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भारत की प्राचीन लिपियों की सूची

लिपि का शाब्दिक अर्थ होता है -लिखित या चित्रित करना। ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, वही लिपि कहलाती है। लिपि मानव के महान् आविष्कारों में से एक है। मानव के विकास में, अर्थात मानव-सभ्यता के विकास में, वाणी के बाद लेखन का ही सबसे अधिक महत्व है। मानव के बोलने की कला, एक दुसरे को समझने की कला तथा लिखने की कला ही मानवों को जानवरों से श्रेष्ठ बना देती है।

भारत की सारी वर्तमान लिपियां (अरबी-फारसी लिपि को छोड़कर) ब्राह्मी से ही विकसित हुई हैं। इतना ही नहीं तिब्बती, सिंहली तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की बहुत-सी लिपियां ब्राह्मी से ही जन्मी हैं। तात्पर्य यही कि धर्म की तरह लिपियां भी देशों और जातियों की सीमाओं को लांघती चली गई।

भारत की प्राचीन लिपियाँ

1. सिंधु लिपि

सिन्धु घाटी की सभ्यता से संबंधित छोटे-छोटे संकेतों के समूह को सिन्धु लिपि कहते हैं। इसे सिन्धु-सरस्वती लिपि और हड़प्पा लिपि भी कहते हैं। कुछ इतिहारकारो का कहना है की यह लिपि ब्रह्मी लिपि का पूर्ववर्ती है। यह लिपि बौस्ट्रोफेडन शैली का एक उदाहरण है क्योंकि यह लिपि दायें से बायें ओर और बायें से दायें  की ओर लिखी जाती थी।

2. ब्राह्मी लिपि

ब्राह्मी एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। देवनागरी सहित अन्य दक्षिण एशियाई, दक्षिण-पूर्व एशियाई, तिब्बती तथा कुछ लोगों के अनुसार कोरियाई लिपि का विकास भी इसी से हुआ था। इस लिपि को पहली बार 1937 में जेम्स प्रिंस ने पढ़ा था। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं।

3. खरोष्ठी लिपि

सिंधु लिपि के बाद यह भारत की प्राचीन लिल्पी में से एक है। यह दाएँ से बाएँ की तरफ लिखी जाती थी। शाहबाजगढ़ी और मनसेहरा के सम्राट अशोक के अभिलेख खरोष्ठी लिपि में है। इसका इस्तेमाल उत्तर-पश्चिमी भारत की गांधार संस्कृति में किया जाता था और इसलिए इसको गांधारी लिपि भी बोला जाता है। इस लिपि के  उदाहरण प्रस्तरशिल्पों, धातुनिर्मित पत्रों, भांडों, सिक्कों, मूर्तियों तथा भूर्जपत्र आदि पर उपलब्ध हुए हैं। खरोष्ठी के प्राचीनतम लेख तक्षशिला और चार (पुष्कलावती) के आसपास से मिले हैं, किंतु इसका मुख्य क्षेत्र उत्तरी पश्चिमी भारत एवं पूर्वी अफगानिस्तान था।

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4. गुप्त लिपि

इस लिपि को ब्राह्मी लिपि भी बोला जाता है। यह गुप्त काल में संस्कृत लिखने के लिए प्रयोग की जाती थी। देवनागरी, गुरुमुखी, तिब्बतन और बंगाली-असमिया लिपि का उद्भव इसी लिपि से हुआ है।

5. शारदा लिपि

यह लिपि पश्चिमी ब्राह्मी लिपि से नौवीं शताब्दी में उत्पन्न हुई थी तथा इसका उपयोग भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी-पश्चिमी भाग में सीमित था। ओझाजी का कहना है की इस लिपि का आरम्भकाल दसवीं शताब्दी में हुआ था। उनका मत है कि नागरी लिपि की तरह शारदा लिपि भी कुटिल लिपि से निकली है। उनके मतानुसार, शारदा लिपि का सबसे पहला लेख सराहा (चंबा, हिमाचल प्रदेश) से प्राप्त प्रशस्ति है और उसका समय दसवीं शताब्दी है। यह कश्मीरी और गुरुमुखी (अब पंजाबी लिखने के लिए प्रयोग किया जाता है) लिपि में विकसित हुआ।

6. नागरी लिपि

इसी लिपि से से ही देवनागरी, नंदिनागरी आदि लिपियों का विकास हुआ है। पहले इसे  प्राकृत और संस्कृत भाषा को लिखने में उपयोग किया जाता था। इसका विकास ब्राह्मी लिपि से हुआ है। अभी कुछ हाल के अनुसन्धानों से पता चला है कि इस लिपि का विकास प्राचीन भारत में पहली से चौथी शताब्दी में गुजरात में हुआ था।

