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रेकॉम्बीनैंट DNA टेक्नोलॉजी क्या है?

जैसा की हम जानते हैं कि डीएनए टेक्नोलॉजी रेगुलेशन बिल को लोकसभा में मंजूरी दे दी गई है. इससे पीड़ितों, अपराधियों वगेरा की पहचान आसानी से की जा सकेगी. आइये इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते हैं कि डीएनए विधेयक क्या है, डीएनए टेक्नोलॉजी क्या होती है, यह तकनीक कैसे काम करती है, इसका निर्माण कैसे हुआ इत्यादि.

आनुवंशिक इंजीनियरिंग एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा वैज्ञानिक एक जीव के जीनोम को संशिधित करते हैं. इसमें रेकॉम्बीनैंट DNA टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाता है. इस तकनीक में आनुवंशिक पदार्थों DNA तथा RNA के रसायन में परिवर्तन कर उसे मेज़बान जीवों (host organism) में प्रवेश कराया जाता है. इससे इनके लक्षणों में परिवर्तन आ जाता है.

इसलिए, मूल रूप से, इस प्रक्रिया में जीनोम में DNA संरचना के एक विदेशी टुकड़े को प्रवेश कराया जाता है जिसमें रुचि के अनुसार हमारे जीन शामिल होते हैं. जिस जीन को प्रवेश कराया जाता है उसको रेकॉम्बीनैंट जीन कहते है और इस तकनीक को रेकॉम्बीनैंट DNA टेक्नोलॉजी कहा जाता है. वैसे मेजबान के जीनोम में वांछित जीन डालना उतना आसान नहीं है जितना की लगता है.

रेकॉम्बीनैंट DNA का निर्माण कैसे हुआ?
- प्रथम रेकॉम्बीनैंट DNA का निर्माण साल्मोनेला टाइफीमूरियम के सहज प्लाज्मिड में प्रतिजैविक प्रतिरोधी कूटलेखन (Antibiotic Resistance Encryption) जीन के जुड़ने से हो सका था. क्या आप जानते हैं की स्टेनले कोहेन और रोबर्ट बोयर ने यह कार्य वर्ष 1972 में प्लाज्मिड से DNA का टुकड़ा काट कर किया था.

- हम आपको बता दें कि आर्थर कोर्नबर्ग ने सर्वप्रथम DNA को अंत: पात्र (In Vitro) में बनाया था.

रेकॉम्बीनैंट  DNA टेक्नोलॉजी के उपकरण

- प्रतिबंधन एंजाइम (Restriction Enzyme) जिसे आणविक कैची भी कहा जाता है - DNA को विशिष्ट जगहों पर काटने में मदद करता है, बहुलक- संश्लेषित करने में मदद करता हैं और लाइगेज (ligases) - प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीन को संवाहक जीन के साथ जोड़ने का कार्य करता है. इस संयोजन से अंत: पात्र (In Vitro) नए गोलाकार स्वत: प्रतिक्रती बनाने वाले DNA का निर्माण होता है जिसे रेकॉम्बीनैंट DNA कहते हैं. ये दो प्रकार के होते हैं: एंडोन्यूक्लियसेस (Endonucleases) और एक्सोन्यूक्लियसेस (Exonucleases). एंडोन्यूक्लियसेस DNA स्ट्रैंड के भीतर ही कटता है जबकि एक्सोन्यूक्लियसेस स्ट्रैंड्स के अंत या आखरी हिस्से से न्यूक्लियोटाइड को हटा देते हैं.

- प्रतिबंधन एंडोन्यूक्लियसेस अनुक्रम-विशिष्ट (sequence-specific) होते हंय जो आमतौर पर पैलिंड्रोम अनुक्रम (palindrome sequences) होते हैं और विशिष्ट बिंदुओं पर DNA को काटते हैं. वे DNA की लंबाई की जांच करते हैं और प्रतिबंधन साइट नामक विशिष्ट साइट पर कटौती करते हैं. यह इस क्रम में चिपचिपा वाले आखरी हिस्से को जन्म देता है. वांछित जीन और वैक्टरों को चिपचिपा जैसा प्राप्त करने के लिए प्रतिबंधन एंजाइमों द्वारा काटा जाता है, इस प्रकार से वेक्टर और जीन को बांधने के लिए लाइगेज का काम आसान हो जाता है.

