प्राचीन काल में सोने और चांदी के सिक्कों को क्यों बनाया जाता था?

प्राचीन काल से ही सोने और चांदी के सिक्कों का चलन रहा है. इनकों मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था. राजा, महाराजाओं के समय में इसका उपयोग ज्यादा होता था. परन्तु क्या आपने कभी सोचा है कि सोने और चांदी को ही क्यों मुद्रा के रूप में चुना गया. क्या कारण है इसके पीछे. आइये इस लेख के माध्यम से कुछ शोधकर्ताओं द्वारा दी गई शोध के आधार पर अध्ययन करते हैं.

सिक्का लगभग 3000 वर्षों तक हमारे इतिहास का हिस्सा रहा है, जो रासायनिक प्रौद्योगिकी में विकास में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करता है. विश्लेषणात्मक रसायन शास्त्र के आधार पर बताया जा सकता है कि आखिर क्यों और कैसे सोने और चांदी के सिक्कों का बनना शुरू हुआ.

आइये शोधकर्ताओं के आधार पर सोने और चांदी के सिक्के के चलन के बारे में अध्ययन करते हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के इनऑर्गनिक केमिस्ट्री के प्रोफेसर आंद्रिया ने इसको पीरियोडिक टेबल या आवर्त सारणी के आधार पर बताया है. परन्तु क्या आप जानते हैं कि आवर्त सारणी क्या होती है.

ये रासायनिक तत्वों को उनकी संगत विशेषताओं के साथ एक सारणी के रूप में दर्शाने की एक व्यवस्था है. आवर्त सारणी में रासायनिक तत्त्व परमाणु क्रमांक के बढ़ते क्रम में सजाये गये हैं तथा आवर्त, प्राथमिक समूह, द्वितीयक समूह में वर्गीकृत किया गया है. वर्तमान आवर्त सारणी में 118 ज्ञात तत्व सम्मिलित हैं. सबसे पहले रूसी रसायन-शास्त्री मेंडलीफ ने सन 1869 में आवर्त नियम प्रस्तुत किया और तत्वों को एक सारणी के रूप में बताया.

अब आंद्रिया का कहना है कि अगर हम पीरियोडिक टेबल को अंत में दाहिने हाथ की तरफ देखते हैं तो ये रसायनिक तत्व चमकीले होते हैं और इनको नीले रंग के घेरे में रखा गया है. ये रसायनिक रूप से स्थिर तत्व होते हैं. इनमें कोई परिवर्तन नहीं आता है यानी इनमें कोई बदलाव नहीं होता है. यही इनकी खासियत भी होती है. लेकिन ये नोबल गैस समूह के भी होते है. क्या आप जानते हैं कि ये गैस गंधहीन और रंगहीन होती हैं. इनकी रसायनिक प्रतिक्रिया की क्षमता भी कम होती है.

हम आपको बता दें कि ग्रुप ज़ीरो के सभी तत्व नोबल गैस कहलाते हैं. सूची में हीलियम, नियॉन, आर्गन, क्रिप्टन, जेनोन  और रेडॉन शामिल हैं. इसी वजह से इनको मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करना कठिन है. इनसे बने सिक्कों को जेब, पर्स इत्यादि में नहीं रखा जा सकता है, ऐसी मुद्रा को एक जगह से दूसरी जगह भी नहीं ले जाया जा सकता है क्योंकि ये रंगहीन होते हैं, पहचानना भी आसान नहीं होता है और अगर ये हवा के संपर्क में आजाएं तो विलुप्त हो जाएंगे.

मरकरी और ब्रोमिन धातु के भी सिक्के नहीं बन सकते थे. आइये कारण देखते हैं: मरकरी और ब्रोमिन लिक्विड स्टेट में हैं और जहरीले होते हैं. क्या आप जानते हैं कि सभी मेटालोइड्स या तो लिक्विड, मुलायम होते हैं या फिर जहरीले होते हैं. देखा जाए तो अगर पीरियोडिक टेबल से गैस, लिक्विड और जहरीले रसायनिक तत्वों को हटा दिया जाए तो अधुरा दिखेगा.

