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पोलर वोर्टेक्स क्या है और भारतीय जलवायु पर इसका क्या प्रभाव है?

पृथ्वी के भुगौलिक इतिहास को देखे तो पृथ्वी के जलवायु में काफी परिवर्तन आया है और ऐसा क्यों न हो पिछले 650,000 वर्षों में हिमनदों के बढ़ने और पीछे हटने के सात चक्रों से गुजर चुकी है। अंतिम शीत युग (ice age) का अंत लगभग 7,000 वर्ष पहले माना जाता है तथा इसे ही वर्तमान जलवायु और मानव सभ्यता की शुरुआत माना जाता है।

पिछले कुछ दशकों से, उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों में असामान्य ठंड का अनुभव किया जा रहा है जो कि भूगोलवेत्ता के अनुसार अप्रत्यक्ष रूप से ध्रुवीय भंवर के कारण होता है। आइए जानते हैं-ध्रुवीय भंवर कैसे वैश्विक मौसम प्रणाली के साथ-साथ भारतीय जलवायु पर प्रभाव डालता है।

ध्रुवीय भंवर या पोलर भंवर या पोलर वोर्टेक्स क्या है?

ध्रुवीय भंवर या पोलर भंवर या पोलर वोर्टेक्स पर चर्चा करने से पहले, यह जान लें कि- भंवर क्या है?

भंवर का शाब्दिक अर्थ होता है द्रव या वायु का एक चक्करदार द्रव्यमान, विशेष रूप से एक भँवर या बवंडर। इसे "हवा के काउंटर-क्लॉकवाइज प्रवाह" के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो ध्रुवों के पास ठंडी हवा को बनाए रखने में मदद करता है।

ध्रुवीय भंवर या पोलर भंवर या पोलर वोर्टेक्स ध्रुवीय इलाकों में उपरी वायुमंडल में चलने वाली तेज़ चक्रीय हवाओं को बोलते हैं। कम दबाव वाली मौसमी दशा के कारण स्थायी रूप से मौजूद ध्रुवीय तूफ़ान उत्तरी गोलार्द्ध में ठंडी हवाओं को आर्कटिक क्षेत्र में सीमित रखने का काम करते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में दो ध्रुवीय भंवर हैं, जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर निर्भर हैं। प्रत्येक ध्रुवीय भंवर व्यास में 1,000 किलोमीटर (620 मील) से कम एक निरंतर, बड़े पैमाने पर, निम्न-दबाव क्षेत्र है, जो उत्तरी ध्रुव (जिसे एक चक्रवात कहा जाता है) और दक्षिण ध्रुव पर घड़ी की दिशा में, दक्षिणावर्त घूमता है, अर्थात ध्रुवीय भंवर ध्रुवों के चारों ओर पूर्व की ओर घूमते हैं।

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दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं- अत्यधिक ठंड आर्टिक वायु के विस्फोट के कारण होती है, जिसके परिणामस्वरूप "पोलर भंवर" घटना के रूप में जाना जाता है। आर्टिक वायु के इन ठंडे हवा के धमाकों को मजबूत जेट स्ट्रीम या ध्रुवीय जेट स्ट्रीम आर्कटिक क्षेत्र में सीमित रखने का काम करते हैं जो उच्च अक्षांश पर परिचालित होता है।। या फिर यो कहे तो यह पृथ्वी पर एक आवरण के रूप में काम करती है जो निचले वातावरण के मौसम को प्रभावित करती है।

जेट स्ट्रीम या जेट धारा वायुमंडल में तेजी से बहने व घूमने वाली हवा की धाराओं में से एक है। यह मुख्य रूप से  क्षोभमण्डल के ऊपरी परत यानि समतापमण्डल में बहुत ही तीब्र गति से चलने वाली नलिकाकार, संकरी पवन- प्रवाह अथवा वायु प्रणाली को कहते हैं। “

इसलिए, हम कह सकते हैं कि ध्रुवीय जेट स्ट्रीम एक द्वार है जो उत्तर की ओर आर्कटिक ठंडी हवा के विस्फोट को सीमित करता है।

ध्रुवीय भंवर या पोलर भंवर या पोलर वोर्टेक्स भारतीय जलवायु को कैसे प्रभावित करता है?

