भारत के आर्थिक विकास पर जनसांख्यिकीय लाभांश कैसे प्रभाव डालता है?

तत्कालीन परिपेक्ष में, 'जनसांख्यिकीय लाभांश' नीति निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और दुनिया भर के विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के लिए चर्चा का एक विषय बन गया है। बड़ी संख्या में युवा और कामकाजी उम्र की आबादी के साथ कई देश इस संभावित क्षमता को ले कर आमने सामने हैं। लेकिन लाभांश को हासिल करने के लिए बहुत कुछ किया जाना चाहिए जैसे : लड़कियों और महिलाओं का सशक्तिकरण, सार्वभौमिक और  गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को सुनिश्चित करना जो नए आर्थिक अवसरों के अनुरूप सुरक्षित रोजगार का विस्तार करने में सहायक हों।

जनसांख्यिकीय लाभांश क्या हैं?

जनसांख्यिकीय लाभांश अथवा जनांकिकीय लाभ (Demographic dividend) अर्थव्यवस्था में मानव संसाधन के सकारात्मक और सतत विकास को दर्शाता है। यह जनसंख्या ढाँचे में बढ़ती युवा एवं कार्यशील जनसंख्या (15 वर्ष से 64 वर्ष आयु वर्ग) तथा घटते आश्रितता अनुपात के परिणामस्वरूप उत्पादन में बड़ी मात्रा के सृजन को प्रदर्शित करता है। इस स्थिति में जनसंख्या पिरैमिड उल्टा बनेगा अर्थात इसमें कम जनसंख्या आधार से ऊपर को बड़ी जनसंख्या की ओर बढ़ते हैं।

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जनसांख्यिकीय लाभांश और आर्थिक विकास में संबंध

जनसांख्यिकीय लाभांश आर्थिक विकास पर गहरा प्रभाव डालता है क्योंकि जनसांख्यिकीय लाभांश आर्थिक लाभ है जो तब उत्पन्न होती है जब जनसंख्या में कामकाजी उम्र के लोगों के अपेक्षाकृत बड़ा अनुपात होता है, और प्रभावी ढंग से उनके सशक्तिकरण, शिक्षा और रोजगार में निवेश करता है।

माल्थस के अनुसार जनसंख्या तथा भरण-पोषण के बीच की खाई अधिक चौड़ी होती जाती है और भरण-पोषण के साधनों पर जनसंख्या का भार बढ़ता जाता है। इसके परिणामस्वरूप पूरा समाज अमर तथा गरीब वर्गों में विभाजित हो जाता है और पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित हो जाती है। समृद्ध व धनि लोग, जो उत्पादन प्रणाली के स्वामी होते हैं, लाभ कमाते हैं और धन एकत्रित करते हैं परन्तु जीवन स्तर नीचे गिर जाने के भय से अपनी जनसंख्या में वृद्धि नहीं करते। उपभोग में वृद्धि हो जाने से कुछ वस्तुओं की मांग बढ़ जाती है जिससे उत्पादन में वृद्धि होती है।

माल्थस ने पूंजीवादी समाज तथा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का इस आधार पर समर्थन किया है कि यदि पूँजी निर्धनों में बाँट दी जाए तो यह पूँजी उत्पादन प्रणाली निवेश के लिए उपलब्ध नहीं होगी। इस प्रकार धनी निरंतर धनी होते जाएंगे और निर्धन, जिनमें श्रमिक वर्ग भी सम्मिलित हैं, और निर्धन होते जायेंगे। माल्थस के अनुसार जनसंख्या तथा संसाधनों के बीच अंतर इतना अधिक हो जायेगा कि विपत्ति तथा निर्धनता अवश्यम्भावी हो जायेंगे।

इसलिए, माल्थस के उपरोक्त तर्क के आधार पर, आर्थिक विकास को अपनी आबादी के लिए विविध आर्थिक सामानों की आपूर्ति करने की क्षमता में दीर्घकालिक वृद्धि के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

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भारत के आर्थिक विकास पर जनसांख्यिकीय लाभांश कैसे प्रभाव डालता है?

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, 21 वीं शताब्दी भारत का होगा क्योंकि इसके पास सशक्त लोकतंत्र, 'मांग' और 'जनसांख्यिकीय लाभांश' जैसी तीन संपत्तियां हैं जो विश्व के किसी भी देश के पास नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि किसी भी राष्ट्र की जनसंख्या का अधिक हिस्सा कामकाजी आयु वर्ग का होगा तो उस राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में बचत और निवेश अधिक होगा।

अर्थव्यवस्था को समष्टि आर्थिक चर (Macroeconomic Variable) जैसे रोजगार, प्रति व्यक्ति आय, बचत और निवेश से आर्थिक विकास हो सकता है लेकिन जनसांख्यिकीय लाभांश के साथ आर्थिक विकास हो तो अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

मानव संसाधन को संपत्ति में बदल के लिए श्रम कानूनों के अनुपालन करते हुए कर्मचारियों की उचित भर्ती, चयन, प्रशिक्षण, आकलन प्रदर्शन, क्षतिपूर्ति, संबंध बनाए रखने, और कल्याण, स्वास्थ्य और सुरक्षा उपायों के माध्यम से ही संपत्ति में बदला जा सकता हैं। इसलिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि युवाओं को पर्याप्त रूप से उत्पादक बनाने के लिए कार्यबल में अवशोषित करने की आवश्यकता है ताकि यह जनसांख्यिकीय लाभांश जनसांख्यिकीय दुःस्वप्न में परिवर्तित न हो।

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