजी इसके लिए तैयार नहीं था. उसे अपने हकीमों पर ज्यादा भरोसा था. वह यह मानने को तैयार नहीं था की भारतीय वैद्य उसके हकीमों से ज्यादा ज्ञान रखते हैं या ज्यादा काबिल हो सकते हैं.

लेकिन अपनी जान बचाने के लिए उसको नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को बुलवाना पड़ा. फिर बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी और कहां की में उनके द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की दवा नहीं खाऊंगा. बिना दवा के वो उसको ठीक करें. वैद्यराज ने सोच कर उसकी शर्त मान ली और कुछ दिनों के बाद वो खिलजी के पास एक कुरान लेकर पहुंचे और कहा कि इस कुरान की पृष्ठ संख्या.. इतने से इतने तक पढ़ लीजिये ठीक हो जायेंगे.

बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के बताए अनुसार कुरान को पढ़ा और ठीक हो गया था. ऐसा कहा जाता हैं कि राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पन्नों पर एक दवा का लेप लगा दिया था, वह थूक के साथ उन पन्नों को पढ़ता गया और ठीक होता चला गया. खिलजी इस तथ्य से परेशान रहने लगा कि एक भारतीय विद्वान और शिक्षक को उनके हकीमों से ज्यादा ज्ञान था. फिर उसने देश से ज्ञान, बौद्ध धर्म और आयुर्वेद की जड़ों को नष्ट करने का फैसला किया. परिणाम स्वरूप खिलजी ने नालंदा की महान पुस्तकालय में आग लगा दी और लगभग 9 मिलियन पांडुलिपियों को जला दिया.  

ऐसा कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में इतनी किताबें थीं कि वह तीन महीने तक जलती रहीं. इसके बाद खिलजी के आदेश पर तुर्की आक्रमणकारियों ने नालंदा के हजारों धार्मिक विद्वानों और भिक्षुओं की भी हत्या कर दी.

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तबाकत-ए-नासिरी के आधार पर नालंदा विश्वविद्यालय का विनाश कैसे हुआ था, आइये अध्ययन करते हैं

तबाकत-ए-नासिरी, फारसी इतिहासकार 'मिनहाजुद्दीन सिराज' द्वारा रचित की गई पुस्तक है. इसमें मुहम्मद ग़ोरी की भारत विजय तथा तुर्की सल्तनत के आरम्भिक इतिहास की लगभग 1260 ई. तक की जानकारी मिलती है. मिनहाज ने अपनी इस कृति को ग़ुलाम वंश के शासक नसीरूद्दीन महमूद को समर्पित किया था. उस समय मिनहाज दिल्ली का मुख्य क़ाज़ी था. इस पुस्तक में 'मिनहाजुद्दीन सिराज' ने नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में भी बताया है कि खिलजी और उसकी तुर्की सेना नें हजारों भिक्षुओं और विद्वानों को जला कर मार दिया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि बौद्ध धर्म का विस्तार हो. वह इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करना चाहता था. नालंदा की लाइब्रेरी में उसने आग लगवा दी, सारी पांडुलिपियों को जला दिया और कई महीनों तक आग जलती रही.

नालंदा विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य


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- नालंदा शब्द संस्कृत के तीन शब्द ‘ना +आलम +दा’ से बना है. इसका अर्थ ‘ज्ञान रूपी उपहार पर कोई प्रतिबंध न रखना’ से है.

- नालंदा की लाइब्रेरी में तकरीबन 90 लाख पांडुलिपियां और हजारों किताबें रखी हुई थी.

- नालंदा विश्वविद्यालय को दूसरा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय माना जाता है, तक्षशिला के बाद. क्या आप जानते हैं कि ये 800 साल तक अस्तित्व में रही.

- नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास चीन के ह्वेनसांग और इत्सिंग ने खोजा था. ये दोनों 7वीं शताब्दी में भारत आए थे. इन्होनें इसे दुनिया का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय भी बताया था.

- इस विश्वविद्यालय में चयन मेरिट के आधार पर होता था और निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी. साथ ही उनका रहना और खाना भी पूरी तरह निःशुल्क होता था.

- इस विश्वविद्यालय में तकरीबन 10,000  विद्यार्थी और 2000 अध्यापक थे.

- इस विश्वविद्यालय में भारत ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, ईरान, ग्रीस, मंगोलिया आदि अन्य देशो के छात्र पढ़ने के लिए आते थे.

- नालंदा में ऐसी कई मुद्राएं मिली हैं जिससे ज्ञात होता है कि इसकी स्थापना पांचवी शताब्दी में गुप्त वंश के शासक कुमारगुप्त ने की थी.

- इस विश्वविद्यालय को बनाने का उद्देश्य ध्यान और आध्यात्म के लिए स्थान को बनाने से था और ऐसा कहा जाता है कि गौतम बुद्ध खुद कई बार यहां आए और रुके भी थे.

- नालंदा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी 9 मंजिल की थी और इसके तीन भाग थे: रत्नरंजक, रत्नोदधि और रत्नसागर. क्या आप जानते हैं कि इसमें ‘धर्म गूंज’ नाम की लाइब्रेरी भी थी.

- इस विश्वविद्यालय में हषवर्धन, धर्मपाल, वसुबन्धु, धर्मकीर्ति, आर्यवेद, नागार्जुन आदि कई अन्य विद्वानों ने पढ़ाई की थी.

- उस समय यहां लिटरेचर, एस्ट्रोलॉजी, साइकोलॉजी, लॉ, एस्ट्रोनॉमी, साइंस, वारफेयर, इतिहास, मैथ्स, आर्किटेक्टर, भाषा विज्ञानं, इकोनॉमिक, मेडिसिन आदि कई विषय पढ़ाएं जाते थे.

- सबसे ख़ास बात इस विश्वविद्यालय की यह थी कि कोई भी फैसला सबकी सहमती से लिया जाता था यानी अध्यापकों के साथ छात्र भी अपनी राए देते थे. यानी यहां पर लोकतांत्रिक प्रणाली थी.

- नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष 1.5 लाख वर्ग फीट में मिले हैं. ऐसा माना जाता है कि ये इस विश्वविद्यालय का सिर्फ 10% ही हिस्सा है.

अर्थात ऐसा कहना गलत नहीं होगा की नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का दूसरा सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है जिसे इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नष्ट कर दिया था.

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