- वेक्टर - वांछित जीन को ले जाने और एकीकृत करने में मदद करता है.  ये पुनः संयोजन DNA तकनीक के उपकरणों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा हैं क्योंकि वे अंतिम वाहन हैं जो मेजबान जीव में वांछित जीन को आगे ले जाते हैं. प्लास्मिड्स (Plasmids) और बैक्टीरियोफेज (bacteriophages) रेकॉम्बीनैंट DNA तकनीक में सबसे आम वैक्टर हैं जिनका उपयोग बहुत अधिक प्रतिलिपि संख्या के रूप में किया जाता है.

- वेक्टर पुनरावृत्ति  (replication) की उत्पत्ति से बने होते हैं- यह न्यूक्लियोटाइड का एक क्रम है जहां से प्रतिकृति शुरू होती है, एक चुनिंदा मार्कर – वांछित जीन का गठन होता है जो एम्पिसिलिन (ampicillin) जैसे कुछ एंटीबायोटिक्स के प्रतिरोध को दिखाता है; और क्लोनिंग साइट्स - प्रतिबंधन एंजाइमों द्वारा मान्यता प्राप्त साइटें जहां वांछित DNA को प्रवेश कराया जाता हैं.

क्लोनिंग क्या है और कैसे की जाती है?

- मेज़बान जीव (host organism) - जिसमें पुनः संयोजन DNA को प्रवेश किया गया है. मेज़बान जीव पुनः संयोजन DNA तकनीक का अंतिम उपकरण है जो एंजाइमों की सहायता से वांछित DNA के साथ वेक्टर को भी अपने अंदर ले लेता है.

- जब यह DNA ई-कोलाई में स्थानांतरित किया जाता है तो यह परपोषी के DNA पॉलिमरेज एंजाइम का उपयोग कर अनेक प्रतिक्रतियाँ बना लेता है, जिसे ई-कोलाई में प्रतिजैविक प्रतिरोधी जीन को क्लोनिंग कहते हैं.

इस प्रकार जीव के आनुवंशिक रूपांतरण में मूलभूत तीन चरण हैं:


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- वांछित जीन युक्त DNA की पहचान

- चिन्हित DNA का परपोषी में स्थानांतरण

- स्थानांतरित DNA को परपोषी में सुरक्षित रखना तथा उसकी संतति में स्थानांतरित करना.

रेकॉम्बीनैंट DNA टेक्नोलॉजी का उपयोग


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- फसलों के उत्पादन में आनुवंशिक इंजीनियरिंग का उपयोग कर रोग एवं कीटों के प्रति प्रतिरोधी फसलों को प्राप्त किया जा सकता है. इस प्रकार से कठोर जलवायु के प्रति इनमें अनुकूलन पैदा कर फसल उत्पादन में व्रद्धि की जा सकती है. इस तकनीक के द्वारा खाद्य पदार्थों के पोषण में अभिव्रद्धि हो सकती है.

- इस तकनीक के इस्तेमाल से Bt Cotton का निर्माण किया जा सकता है जिससे पौदों की रक्षा कीटों या बॉल वर्म्स (ball worms) से की जा सकती है.

- इस तकनीक द्वारा न केवल जीनों के स्वरूपों में संशोधन करके जीवों के आकार एवं गुणों में परिवर्तन किया जा सकता है, बल्कि इससे एकदम नए जीव का निर्माण भी संभव है.

- इस तकनीक द्वारा मनुष्य के आनुवंशिक रोगों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकता है. आगर समस्या उत्पन्न करने वाले जीन का सटीक पता प्राप्त हो जाए तो उसे DNA या संभव हो तो जीनपूल (Gene Pool) से दूर किया जा सकता है.

- आनुवंशिक इंजीनियरिंग का प्रयोग पशुपालन में करके विभिन्न प्रकार की उन्नत किस्में एवं वांछित गुणों को प्राप्त किया जा सकता है और कई रोगों को भी दूर किया जा सकता है.

