हाइपरलूप क्या है और यह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

अमेरिका के लास वेगास में वर्जिन हाइपरलूप का सफल यात्री परिक्षण किया गया. वर्जिन हाइपरलूप को रिचर्ड ब्रान्सन की कंपनी वर्जिन ग्रुप ने विकसित किया था. इस तकनीक का सफलता पूर्ण परिक्षण करने वाली यह दुनिया की पहली कंपनी बन गई है. 

हाइपरलूप एक ऐसी तकनीक है जिसकी मदद से दुनिया में कहीं भी लोगों को या वस्तुओं को तीव्रता के साथ सुरक्षित एवं कुशलतापूर्वक स्थानांतरित किया जा सकेगा और इससे पर्यावरण पर भी न्यूनतम प्रभाव पड़ेगा. एलन मस्क ने हाइपरलूप तकनीक का पहली बार विचार 2012 या 2013 में रखा था. इस तकनीक के माध्यम से लगभग 1000 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से पॉड दौड़ सकेगी. अगर यह हाइपरलूप तकनीक भारत में आजाती है, तो संभवतः मुम्बई से पुणे के बीच की दूरी को 25 मिनट के समय में तय किया जा सकेगा जिसमें पहले 2.5 घंटे का समय लगता था.
हाइपरलोप में एक 'ट्यूब मॉड्यूलर ट्रांसपोर्ट सिस्टम' है जो कि घर्षण से मुक्त होकर चलेगा. यह सिस्टम एक यात्री या कार्गो वाहन को एयरलाइन की गति से एक स्तरीय ट्यूब के माध्यम से निकट-वैक्यूम में एक रैखिक विद्युत मोटर का उपयोग करके गति प्रदान करता है.

हाइपरलूप तकनीक कैसे काम करती है?


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- सवारी या समान के परिवहन के लिए लो-प्रेशर ट्यूब और इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन का उपयोग किया जाएगा.

- पैसेंजर कैप्सूल वैक्यूम ट्यूबों की तरह हवा के दवाब से नहीं चलता है, बल्कि यह दो विद्युत चुम्बकीय मोटर द्वारा चलता है. इसकी सहायता से लगभग 760 मील प्रति घंटा की गति से यात्रा की जा सकती है.

- विशेष प्रकार से डिज़ाइन किये गए कैप्सूल या पॉड्स का इस तकनीक में प्रयोग किया जाता है. इनमें यात्रियों को बिठाकर या फिर कार्गो लोड कर के इन कैप्सूल्स या पॉड्स को जमीन के ऊपर पारदर्शी पाइप जो कि काफी बड़े हैं में इलेक्ट्रिकल चुम्बक पर चलाया जाएगा. यहीं आपको बता दें कि चुंबकीय प्रभाव से ये पॉड्स ट्रैक से कुछ ऊपर उठ जाएंगे इसी कारण गति ज्यादा हो जाएगी और घर्षण कम होगा.

-  यात्रियों के पॉड्स को  हाइपरलूप वाहन में एक कम दबाव वाली ट्यूब के अंदर उत्तरोत्तर विद्युत प्रणोदन (Electric Propulsion) के माध्यम से उच्च गति प्रदान की जाती है. जो अल्ट्रा-लो एयरोडायनामिक ड्रैग के परिणामस्वरूप लंबी दूरी तक हवाई जहाज की गति से दौड़ेंगे.

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- ट्यूब की पटरियों में वैक्यूम होता है, लेकिन हवा से पूरी तरह से मुक्त नहीं होता है बल्कि उनके अंदर कम दबाव वाली हवा होती है. एयर ट्यूब के माध्यम से चलने वाली अधिकांश वस्तुओं को नीचे लाने के लिए हवा को संपीड़ित करना पड़ता है, जिससे हवा की एक पतली परत उपलब्ध होती है, जो वस्तु को धीमा कर देती है. लेकिन हाइपरलूप में कैप्सूल के सामने एक कंप्रेसर पंखा होगा, जो हवा को कैप्सूल के पीछले हिस्से में भेजेगा, लेकिन अधिकतर हवा को एयर बायरिंग में भेजेगा.

- एयर बायरिंग में स्की जैसे पैडल होते हैं जो घर्षण को कम करने के लिए ट्यूब की सतह के ऊपर कैप्सूल को हवा में उठाए रहते हैं.

- ट्यूब ट्रैक को इस प्रकार डिजायन किया गया है कि वह मौसमी घटनाओं और भूकंप के लिए प्रतिरोधक का काम करता है. खम्भे ट्यूब को जमीन से ऊपर उठाकर रखते हैं, उनमें एक छोटा सा फुट प्रिंट होता है जो भूकंप के समय में झुक सकता है. ट्यूब के प्रत्येक अनुभाग लचीले ढंग से ट्रेन जहाजों के चारों ओर घूम सकता है, क्योंकि हाइपरलूप में कोई स्थिर ट्रैक नहीं होता है जिस पर कैप्सूल आगे बढ़ सकता है. ट्यूब ट्रैक के ऊपरी भाग में स्थित सोलर पैनल नियमित रूप से मोटर को ऊर्जा की आपूर्ति करता है. एलन मस्क के अनुसार इन नवाचारों और पूरी तरह से स्वचालित प्रस्थान प्रणाली से युक्त हाइपरलूप दुनिया में यात्रा करने का सबसे तेज़, सबसे सुरक्षित और सबसे सुविधाजनक तरीका होगा.

अंत में  हाइपरलूप तकनीक एक नजर में 

 - हाइपरलूप तकनीक में ट्यूब की एक श्रंखला होती है और इसके जरिये बिना किसी फ्रिक्शन या हवा की रुकावट के तेजी से यात्रा करना मुमकिन होगा.

- इसमें विशेष प्रकार से डिज़ाइन किये गए कैप्सूल या पॉड्स का प्रयोग किया जाएगा.

- कैप्सूल्स और पॉड्स को एक पारदर्शी ट्यूब पाइप के अंदर उच्च वेग से संचालित किया जाएगा.

- इस तकनीक में बड़े-बड़े पाइपों के अंदर वैक्यूम तैयार किया जाएगा और वायु की अनुपस्थिति में पोड जैसे वाहन में काफी स्पीड से यात्रा की जा सकेगी. 

- इसमें पॉड्स को जमीन को उपर काफी बड़े पाइपों में इलेक्ट्रिकल चुम्बक पर चलाया जाएगा. इस चुम्बक के प्रभाव से पॉड्स ट्रैक से कुछ उपर उठ जाएँगे इसके कारण गति ज्यादा हो जाएगी और घर्षण कम हो जाएगा.

- इसमें एक मैग्नेटिक ट्रैक होगा जिस पर वैक्यूम को बनाया जाएगा. इससे ट्रेन काफी तेजी से एक जगह से दूसरी जगह जा सकेगी. 

अंत में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस तकनीक से भारत को काफी फायदा होगा. 

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