कुछ शोध दावा करते हैं कि ध्रुवीय भंवर या पोलर भंवर या पोलर वोर्टेक्स का भारतीय जलवायु को सीधे तरीके से प्रभावित नहीं करता है लेकिन आर्कटिक हवाएं पश्चिमी विक्षोभ, नीचे की ओर सहित विभिन्न मौसम प्रणालियों को प्रभावित करती हैं। जिससे भारतीय जलवायु प्रभावित होती है।

आइए जानते हैं, भारतीय उप-महाद्वीप के उत्तरी भाग में लगातार ठंडा मौसम क्यों होता है। जैसा कि हम जानते हैं कि आर्कटिक की ठंडी हवा का विस्फोट ध्रुवीय जेट स्ट्रीम से होता है, लेकिन अचानक उच्च तापमान पर दबाव, तीव्र पैसिफिक टाइफून और अवरुद्ध जैसे मजबूत समतापमंडल की घटनाओं से भंवर का विस्तार होता है और परिणामस्वरूप ठंड के मौसम की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ जाती है।

यह ध्रुवीय जेट स्ट्रीम के टूटने के कारण होता है जो आर्कटिक ठंडी हवा के विस्फोट की अनुमति देता है जो सीधे वैश्विक मौसम प्रणाली को प्रभावित करता है और भारत जैसे देश पश्चिमी विक्षोभ या वेस्टर्न डिस्टर्बन्स (Western Disturbance) की उच्च आवृत्ति और तीव्रता का सामना करते हैं जिसके परिणामस्वरूप भारी से मध्यम बर्फबारी होती है। इसे पोलर भंवर के अप्रत्यक्ष प्रभाव के रूप में माना जा सकता है।

गल्फ स्ट्रीम वैश्विक मौसम पैटर्न पर क्या प्रभाव डालता है?

पश्चिमी विक्षोभ या वेस्टर्न डिस्टर्बन्स (Western Disturbance) भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी इलाक़ों में सर्दियों के मौसम में आने वाले ऐसे तूफ़ान को कहते हैं जो वायुमंडल की ऊँची तहों में भूमध्य सागर, अन्ध महासागर और कुछ हद तक कैस्पियन सागर से नमी लाकर उसे अचानक वर्षा और बर्फ़ के रूप में उत्तर भारत, पाकिस्तान व नेपाल पर गिरा देता है। उत्तर भारत में रबी की फ़सल के लिये, विशेषकर गेंहू के लिये, यह तूफ़ान अति-आवश्यक होते हैं।

लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि उत्तर भारत में गर्मियों के मौसम (सावन) में आने वाले मानसून से पश्चिमी विक्षोभ का बिलकुल कोई सम्बन्ध नहीं होता। मानसून की बारिशों में गिरने वाला जल दक्षिण से हिन्द महासागर से आता है और इसका प्रवाह वायुमंडल की निचली तहों में होता है। मानसून की बारिश ख़रीफ़ की फ़सल के लिये ज़रूरी होती है, जिसमें चावल जैसे अन्न शामिल हैं।

इसलिए हम ऐसा कह सकते हैं की ध्रुवीय भंवर या पोलर भंवर या पोलर वोर्टेक्स वास्तव में भारत के पहाड़ी राज्यों की जलवायु को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित तो नहीं करता है, लेकिन ध्रुवीय जेट स्ट्रीम के टूटने से मध्य अक्षांश के कमजोर पड़ने लगते हैं और फिर पश्चिमी विक्षोभ का स्थान-परिवर्तन दक्षिण-पश्चिम की तरफ हो जाता है जिसके कारण उत्तरी भारत में बर्फबारी के साथ वर्षा होने लगती है।

जेट स्ट्रीम क्या है और वैश्विक मौसम प्रणाली को कैसे प्रभावित करता है?

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