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अशोक द्वारा भेजे गए धर्म-प्रचारको की सूची

अशोक 269 ईसा पूर्व के लगभग मौर्य सिहांसन पर आसीन हुआ था। बहुत सारे इतिहासकार उसे प्राचीन विश्व का महानतम सम्राट मानते हैं।  उसकी धम्म नीति विद्वानों के बीच निरंतर चर्चा का विषय रही है। धम्म शब्द संस्कृत के शब्द ‘धर्म’ का प्राकृत रूप है। धम्म को विभिन्य अर्थो जैसे धर्मपरायणता, नैतिक जीवन, सदाचार आदि के रूप में व्याख्यायित किया गया है।

अशोक द्वारा प्रयुक्त धम्म को समझने के लिए उसके अभिलेखों को पढना ज्यादा जरुरी है। यह अभिलेख मुख्य रूप से इसलिए लिखे गए थे की सारे समराज्य में  प्रजा को धम्म के सिद्धांतों के बारे में रूबरू कराया जा सके। इसलिए अधिकांश अभिलेखों में धम्म के विषय में कुछ ना कुछ कहा गया है।

अशोक ने धम्म की जो परिभाषा दी है वह 'राहुलोवादसुत्त' से ली गई है। इस सुत्त को 'गेहविजय' भी कहा गया है अर्थात् 'ग्रहस्थों के लिए अनुशासन ग्रंथ'। उपासक के लिए परम उद्देश्य स्वर्ग प्राप्त करना था न कि निर्वाण।

प्रमुख एवं लघु शिलालेखों तथा स्तंभलेखों की सूची

अशोक के आदर्श का स्रोत उसका धम्म था क्योंकि वह सोचता है की धम्म अपने सार्वभौमिक आयाम के साथ कुछ नैतिक सिद्धांतों और मानवीय आदर्शों का एक संहिता है। इसलिए, वह समाज के विभिन्न संप्रदायों और वर्गों को एकजुट करने और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और सार्वभौमिक भाईचारे के विचारों को बढ़ावा देने के लिए धम्म की अवधारणा को फैलाना चाहता था। धम्म और बुद्ध की शिक्षाओं को प्रचारित करने के लिए, उसने नौ धर्म-प्रचारकों को देश-विदेश भेजे था। प्रत्येक धर्म-प्रचारकों में पांच सिद्धांत शामिल थे ताकि उपसमपदा और आदेश समारोह किया जा सके।

अशोक द्वारा भेजे गए धर्म-प्रचारक

धर्म-प्रचारक

देश का नाम

मज्झंतिका या मह्यांतिका

कश्मीर और गांधार

महादेव थेरा

महिस्मंडला (मैसूर)

रक्खिता  थेरा

वानावसी (उत्तरी कानारा, दक्षिण भारत)

योना धम्मारक्खिता

अपरंताका (उत्तरी गुजरात कथियावार, कच्छ और सिंध)

महाधम्मारक्खिता

महाराथा (महाराष्ट्र)

महारक्खिता

योना (ग्रीस)

मज्झिम

हिमावंत (हिमालयी क्षेत्र)

सोना और उत्तरा

सुवर्णभूमि (म्यांमार / थाईलैंड)

महिंद्र और संघमित्रा

लक्षद्वीप और श्रीलंका

अशोक के धर्म प्रचारकों में सबसे अधिक सफलता उसके पुत्र महेन्द्र को मिली। महेन्द्र ने श्रीलंका के राजा तिस्स को बौद्ध धर्म में दीक्षित किया, और तिस्स ने बौद्ध धर्म को अपना राजधर्म बना लिया और अशोक से प्रेरित होकर उसने स्वयं को 'देवनामप्रिय' की उपाधि दी।

बुद्ध की विभिन्न मुद्राएं एवं हस्त संकेत और उनके अर्थ

बौद्ध अनुश्रुतियों और अशोक के अभिलेखों से यह सिद्ध नहीं होता कि सम्राट अशोक ने किसी राजनीतिक उद्देश्य से धम्म का प्रचार किया था। तेरहवें शिलालेख और लघु शिलालेख से ज्ञात होता है कि अशोक धर्म परिवर्तन का कलिंग युद्ध से निकट सम्बन्ध था। रोमिला थापर के अनुसार, धम्म कल्पना अशोक की निजी कल्पना थी, किन्तु अशोक के शिलालेखों में धम्म की जो बातें दी गई हैं, उनसे स्पष्ट है कि वे पूर्ण रूप से बौद्ध ग्रंथों से ली गई हैं।

अशोक ने अपनी धम्म की नीति के अंतर्गत अहिंसा, सहिष्णुता, तथा सामाजिक दायित्व का उपदेश देना चाहता था। उसने इन सिद्धांतों का पालन अपने प्रशासनिक नीति में भी किया। धम्म एवं बौद्ध मत को एकरूपी नहीं मानना चाहिए। धम्म विभिन्य धार्मिक  परम्पराओं से लिए गए सिद्धांतों का मिश्रण था। इसका क्रियान्वयन साम्राज्य को एकसूत्र में बांधने के उद्धेश्य से किया गया था।

सम्राट अशोक के नौ अज्ञात पुरुषों के पीछे का रहस्य

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