भारत के बाढ़ प्रवण क्षेत्र: शमन और नियंत्रण के उपाय

बाढ़ नदी के तटीय क्षेत्र में उच्च जल स्तर की स्थिति है जो स्थलों पर बाढ़ का कारण बनती है इस दौरान भूमि भी जलमग्न हो जाती है। नदी बाढ़ और तटीय क्षेत्र बाढ़ के लिए सबसे अधिक संवेदनशील हैं; हालांकि, असामान्य रूप से लंबे समय तक भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में बाढ़ आना संभव है। बांग्लादेश दुनिया में सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र है। मानसून के मौसम की व्यापकता के कारण बांग्लादेश में भारी वर्षा होती है।

बाढ़ आना राष्ट्र की सबसे आम प्राकृतिक आपादा है। भारत विश्व का दूसरा बाढ़ प्रभावित देश है। बाढ़ एक ऐसी स्थिति है जिसमें कोई निश्चित भूक्षेत्र अस्थायी रूप से जलमग्न हो जाता है और जन-जीवन प्रभावित हो जाता है। बाँध टूटना, जलतरंगों की गति बढ़ना, मानसून की अधिकता आदि।

भारत के बाढ़ प्रवण क्षेत्र

भारत में प्रमुख बाढ़ प्रवण क्षेत्र हैं पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तर बिहार और पश्चिम बंगाल, ब्रह्मपुत्र घाटी, तटीय आंध्र प्रदेश और उड़ीसा, और दक्षिणी गुजरात सहित गंगा के अधिकांश मैदानी क्षेत्र। अभी कुछ दिनों पहले केरल और तमिलनाडु भी बाढ़ के प्रकोप से वंचित नहीं रह पाया। सितंबर 2014 में, कश्मीर क्षेत्र में भारतीय जम्मू और कश्मीर में मूसलाधार वर्षा के कारण उसके अधिकांश जिलों में विनाशकारी बाढ़ देखी गई। जून 2013 में, उत्तर भारतीय राज्य उत्तराखंड पर केंद्रित एक बहु-दिवसीय बादल फटने से भयंकर बाढ़ और भूस्खलन हुआ।

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बाढ़ के कारण

भारत में बाढ़ के प्रमुख कारणों पर नीचे चर्चा की गई है:

1. मौसम संबंधी कारक: भारी वर्षा; ऊष्णकटिबंधी चक्रवात; बादल फटना।

2. भौतिक कारक: नदियों के बड़े कैचमेंट क्षेत्र; अपर्याप्त जल निकासी व्यवस्था।

3. मानव कारक: वनों की कटाई; गाद; दोषपूर्ण कृषि अभ्यास; बांधों का टूटना; त्वरित शहरीकरण।

बाढ़ के प्रभाव

1. कृषि भूमि पर बाढ़ आना और मानव बस्ती बस्तियों की वृद्धि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और समाज पर गंभीर असर पड़ता है।

2. बाढ़ हर साल न केवल मूल्यवान फसलों को नष्ट करती है, बल्कि ये सड़क, रेल, पुल और मानव बस्तियों जैसे भौतिक बुनियादी ढांचे को भी नुकसान पहुंचाती है।

3. लाखों लोग बाढ़ आने से बेघर हो जाते हैं और मवेशियों पर भी असर पड़ता है क्योंकी वो भी बाढ़ में बह जाते हैं।

4. बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में हैजा, आंत्रशोथ, हेपेटाइटिस और अन्य जलजनित रोगों का प्रसार होने लगता है।

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बाढ़ शमन और नियंत्रण के उपाय

उपग्रह और रिमोट-सेंसिंग उपकरण जैसी प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ, जल स्तर बढ़ने पर बाढ़ की लहरों को ट्रैक किया जा सकता है। उपयुक्त निगरानी और चेतावनी के साथ निकासी संभव है। केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी), सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग और जल संसाधन विभाग द्वारा चेतावनी जारी की जाती है। भारत सरकार एवं राज्य सरकारें बाढ़ की आपदा को कम-से-कम करने के लिये योजना काल से ही प्रयत्नशील हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में अलग से धन की व्यवस्था की जाती रही है। इस दिशा में किये गये प्रयासों पर नीचे चर्चा की गयी है:

1. बाढ़ प्रवण क्षेत्रों का मानचित्रण: बाढ़ के खतरे की मैपिंग बाढ़ के दौरान जल प्रवाह का उचित संकेत देने पर खतरों के लिया तैयारी करने का मौका मिल जायेगा।

