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उत्तर प्रदेश के लोकगीतो की सूची

लोक संगीत किसी भी संस्कृति में आम जनता द्वारा पारंपरिक रूप से प्रचलित गीत-संगीत को बोला जाता है। सामान्यतः यह गाँव-गिरांव में खुद से प्रचलित अज्ञात संगीतकारों या फिर अज्ञात रचनाकार लोगो द्वारा रचित किया हुआ रचना होता है। सामान्य रूप से यह शास्त्रीय संगीत के विपरीत तथा स्वतः उत्पन्न होते है।

उत्तर प्रदेश में लोक संगीत का खजाना है, जिसमें प्रत्येक जिले में अद्वितीय संगीत परंपराएं हैं। इस राज्य को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के 'पुबैया अंग' के गढ़ के रूप में माना जाता है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि लोकगीतों में धरती गाती है, पर्वत गाते हैं, नदियां गाती हैं, फसलें गाती हैं। उत्सव, मेले और अन्य अवसरों पर मधुर कंठों में लोक समूह लोकगीत गाते हैं।

उत्तर प्रदेश के लोकगीत (लोक संगीत)

1. सोहर

इस लोकगीत में जीवन चक्र के प्रदर्शन संदर्भित किया जाता है इसलिए इसे बच्चे के जन्म की ख़ुशी में गया जाता है।

2. कहारवा

यह विवाह समारोह के समय कहर जाति द्वारा गाया जाता है।

3. चानाय्नी

एक प्रकार का नृत्य संगीत।

4. नौका झक्कड़

यह नाई समुदाय में बहुत लोकप्रिय है और नाई लोकगीत के नाम से भी जाना जाता है।

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 5. बनजारा और न्जावा

यह लोक संगीत रात के दौरान तेली समुदाय द्वारा गाया जाता है।

6. कजली या कजरी

यह महिलाओं द्वारा सावन के महीने में गाया जाता है। यह अर्द्ध शास्त्रीय गायन के रूप में भी विकसित हुआ है और इसकी गायन शैली बनारस घराना से मिलती है।

7. जरेवा और सदावजरा सारंगा

इस तरह के लोक संगीत लोक पत्थरों के लिए गाया जाता है।

इन लोक गीतों के अलावा, गज़ल और ठुमरी (अर्द्ध शास्त्रीय संगीत का एक रूप, जो शाही दरबार में बहुत प्रचलित था) अवध क्षेत्र में काफी लोकप्रिय रहा है और जैसे क़व्वाली (सूफी स्वर या  कविता का एक रूप है, जो भजनों से विकसित हुआ है) और मंगलिया। उनमें से दोनों उत्तर प्रदेश के लोक संगीत का एक मजबूत प्रभाव दर्शाते हैं।

जाने शास्त्रीय भाषाओं के रूप में कौन कौन सी भारतीय भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया है

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