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7. देवनागरी लिपि

यह लिपि की जड़ें प्राचीन ब्राह्मी परिवार में हैं। संस्कृत, पालि, हिन्दी, मराठी, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी, खस, नेपाल भाषा (तथा अन्य नेपाली भाषाय), तामाङ भाषा, गढ़वाली, बोडो, अंगिका, मगही, भोजपुरी, मैथिली, संथाली आदि भाषाएँ देवनागरी में लिखी जाती हैं। यह विश्व की सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाली लिपियों में से एक है।

8. कलिंग लिपि

7वीं से 12वीं शताब्दी के दौरान कलिंग प्रदेश में जिस लिपि का प्रयोग किया गया था उसे कलिंग लिपी बोली जाती है। कलिंग ओडिशा का प्राचीन नाम है और इस लिपि का इस्तेमाल उडिया के प्राचीन रूप को लिखने के लिए किया जाता था।  इस लिपि में भी तीन शैलियाँ देखने को मिलती हैं। शुरुवाती दौर के लेखों में मध्यदेशीय तथा दक्षिणी प्रभाव देखने को मिलता है। अक्षरों के सिरों पर ठोस चौखटे दिखाई देते हैं। आरम्भिक अक्षर समकोणीय हैं। लेकिन बाद में कन्नड़-तेलुगु लिपि के प्रभाव के अंतर्गत अक्षर गोलाकार होते नज़र आते हैं।

11वीं शताब्दी के अभिलेख नागरी लिपि के हैं। पोड़ागढ़ (आन्ध्र प्रदेश) से नल वंश का जो अभिलेख मिला है, उसके अक्षरों के सिरे वर्गाकार हैं। नल वंश का यह एकमात्र उपलब्ध शिलालेख है।

9. ग्रंथ लिपि

यह लिपि दक्षिण भारत की प्राचीन लिपियों में एक है। मलयालम, तुळु व सिंहल लिपि पर इसका प्रभाव रहा है। इस लिपि का एक और संस्करण "पल्लव ग्रंथ", पल्लव लोगों द्वारा प्रयोग किया जाता था, इसलिए इसे  "पल्लव लिपि" भी कहा जाता था। कई दक्षिण भारतीय लिपियाँ, जेसे कि बर्मा की मोन लिपि, इंडोनेशिया की जावाई लिपि और ख्मेर लिपि इसी संस्करण से उपजीं हैं।

10. वट्टेलुतु लिपि

इस लिपि पर ब्राह्मी लिपि का बहुत प्रभाव है और कुछ इतिहासकारों का कहना है की इसका विकास ब्राह्मी लिपि से ही हुयी है। तमिल और मलयालम भाषा को लिखने को लिखने में उपयोग किया जाता था।

11. कदंब लिपि

इसे 'पूर्व-प्राचीन कन्नड लिपि' भी बोला जाता है। इसी लिपि से कन्नड में लेखन का आरम्भ हुआ। यह कलिंग लिपि से बह्त कुछ मिलती-जुलती है। इसका इस्तेमाल संस्कृत, कोंकणी, कन्नड़ और मराठी लिखने के लिए किया जाता था।

12. तामिल लिपि

यह लिपि भारत और श्रीलंका में तमिल भाषा को लिखने में प्रयोग किया जाता था। यह ग्रंथ लिपि और ब्राह्मी के दक्षिणी रूप से विकसित हुआ। यह शब्दावली भाषा है ना की वर्णमाला वाली। इसे बाएं से दाएं लिखा जाता है। सौराष्ट्र, बडगा, इरुला और पनिया आदि जैसी भाषाएँ तमिल में लिखी जातीं हैं।

हम जानते हैं कि लिपियां मानव की ही देन है; उन्हें  ईश्वर या देवता ने नहीं बनाया। प्राचीन काल में किसी पुरातन और कुछ जटिल वस्तु को रहस्यमय बनाए रखने के लिए उस पर ईश्वर या किसी देवता की मुहर लगा दी जाती थी; किंतु आज हम जानते हैं कि लेखन-कला किसी 'ऊपर वाले' की देन नहीं है, बल्कि वह मानव की ही बौद्धिक कृति है।

कुछ  पुरालेखको के अनुसार- सभी भारतीय लिपि ब्राह्मी लिपि से विकसित हुयी है। लिपि के  के तीन मुख्य परिवार हैं:

1. देवनागरी: उत्तरी और पश्चिमी भारत जैसे हिंदी, गुजराती, बंगाली, मराठी, डोगरी, पंजाबी आदि  भाषाओं का आधार है।

2. द्रविड़: तेलुगु और कन्नड़ का आधार है।

3. ग्रंथ, तमिल और मलयालम जैसे द्रविड़ भाषाओं का उपखंड है, लेकिन यह अन्य दो के रूप में महत्वपूर्ण नहीं है।

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