जानें कान में पाए जाने वाले वैक्स के बारे में

कान से निकलने वाला वैक्स बहुत ही उपयोगी पदार्थ है जो कि हमारे कान को स्वस्थ रखने में मदद करता है. इंसानों में ही नहीं बल्कि जानवरों में भी ये वैक्स पाया जाता है. यह कानों को साफ और चिकना करने में भी मदद करता है. आइये इस लेख के माध्यम से अध्ययन करते है कि कान में वैक्स क्यों होता है, इसका क्या कार्य होता है आदि.
कान में वैक्स के बारें में महत्वपूर्ण तथ्य
1. कान के वैक्स का वैज्ञानिक नाम सेरुमेन (cerumen) है. ये हमारे कान की नली के बाहरी हिस्से में बनता है जहाँ हजारों ग्रंथियां होती है. इस वैक्स से जो तेल निकलता है वो कान को तैलीय रखता है.
2. ये वैक्स कान में धूल, मिट्टी और कीड़ों को घुसने से भी रोकता है.
3. ये एंटीबायोटिक का भी कार्य करता है यानी इसमें माइक्रोबियल विरोधी गुण होते हैं. कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक, सेरुमेन में एक lysozyme जीवाणुरोधी एंजाइम होता है जो कि बैक्टीरिया की सेल की दीवारों को
नष्ट करने में सक्षम होता है.
4. कान के वैक्स की मदद से आप बता सकते है कि आप किस परिवार से हैं. लोगों में गीला या सूखा वैक्स पाया जाता है. हालांकि दोनों वैक्स रसायनों से बने होते है. परन्तु ये खानदान पर निर्भर करता है कि आपके कान में वैक्स गीला होगा या सूखा. इसको पता लगाने का काम जीन का होता है. इस जीन को ABCC11 कहते हैं. अगर जीन में A के बजाय G है तो कान का वैक्स सूखा होगा और इसकी गंध भी अलग होगी.

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5. आदि-मानव के प्रवास का किस्सा भी कानों में पाया जाने वाला गीला या सूखा वैक्स बताता है. जैसे कि अफ्रीकी या कॉकेसियन नस्ल के इंसानों के कान से गीला वैक्स निकलता है. वहीं पूर्वी एशियाई नस्ल के इंसानों में सूखा वैक्स निकलता है. अमरीकी और प्रशांत महासागर के द्वीपों में रहने वालों में ये अनुपात बराबरी का होता है.
6. ये वैक्स प्रदूषण मॉनिटर भी हो सकता है. कई अन्य शारीरिक स्राव की तरह कान में वैक्स, भारी धातुओं जैसे शरीर में कुछ विषाक्त पदार्थों के निशान भी दिखा सकता हैं.
7. तनाव या भय कान के वैक्स के उत्पादन को बढ़ा सकता हैं. जो ग्रंथियां कान में वैक्स बनाती हैं, वह ग्रंथियों की श्रेणी होती हैं जिन्हें एपोक्राइन ग्रंथियां (apocrine glands) कहा जाता है, जो आपके पसीना में गंध के लिए भी ज़िम्मेदार होती हैं. अमेरिकन स्पीच-लैंग्वेज-हेरिंग एसोसिएशन (American Speech-Language-Hearing Association) के अनुसार, जैसे तनाव में आपको अधिक पसीना आता है उसी प्रकार  भय के कारण कान में वैक्स का उत्पादन भी बढ़ सकता है.
8. कान का वैक्स पसीने की गंध के बारे में भी बता सकता है. कुछ लोगों में गीला वैक्स बनता हैं, जबकि अन्य में सूखा. अगर कान का वैक्स सफेद, परतदार होता है तो इसका अर्थ है कि शायद पसीने में एक निश्चित रसायन की कमी है जिससे शरीर में पसीने की गंध का पता चलता है. घाड़ा और चिपचिपा कान का वैक्स होने से है पसीने में दुर्गन्ध हो सकती है.
9. कान के वैक्स की मदद से कान खुद साफ हो जाते है. इस वैक्स के कारण कान की खुद सफाई हो जाती है. चाबाने की क्रिया के दौरान जबड़े के हिलाने से नलिका पर एक तरह का दवाब पड़ता है, जिससे कान में एकत्रित हुआ अतिरिक्त मेल, जो सूख कर परतो में जमता रहता है, बहार की और धकेले जाने लगता है.
10. कान का वैक्स अगर कान में ठहर जाता है तो सुनना प्रभावित हो सकता है या बहरापन हो सकता है. ये अकसर तभी होता है जब कान जरूरत से ज्यादा वैक्स का उत्पादन करता है या फिर वैक्स बहार न निकल कर वापिस कान के परदे की तरफ चला जाता है. इसके लक्षण हो सकते है कान में दर्द, चक्कर आना, कान का बजना, कान में ज्यादा खुजली का होना, गंध आना या कान से पानी जैसा मेल का निकलना.
उपरोक्त लेख से यह अध्ययन किया कि कान का वैक्स हमारे शरीर के लिए जरूरी होता है, इसी के कारण कान तैलीय रहता है, जल्दी इन्फेक्शन नही होता है क्योंकि ये वैक्स धूल, मिट्टी, कीड़ों को कान में अंदर जाने से रोकता है आदि.

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