- दवाओं में इस तकनीक का उपयोग कर DNA रेकॉम्बीनैंट टेक्नोलॉजी द्वारा इंसुलिन का उत्पादन किया जा सकता है.

- इस तकनीक का प्रयोग क्लिनिकल निदान में भी होता है जिसका ELISA एक उदाहरण है जहां पुनः संयोजन DNA तकनीक का उपयोग होता है. इसका उपयोग किसी व्यक्ति में HIV की उपस्थिति का पता लगाने के लिए किया जाता है.

डीएनए टेक्नोलॉजी रेगुलेशन बिल क्या है?

इस बिल में लंबे समय से संदिग्ध अपराधियों और लापता लोगों की पहचान सुनिश्चित करने के लिए डीएनए लाबोरेटरी बैंक स्थापित करने के साथ डीएनए डेटा बैंक को भी स्थापित करने का ज़िक्र है. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि इस बिल में कुछ लोगों की पहचान स्थापित करने हेतु डीएनए टेक्नोलॉजी के प्रयोग के रेगुलेशन और डीएनए रेगुलेटरी बोर्ड की स्थापना का प्रावधान है जोकि डीएनए डेटा बैंक और डीएनए लेबोरेट्रीज़ को सुपरवाइज करेगा.
इस बिल के अंतर्गत डीएनए टेस्टिंग की अनुमति केवल बिल की अनुसूची में उल्लिखित मामलों के लिए दी जाएगी जैसे भारतीय दंड संहिता, 1860 के अंतर्गत अपराधों, पेटरनिटी से संबंधित मुकदमों या असहाय बच्चों की पहचान के लिए. इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह तकनीक संदिग्ध अपराधियों और लापता लोगों की पहचान करने में काफी उपयोगी है.
कई अपराधों को सुलझाने के लिए फोरेंसिक टेक्नोलॉजी का प्रयोग डीएनए के आधारित किया जा सकता है. यह तकनीक लापता लोगों, बिना पहचान वाले मृतकों, बड़ी संख्या में हुई मृतकों की पहचान में भी काफी उपयोगी होगी. यहीं आपको बता दें की इस तकनीक का प्रयोग सिविल केस सुलझाने के लिए भी किया जा सकता है जिनमें बच्चे के जैविक माता-पिता की पहचान, इमीग्रेशन केस और मानव अंगों के ट्रांसप्लांट इत्यादि भी शामिल हैं. इस तकनीक की जरूरत मुख्य तौर पर इसलिए है क्योंकि डीएनए डाटा बैंक नहीं है. डीएनए प्रोफाइलिंग के लगभग 3000 केस हैं और डीएनए डाटा बैंक लेबोरेटरी न होने के कारण इन्हें स्टोर करने की कोई सुविधा नहीं है. बिल के अंतर्गत डीएनए रेगुलेटरी बोर्ड से यह सुनिश्चित करने की अपेक्षा की जाती है कि डीएनए बैंकों, लेबोरेट्रीज़ और अन्य व्यक्तियों के डीएनए प्रोफाइल्स से संबंधित सूचनाओं को गोपनीय रखा जाएगा.

तो हमने देखा कि जैव प्रौद्योगिकी में ऐसी तकनीकें शामिल हैं जिनमें आनुवंशिक रूप से रूपांतरित सूक्ष्मजीवों, कवक, पौधों व जंतुओं या उनसे प्राप्त एंजाइमों का उपयोग करते हुए मनुष्य हेतु जैव प्रौद्योगिकी एवं जैविक पदार्थों का विकास किया जाता है और इसी तकनीक में रेकॉम्बीनैंट DNA टेक्नोलॉजी शामिल हैं. साथ ही आपको ज्ञात हो गया होगा की डीएनए टेक्नोलॉजी रेगुलेशन बिल 2018 क्या है.

डीएनए और आरएनए के बीच क्या अंतर है?

क्या आप जानते हैं कि किन मानव अंगों को दान किया जा सकता है

डीएनए रेगुलेटरी बोर्ड की स्थापना का
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