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अगर हम बात करें नॉन-मेटल या फिर गैर धातु के तत्वों कि जो पीरियोडिक टेबल में गैस और लिक्विड तत्वों के आसपास होते हैं. इनकी विशेषता होती है कि इनको ना तो फहलाया जा सकता है और ना सिक्के का रूप दिया जा सकता है. ये और दुसरे धातु या मेटल की तरह मुलायम भी नहीं होते है इसलिए कोई आकार देना कठिन होता है या सिक्के का रूप नहीं दिया जा सकता है. इसलिए इनकी मुद्रा नहीं बन पाई.

पीरियोडिक टेबल में कुछ ऐसे भी तत्व थे जिन्हें सिक्के या मुद्रा के रूप में बनाया जा सकता है परन्तु इनकी रसायनिक प्रतिक्रिया करने की क्षमता बहुत ज्यादा होती है. इन रसायनिक तत्वों को मेटल कहते हैं. जैसे की लिथियम मेटल इतने प्रतिक्रियाशील होते हैं कि जैसे ही हवा के संपर्क में आते हैं तो प्रतिक्रिया करते हैं और आग लग सकती है. इसलिए इनसे भी सिक्के नहीं बन सकते थे.

अब अगर बात करें एल्कलाइन यानी क्षारीय तत्व की तो ये आसानी से कहीं भी पाए जा सकते हैं. अगर इनसे मुद्रा को बनाया जाए तो कोई भी इसे तैयार कर सकता है. साथ ही रेडियोएक्टिव तत्वों को भी सिक्के के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. लोहे के सिक्के बनाना आसान था परन्तु ये इतनी मात्रा में पाए जाते हैं कि कोई भी इनकों बना सकता है. इसलिए इसका भी चलन नहीं हुआ.

अब अंत में पांच तत्व बचते हैं जो आसानी से मिलते भी नहीं हैं वे हैं: सोना, प्लैटिनम, रेडियम और प्लेडियम. ये सभी तत्व कीमती होते हैं. इन सभी में रेडियम और प्लेडियम को मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था लेकिन इनकी खोज उन्नीसवीं शताब्दी में की गई थी, जिसके कारण प्राचीन काल में इनका इस्तेमाल नहीं किया गया था. प्राचीन काल में सोना और चांदी आसानी से मिल जाते थे. इसलिए इनका सिक्कों के रूप में इस्तेमाल किया गया.

सोने और चांदी के सिक्के की भारत में कबसे शुरुआत हुई?

6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्राचीन भारत में सिरका में सिक्कों की सबसे पहली शुरुआत हुई थी. उस समय से, सिक्के को पैसे का सबसे सार्वभौमिक अवतार माना जाने लगा था. सबसे पहले सिक्के इलेक्ट्रम (electrum) से बने होते थे, जो सोने और चांदी के स्वाभाविक रूप से होने वाले पीले रंग का मिश्रण थे जिसे चांदी और तांबा के साथ फिर से मिश्रित करके बनाया जाता था.

हम आपको बता दें कि प्राचीन भारतीय, चीनी और लिडियंस (मध्य पूर्व से) के साथ दुनिया में सिक्के के सबसे शुरुआती जारीकर्ता थे. पहले भारतीय सिक्कों को चिह्नित किया गया जिन्हें पुरानाज (Puranas), करशपानास (Karshapanas) या पाना (Pana) कहा गया. इन सिक्कों को 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व प्राचीन भारत के महाजनपद (गणराज्य साम्राज्यों) द्वारा खनन किया गया था. इनमें गंधरा, कुंताला, कुरु, पंचला, शाक्य, सुरसेना और सौराष्ट्र शामिल थे.

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क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे पुराना कुशान सिक्का आमतौर पर विमा कैडफीस (Vima Kadphises) के समय पर बनाया गया था. कुशान के सिक्कों में आमतौर पर ग्रीक, मेसोपोटामियन, ज़ोरस्ट्रियन और भारतीय पौराणिक कथाओं से खींचे गए प्रतीकात्मक रूपों को चित्रित किया गया है. इनमें शिव, बुद्ध और कार्तिकेय प्रमुख भारतीय देवताओं को भी चित्रित किया गया था.