2. भूमि उपयोग नियंत्रण: यह जीवन और संपत्ति के खतरे को कम कर सकता है। उन क्षेत्रों में किसी भी बड़े विकास की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए जो उच्च बाढ़ के अधीन हैं।

3. बाढ़ नियंत्रण: इसका उद्देश्य बाढ़ से होने वाली क्षति को कम करना है। यह पुनर्वितरण की सहायता से रन-ऑफ की मात्रा को कम करके किया जा सकता है। बाढ़ के फैलाव में लेवेस, तटबंध, बांध और चैनल सुधार शामिल हैं। बांध पानी को स्टोर कर सकते हैं और एक प्रबंधनीय दर पर पानी छोड़ सकते हैं। लेकिन भूकंपों में बांधों की विफलता और पानी छोड़ने के संचालन से निचले इलाकों में बाढ़ आ सकती है।

4. फ्लड प्रूफिंग: यह क्षति के जोखिम को कम करता है। उपायों में बाढ़ के पानी को दूर रखने के लिए रेत के थैलों का उपयोग, घरों के दरवाजों और खिड़कियों को बंद करना या सील करना आदि शामिल हैं। मूल ड्रेनेज सिस्टम की बहाली आमतौर पर सड़कों, नहरों के रेलवे ट्रैक आदि के निर्माण से प्रभावित होती है। जल निकासी प्रणाली का मूल स्वरूप बहाल किया जाना बेहद जरुरी है।

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भारत में बाढ़-नियंत्रण हेतु किये गये उपाय

1. राष्ट्रीय बाढ़-प्रबंधन कार्यक्रम: भारत सरकार ने सन 1954 की भीषण बाढ़ के बाद एक राष्ट्रीय बाढ़-प्रबंधन कार्यक्रम की घोषणा की थी जो तीन चरणों में विभाजित किया गया है, (1) तात्कालिक, (2) अल्पकालिक एवं (3) दीर्घकालिक। तात्कालिक बाढ़ प्रबंधन, बाढ़ से सम्बंधित आँकड़ों के संकलन तथा आपातकालीन बाढ़ सुरक्षा उपायों तक सीमित है। अल्पकालिक चरण में कुछ चुने हुए क्षेत्रों में नदियों के किनारे तटबंधों का निर्माण किया जाता है, जबकि, दीर्घकालिक चरण में वर्षा के पानी का भंडारण; नदियों, सहायक नदियों पर जलाशयों के निर्माण कार्य आदि किये जाते हैं।

2. समुद्री क्षेत्रों में बाढ़-नियंत्रण: भारत का तटीय मैदान की लंबाई करीब 6100 कि.मी. है। इन्हे पश्चिमी तथा पूर्वी तटीय मैदानों में विभाजित किया जाता है। समुद्री तटों पर क्षरण को रोकने की कई परियोजनाएँ प्रारम्भ की गयी हैं। समुद्री क्षेत्रों में बाढ़-नियंत्रण के लिए लम्बी सामुद्रिक दीवार बनायीं गयीं है तथा समुद्री तट को सामुद्रिक क्षरण से रोकने हेतु बचाव कार्य किये जा रहे हैं।

3. बाढ़ का पूर्वानुमान एवं चेतावनी: बाढ़ प्रबंध हेतु पूर्वानुमान लगाना और पहले से चेतावनी देना महत्त्वपूर्ण तथा किफायती उपायों में से एक है। भारत में इसकी शुरआत सन 1959 में से ही किया जा रहा है। केन्द्रीय जल आयोग ने भारत की अधिकांश अन्तरराज्यीय नदियों पर कई बाढ़ पूर्वानुमान तथा चेतावनी केन्द्र स्थापित किये हैं। इस समय 157 बाढ़ पूर्वानुमान केन्द्र कार्यरत हैं, जो देश की 72 नदी बेसिनों में हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 5,500 बाढ़ सम्बंधी पूर्वानुमान जारी किये जाते हैं। इनमें से 95 प्रतिशत अनुमान शुद्धता की स्वीकृत सीमान्तर्गत होते हैं।

4. ब्रह्मपुत्र बाढ़-नियंत्रण बोर्ड: भारत का सबसे ज्यादा बाढ़ से प्रभावित होने वाला प्रमुख क्षेत्र ब्रह्मपुत्र और बारक नदी घाटी है। इस क्षेत्र में बाढ-नियंत्रण के लिए सरकार ने संसद के एक अधिनियम द्वारा सन 1980 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड गठित किया है।

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