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रसायनिक आधार पर सिक्कों का विश्लेष्ण

जैसा की हम जानते हैं कि 700 ईसा पूर्व के मध्य पूर्व में दिखाई देने वाले पहले धातु के सिक्के सोने और चांदी से बने थे. इन दो धातुओं को एक समय में सुलभ किया गया था जब बाइनरी धातु यौगिकों से धातु निष्कर्षण की रसायन शास्त्र और तकनीक अज्ञात थी. ऐसा भी देखा गया की प्राचीन काल में सोने के सिक्कों को जब शोध के लिए चुना गया तो ये बिलकुल वैसे ही थे जैसे प्राचीन समय में थे. उन पर वायुमंडल का या किसी भी प्रकार का कोई असर नहीं हुआ था. सदियों से, आधार धातु Fe, Cu, Ni, Zn, Al, Sn और Pb को मामूली मिश्र धातु घटकों या सिक्कों में प्रमुख घटक के रूप में उपयोग किया गया है. ब्रिटिश के समय के दौरान सोने को आमतौर पर कठोर परिधान मिश्र धातु देने के लिए तांबा के साथ मिश्रित किया जाने लगा था. प्लैटिनम ने सिक्का धातु के रूप में केवल एक संक्षिप्त उपस्थिति बनाई. रूस में कुछ उच्च मूल्य वाले सिक्कों को 19वीं शताब्दी के मध्य में बनाया गया, जब प्लैटिनम उरल पहाड़ों में पाया गया था.

चूंकि रासायनिक और तकनीकी ज्ञान में सुधार हुआ, इसलिए सिक्कों की स्थायित्व मांग बढ़ी. आधुनिक समय में सिक्का उत्पादन में उपयोग की जाने वाली धातु और मिश्र धातु का अत्यंत शुद्ध होना अनिवार्य था. कार्बन, सल्फर या फॉस्फरस जैसे गैर-धातुओं के बहुत छोटे निशान सिक्कों में होने के कारण सिक्के जल्दी टूट सकते थे जिन्हें आधुनिक तकनीक सिक्का-स्ट्राइकिंग उपकरणों द्वारा नहीं बनाया जा सकता था चुकी ये उच्च गति और दबाव पर संचालित होते हैं.

पिछले 60 वर्षों में इलेक्ट्रोप्लेटेड लौह और इस्पात के सिक्के कई देशों में दिखाई दिए. ऐसा इसलिए क्योंकि युद्ध के वर्षों के दौरान समृद्ध उपभोक्ताओं के लिए भारी मात्रा में कम मूल्य वाले सिक्के प्रदान करने की मांग बढ़ गई थी और इनको बनाने की लागत कम आती थी. 1992 से ब्रिटिश 'कांस्य' सिक्के copper-plated steel से बनने लगे थे.

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि सोने और चांदी के सिक्कों का चलन प्राचीन काल से था लेकिन उस समय कोई ऐसी तकनीक नहीं थी जिससे कुछ और धातु के सिक्के बनाए जाते. सोना चांदी उस समय आसानी से मिल जाते थे और इनसे बने सिक्के खराब नहीं होते थे इसलिए इनका उपयोग किया जाने लगा था. बाद में नई तकनीक और उपकरणों के आधार पर सिक्कों में मिलावट होना शुरू हुआ. कुछ शोधकर्ताओं ने इसको रसायनिक आधार पर बताया की सोने और चांदी की मुद्रा को इस्तेमाल प्राचीन काल में करना बाकी अन्य तत्वों या धातुओं को छोड़कर एक रसायनिक कारण था भले ही उस समय लोग अनजान थे परन्तु अब ये रसायनिक तौर पर बताया जा सकता है जैसे की उपरोक्त लेख में बताया गया है.

Category: GK Facts (History)

History, Indian History, Ancient History

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